
51000 रुपये का चेक, स्मृति चिह्न, सम्मान पत्र, श्रीफल और अंगवस्त्र भेंट किया गया

✍️ Arjun Kumar Pramanik
राँची । सिंहभूम जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से रांची के वरिष्ठ साहित्यकार और समाजसेवी डॉ मयंक मुरारी को तुलसी सारस्वत सम्मान प्रदान किया गया. तुलसी भवन बिष्टुपुर में उन्हें 51000 रुपये का चेक, स्मृति चिह्न, सम्मान पत्र, श्रीफल और अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया. उनकी अब तक 18 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. वे वर्तमान में उषा मार्टिन में महाप्रबंधक सीएसआर और पीआर के रूप में कार्यरत हैं. इस अवसर पर डॉ मयंक मुरारी ने कहा कि तुलसी भवन ज्ञानपीठ की तरह है. भारतीय सभ्यता के निर्माण में पीठों की अहम भूमिका रही है. वैदिक काल में सात ऋषियों ने कुल, ज्ञान और शक्ति के पीठों की परंपरा बनायी. विश्वामित्र ने ज्ञानपीठ के माध्यम से राम को पुरुष से पुरुषोत्तम बनाया. चाणक्य ने ज्ञानपीठों के जरिये ही नंद वंश के राजा को सत्ता से बेदखल किया. मध्यकाल में बप्पा रावल ने गुरु हरित के आशीर्वाद से सौ कोस पर शक्तिपीठ बनाया. जिसने पांच सौ साल तक इस्लामिक आक्रमण से देश को बचाया. गुरु रामदास ने गांव-गांव में व्यायामशाला के रूप में शक्तिपीठ बनाया, जिसने मुगल शासन की नींव हिला दी थी.
डा मयंक मुरारी एक विचारक और सक्रिय लेखक हैं। वह व्यक्ति विकास के लिए आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय विषयों पर लिखते और काम करते हैं। वह भारत के ज्ञान प्रणाली के आंतरिक मूल्य और अंतर्निहित पहलू पर सोचते और चिंतन करते हैं। उन्होंने 30 सालों में अभी तक 18 किताबें और 700 से अधिक रिपोर्ट, भारतीय समाचार पत्र और पत्रिका में लिख चुके हैं। इन कार्यों के कारण उन्हें कई अवार्ड और पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।वह उषा मार्टिन में महाप्रबंधक सीएसआर और पीआर के रूप में काम कर रहे हैं। वे पिछले 15 सालों से गांवों के टिकाऊ विकास के प्रति संकल्पित है। वह हमारे समाज की सामूहिक जागरूकता के लिए विभिन्न मंचों से व्याख्यान भी देते है।

