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घाटशिला : क्या कुड़मी वोटर घाटशिला विधानसभा उप चुनाव में फैक्टर बन सकता है ?

दीपक नाग… ✍️

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झारखंड मुक्ति मोर्चा के स्थानीय विधायक सह मंत्री रामदास सोरेन के आकस्मिक निधन से घाटशिला विधानसभा का सीट रिक्त हो गया । इस विधानसभा का उपचुनाव इस वर्ष के अंत तक होना तय है। चुनाव कब, किस तारीख को होगा इसका अधिकृत रुप से अभी तक ऐलान नहीं हुई है। बाबजूद इसका चुनावी तपिश क्षेत्र में बढ़ने लगा है ।

चुंकि, एक ही विधानसभा का उप चुनाव होना है, इसलिए अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा और झामुमो एड़ी-चोटी एक कर देंगे ।

वर्ष २०२४ के घाटशिला विधानसभा चुनावी परिणामों को आधार मानकर यदि आगामी होने वाले उप चुनाव की बात करें तो घाटशिला विधानसभा का उप चुनाव झारखंड मुक्ति मोर्चा और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधा मुकाबला होना तय है । क्यों कि गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस और आजसू चुनाव मे अब तक अपना समर्थन दिया है ।

यह भी सत्य है कि, हर एक चुनावी क्षेत्र का मुद्दा और समीकरण एक जैसा नहीं होता है । प्रांत और क्षेत्र अनुसार राजनीतिक दलों के लिए चुनौती भिन्न होता है। जो इन पहलुओं को समझ कर सही रणनीति अपनाता है वही जीत का सेहरा पहनता है ।

घाटशिला विधानसभा का चुनाव, क्षेत्रीय राजनीतिक दल और केंद्रीय राजनीतिक दल के बीच होना तय है । दोनों राजनीतिक दलों के समर्थकों का सोच और विचार धारा भिन्न होता है । इसलिए यहां चुनावी विश्लेषण एक ही फार्मूला से करना उचित नहीं होगा। यही वजह है कि, दोनों दलों के समर्थकों का चुनावी सोच और मुद्दा अलग बैगा।

एक ओर जहां झारखंड मुक्ति मोर्चा आदिवासी और मूल भाषी मतदाताओं को अपने मुख्य जनाधार मानते है, वहीं भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रवाद और सनातनी मतदाताओं को अपना जनाधार मानकर चुनावी रणनीति तैयार करतें हैं । इनके अलावे और भी कुछ पहलू होते है जो क्षेत्र, प्रान्तों के जरुरतों के अनुरूप जुड़ते जातें हैं ।

घाटशिला विधानसभा उप चुनाव में एक अहम पहलू है जिसे नजर अंदाज करना भारी भुल होगा, वह है कुड़मी मतदाता । कम-से-कम झारखंड के कुछ जिलों में कुड़मी मतदाताओं का प्रभाव शाली प्रतिशत मौजूद हैं । जिसमे पूर्वी सिंहभूम जिला में कुड़मी मतदाताओं की संख्या एक अनुमान के तहत ११% हैं । जोकि किसी भी राजनीतिक दल का हार-जीत फैसला करने के लिए अकेले ही सक्षम है । इन बातों से राजनीतिक पार्टियां भी भली-भांति अवगत है । पिछले ३५ सालों के फ्लस बैक को झांकिये तो जमशेदपुर लोकसभा सीट में ग्यारह में से आठ बार कुड़मी (महतो) समुदाय के लोग सांसद रहें हैं। भले ही वह किसी भी राजनीतिक दल का क्यों न रहा है । कुल मिलाकर इस क्षेत्र में कुड़मी मतदाताओं को ट्रमंप कार्ड यानी तुरुप का एक्का कह सकते है ।

अब सवाल यह है कि, घाटशिला विधानसभा के उप चुनाव में कुड़मी मतदाताओं का कितना अधिक भुमिका हो सकती है ? कड़मी मत ११ % का होने का अर्थ है लगभग २७,६५० मत । अब सवाल यह है कि कुड़मी वोटरों का रूझान किस ओर होगा ?

बतला दूं कि, कुड़मी समुदाय के लोग लंबे समय से झारखंड में जनजातीय समाज शामिल होने के लिए लड़ाइयां लड़ रहा है । इसे लेकर समय – समय पर सरकार के खिलाफ आन्दोलनों को अंजाम दिया है। विगत २० सितंबर को “रेल टेका, ठहर – छेका” आंदोलन को अंजाम झारखंड राज्य के दस जगहों पर रेल परिचालन बंद कर विरोध जताया । जाहिर है, इनके दिलों में जगह बनाना भाजपा और झामुमो के लिए पहले जैसा आसान नहीं रहा ।

यह भी समझने की जरूरत यह भी है कि, इतने सालों में कई कुड़मी नेता पनपे हैं, पर पिछले कुछ ही सालों मे इस समाज का एक युवा जयराम महतो अपने दम-खम पर झारखंड में कुड़मी समाज में सबसे अधिक चहेता नेता उभर कर आया । इन्होंने JKLM नाम से राजनीतिक दल बनाया और बिना कोई गुरू का दीक्षांत लिए एकलव्य के तरह झारखंड विधानसभा के अंदर अपना वजूद बनाया। जाहिर है कुड़मी समाज के लोग अपनी लड़ाई खुद लड़ना चाहतें हैं।

बता दूं कि, पिछले विधानसभा चुनाव नवंबर २०२४ में घाटशिला विधानसभा क्षेत्र से JKLM ने पहली बार बिना किसी तैयारी के अपना प्रत्याशी खड़ा किया था। यह और बात है कि उन्हें लगभग ८०९२ मतों से संतुष्ट करना पड़ा था । चुनावी परिणामों में तीसरे पायदान पर थें । इनसे कम मत कुछ दिग्गज नेता तो कुछ राजनीतिक पार्टी के प्रत्याशी लाया था ।

सवाल अब यह है कि, २७,०००+ कुल कुड़मी मतदाताओं का ८,०००+ मत अगर JKLM को गया था तो बाकी के १९,०००+ कुड़मी मत फिर किसे मिला । NOTA में केवल २,८६८ मत गिरा था, जाहिर है इसमें शत् प्रतिशत कुड़मी मत नहीं गिरा होगा । स्पष्ट है कुड़मी मतों का बड़ा हिस्सा भाजपा और झामुमो में गया होगा ।

गौरतलब है कि, पिछले चुनाव में झामुमो को लगभग ९८,३५६ और भाजपा को लगभग ७५,९१० मिला था । इस अंक गणितीय विधि से तुलना करें तो, झामुमो से भाजपा लगभग २२,४४६ मतों से पीछे रहा । वैसे भी चुनावी कुरुक्षेत्र का युद्ध में हार-जीत का फैसला केवल बहुत ही कम % का होता है। झामुमो और भाजपा के बीच हार-जीत का फ़र्क के एक अंक वाले प्रतिशत के घर मे था । जाहिर है, कुड़मी समाज का ११% यानी २७ हजार से अधिक मत जिस किसी के पच्छ में जाए वह ऊंची छलांग लगा सकता है ।

बहरहाल, उप-चुनाव होने में कुछ ही महिने अभी बाकी है । राजनीतिक पार्टियों के पास वक्त अब भी है। देखें, तुरुप का एक्का कौन उड़ा ले जाता है !