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Ranchi : मुख्यमंत्री मंईया सम्मान योजना से माताओं का मोह भंग होने लगी है क्या ?

दीपक नाग…✍🏽

मंईया सम्मान योजना की कहानी अब झारखंड राज्य में मुंगेरीलाल के हंसीन जैसी लगने लगी है। क्यों कि, प्रतिमाह ढाइ हजार रुपया निर्धारित मानक के तहत माता और बहनों को सरकार हर महीने देने का वादा किया था। पर समय के अंतराल में वायदों में हेर-फेर दिखाई देने लगी। जिसकी चर्चा अमूमन बाजार और सड़कों में होती रहती है। आखिर किए गये वायदों को तटस्थ करने में हेमंत सरकार क्यों डगमग क्यों  हो रहें है ? ऐसी घोषणाएं करने से पहले राज्य के आर्थिक आंकलन किया जाना जरूरी होता है।

झारखंड राज्य में पहली बार तात्कालीन झामुमो के मुख्यमंत्री चांपाई सोरेन के द्वारा एक हजार रूपए से आरंभ किया गया था। 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने महिलाओं को “गोगो योजना” के तहत ज्यादा पैसा प्रति माह देने की बातें कही जो कि, चुनावी दौर में झामुमो के सामने एक चुनौती के रूप में खड़ा था। प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने गंभीरता को देखते हुए तब यह राशि एक हजार से बढ़ाकर ढाई हजार रूपए देने की घोषणा किए।

विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री मंईया सम्मान योजना झारखंड मुक्ति मोर्चा के लिए मास्टर स्ट्रोक साबित हुआ। चुनाव परिणाम सामने आया। झामुमो सशक्त रुप से अपने लिए विधानसभा में जगह बनाने में कामयाब रहें। अब झारखंड सरकार के सामने पचास लाख से अधिक महिलाओं को मंईया सम्मान योजना की राशि बैंक के खातों में भेजने की बारी आई। कतारें लंबी थी। योजना का राशि सालाना पंद्रह हजार करोड़ रुपए से कुछ उपर – नीचे अनुमान कर सकतें हैं। अर्थशास्त्र के जानकारों के जेहन में यह प्रश्न आया कि, कहीं इस व्यवस्था को पुरा करने के फिराक में झारखंड राज्य मे दुसरे सारे विकास कार्यों में विराम न लग जाए ?

चुनाव के बाद के कुछ महिने तक मंईया सम्मान योजना का लाभ माता-बहनों के बैंक खाते में दिखने लगा।
लाभुक महिलाओं के चेहरे में चमक आई। वादियों में हेमंत सरकार का जय-जयकार होने लगा। पर एक दो महीने के बाद अचानक मुख्यमंत्री मंईया सम्मान योजना की राशि खाते में आना बंद हो गया। लाभुक महिलाओं का कतार बैंकों में देखी गई, बैरन हाथ लौटने लगी ! बैंक कर्मचारी “पैसा नहीं आया खाते में, पैसा नहीं आया खाते में कहते और महिलाओं को समझाते परेशान होने लगें। फिर अचानक सरकारी तंत्रों से खबर आया कि, मंईया सम्मान योजना का लाभ अब सभी को नहीं मिलेगी। इसके लिए एक नया मानक तैयार किया गया है। यह खबर बाजार में आते ही लाभुक महिलाओं को झटका लगने लागा। चंद महिनों तक कागजी प्रक्रियाओं का कार्य फिर से आरंभ करवाया गया। घर के काम काजी महिलाओं को नंगे पैर आंगनबाड़ी कार्यालय के परिसर में फेरा लगाते देखा गया। आंगनबाड़ी केंद्रों में फिर से सेविकाओं का काम बड़ गया। कुछ महिने बाद फिर से मंईया सम्मान योजना का लाभ बैंक के खाते में आने लगी। पर इस बार, दृश्य कुछ और ही था। सरकारी मानक के तहत राज्य में लाखों महिलाओं का नाम लाभुक सुची से बाहर हो गया। जाहिर है, चुनाव के पहले सरकार ने मंईया सम्मान योजना के लिए जो मानक तय किए थें उन नियमों में परिवर्तन लाकर लाखों महिलाओं के सपने चकना चूर कर दीया होगा ? खबरों के अनुसार अनेक साधारण परिवार की महिलाएं इन पैसों के भरोसे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से हटाकर प्राइवेट स्कूलों में दाखिला करवाई थी मंईया सम्मान योजना के अस्थिर नीति के कारण बच्चों का स्कुल का फीस जमा नहीं करा पा रही है। जाहीर है योजना के कारण हो रही लगातार धुप-छांव की स्थिति प्रभावित महिलाओं में सरकार से मोह भंग होना लाजमी है।

खबरों के अनुसार, पीछले एक-दो महीने से मंईया सम्मान योजना का लाभ नहीं दिया जा रहा है। अपुष्ट पुत्रों का मानें तो, अनेक सरकारी राशन कार्ड धारकों के राशन से राशन मिलना पीछले महिने से बंद है गया है। ऐसे चिन्हित महिलाओं को भविष्य में मंईया सम्मान योजना का लाभ आगे शायद नहीं होगी !

जाहिर है, जो मंईया सम्मान योजना झामुमो के लिए मास्टर स्ट्रोक साबित हुई थी, इसके अस्थर मानक भविष्य मे कहीं चुनावों समीकरण न बिगाड़ दें ? यह सर्वविदित है कि, जिन घरों की महिलाएं असंतोष होगी उस परिवार के पुरुषों का माथा पन-पनाया रहना स्वाभाविक है। ऐसे में हेमंत सरकार को 2029 में होने वाली आम चुनावों के लिए संकट मोचन ढूंढ कर निकालने की जरूरत न पड़े जाए ? वर्ना, लाखों विक्षुब्ध परिवारों के समक्ष अपना पक्ष रखेंगे कैसे ?

बहरहाल, पार्टी में समझदार और राजनितिक विश्लेषक भी मौजूद होंगे जरुर। उन्हें सोचना होगा कि, मुख्यमंत्री मंईया सम्मान योजना से निराशा हाथ लगें लाखों परिवारों को मनाएंगे कैसे ? संकट का मोचन कैसे होगा ? यह एक यक्ष्य प्रश्न के रुप मे आज खड़ा है। 

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