
घाटशिला : सोच बदलने पर तस्वीरें बदल सकती है…
दीपक नाग…✍️ (झारखंड न्यूज ब्यूरो हेड)

घाटशिला विधानसभा उपचुनाव का आज प्रचार प्रसार का अंतिम दिन है। शाम होते ही चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित समय से पहले चुनावी प्रचार-प्रसार थम जाएगी।
इस विधानसभा चुनाव में राजनीतिक और निर्दलीय मिलाकर कुल १३ प्रत्याशी अपने भाग्य को आजमा रहे हैं। चुनावी प्रचार-प्रसार और भाषणों के माध्यम से एक दुसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
झारखंड राज्य १५ नवंबर के दिन अपना २५ वां वर्ष पुरा कर लेगा। जिन मूलभूत सोच को लेकर झारखंड अलग राज्य के लिए लड़ाईयां लड़ी गई क्या धरातल में इसका गहरा असर दिखाई दी है ? बात करते घाटशिला विधानसभा क्षेत्र में रह रहें तमाम सरकारी लाभकारी योजनाएं, मजदूर वर्ग, कर्मचारी वर्ग, नौकरी जीवी वर्ग, व्यापारी वर्ग, विकास कार्य, रोजगार श्रृजन, चिकित्सा, शिक्षा, पर्यटन के दृष्टिकोण से ग्राफ की स्थिति में सुधार हुई है या गिरावट आई है? यह देखने और सोचना चाहिए इस क्षेत्र में रह रहे प्रभावित जनता को । जानने के लिए चलिए यात्रा किजिए हमारे साथ…
हिन्दुस्तान कापर लिमिटेड/इंडियन कापर कांप्लेक्स मुसाबनी और मौभंडार:-
झारखंड अलग राज्य बनने के पहले ही मुसाबनी ग्रुप आफ माइंस के छः खदानों पर १९९६ में ही राहुकाल प्रवेश किया और वर्ष २००० तक एक-एक कर सारे खदानें घाटे मे बताकर लाक-डाऊन किया गया । लगभग सात हजार कर्मचारी के रोजगार बंद हो गया। इन खदानों के खनन से २४ प्रकार का बाई-प्रोडक्ट प्राप्त हुआ करता था ।
जब इन छः खदानों को बंद करने की प्रक्रिया शुरु हुई तो केन्द्र में UPA का शासन और बिहार में लालू प्रसाद यादव का शासन चल रहा था। १९९५ में जमशेदपुर लोकसभा सीट भाजपा के प्रत्याशी नितिश भारद्वाज (महाभारत में श्रीं कृष्ण के भुमिका करने वाले) ने जीत हासिल की थी। चुंकि, अन्य किसी दूर के प्रदेश का प्रत्याशी भाजपा से सांसद बनकर आए थे, इसलिए स्थानीय लोगों के संघर्ष काल में जरुरत के हिसाब से साथ नहीं दे सकें। और यही वह समय था जब, मुसाबनी के जनमानस का मोह बाहर के प्रत्याशीयों से पुरी तरह टूट गया। चुंकि, मुसाबनी के खदानें बंद हो गई, जाहिर है HCL/ICC मौभंडार के कारखाने पर ग्रहण लगने का संकेत मिल चुका था। क्यों कि इसे खुराक देने वाले खदानें बंद हो चुकी थी।
१५ नवंबर २००० को झारखंड को अलग पहचान मिला। NDA और UPA के सरकारों ने शासन चलाया। २०१९ से लगातार झामुमो के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन शासन व्यवस्था चला रहें हैं। प्राकृतिक संपदा से भरा पुरा इस क्षेत्र में वर्ष २००० से लेकर अभी तक किसी भी सरकार ने अपने शासनकाल में स्थाई और बृहत रुप से रोजगार श्रृजन करने के लिए न तो नये खदानों को खोल सका और न तो राज्य के हित में सटिक मापदंड के साथ उद्योगपतियों को बुलाकर इस क्षेत्र में उद्योग धंधे बैठाने मे कामयाब हो सका। सुरदा के खदान से बहुत ही साधारण मात्रा में खनन कार्य किसी निजी संस्थान द्वारा चलाया जाता है। इतने सालों में जनसंख्या इस क्षेत्र मे बड़ा चुका यहां की, पर मजदूरों की संख्या उंट के मुंह में जीरा समान है। वह भी यहां से निकलने वाली कच्चे अयस अन्य राज्यों में चला जाता है। वहां के इंडस्ट्रीज में पक्का माल बनता है और बृहत रुप से रोजगार भी वहां श्रृजन हो रहा है। जो चीज दुसरे राज्यों के सरकार हमारे अयस्कों को ले जाकर व्यापार के साथ-साथ व्यापक रूप से रोजगार श्रृजन कर रहे हैं, झारखंड राज्य में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता है ? जल, जंगल और जमीन की कमी नहीं है तो कमी किस मे है?

गौर करने वाली बात है कि, झारखंड अलग राज्य होने के बाद चुनावी सभाओं और मिडिया के समक्ष घाटशिला विधानसभा उपचुनाव में खड़े हुए JLKM के प्रत्याशी रामदास मुर्मू और पार्टी सुप्रीमो जयराम कुमार महतो ने कहा है कि, जनता अगर मौका दें तो यहां के उत्पादों को अन्य राज्यों मे नही जाने देंगें। अच्छे इंवेस्टरों को यहां लोगों के हितों को ध्यान मे रखकर बुलाएंगे। यहां के कच्चा माल यहीं पक्का माल बनवाया जाएगा । ऐसा होने पर मंईया के साथ-साथ भैया के हाथों को भी काम मिलेगा । हर वर्ग के लोग सुकुन का ज़िन्दगी जी सकेंगे।
सवाल उठता है कि, इतनी साधारण सी बाद पच्चीस सालों में किसी भी शासकीय सरकार के जेहन मे क्यों नहीं आ सका ? चाहे सरकार हो, विपक्ष हो या आम जनता सोच बदलने की जरूरत होती है, सोच बदलें तो तो दुनिया बदल सकती है।
