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जनसंख्या समाधान फाउंडेशन के झारखंड प्रदेश सचिव मनोज कुमार चौधरी ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर 22 सितंबर से पहले जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की मांग की…

जनसंख्या वृद्धि से भुखमरी बेरोजगारी व गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा होंगे  : मनोज कुमार चौधरी…

सरायकेला / संजय मिश्रा ।

जनसंख्या समाधान फाउंडेशन के झारखंड प्रदेश सचिव मनोज कुमार चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर विकराल रूप धारण कर रही देश की बढ़ती जनसंख्या से उत्पन्न आने वाली समस्याओं से अवगत कराते हुए आगामी 22 सितंबर से पूर्व जनसंख्या नियंत्रण कानून-2023 देश में लाए जाने की मांग की है। अपने लिखे पत्र में उन्होंने कहा है कि भारत की संस्कृति और अखंडता को अक्षुण्ण रखने की कामना करने वाले देशभर के लोग जनसंख्या में वर्गीय असंतुलन को लेकर अत्यंत चिंतित हैं।

सबका मानना है कि पूर्व में धार्मिक आधार पर विभाजित हो चुके देश में कुल प्रजनन दर (TFR) में दर्शाई जा रही तथाकथित गिरावट के बावजूद विभिन्न वर्गों के बीच आबादी का सामाजिक संतुलन लगातार बिगड़ते जाना एक खतरनाक स्थिति है। यह असंतुलन भविष्य में देश के ताने-बाने के लिए अत्यंत विनाशकारी साबित हो सकता है। जनसंख्या विस्फोट एवं जनसांख्यिकीय असंतुलन की समस्या पर कुशल एवं प्रभावी नियंत्रण के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग को लेकर विगत 9 वर्षों से अधिक समय से “जनसंख्या समाधान फाउन्डेशन” के तत्वावधान में सरायकेला-खरसावां जिले सहित देशभर में हजारों छोटी-बड़ी सभाएं, बड़ी-बड़ी रैलियां, पदयात्राएं और रथयात्राएं आयोजित की गई हैं। राष्ट्रपति से भेंट करके विषय का प्रस्तुतिकरण देने एवं सांसद-संवाद कार्यक्रमों सहित देश के अधिकांश जिलों के संगठन कार्यकर्ताओं द्वारा प्रत्येक वर्ष विश्व जनसंख्या दिवस सहित अन्य अवसरों पर भी जिलाधिकारियों के माध्यम से प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपे जाते रहे हैं।

वर्तमान में संगठन द्वारा उपरोक्त कानून पर आम लोगों का समर्थन प्राप्त करने के उद्देश्य से देशभर में हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है। राष्ट्र के समक्ष उपस्थित अनेक प्रकार की चुनौतियों के समाधान तथा सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित, समर्थ और खुशहाल भारत बनाने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयासरत रहने और राष्ट्रीय महत्व के अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में अपनी व्यस्तता के कारण सम्भवतः आप जनसांख्यिकीय असंतुलन की समस्या की ओर उतना ध्यान नहीं दे पा रहे हैं, अन्यथा पूर्व में देश को विभाजित कर चुकी और भविष्य में पुनः ऐसा होने की संभावना की चेतावनी दे रही इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए अवश्य ही आपके द्वारा अब तक ठोस कदम उठा लिया गया होता। जनसंख्या विषयक हमारे अभियान को भारत सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री तथा देश के एक राष्ट्रवादी संगठन के कुछ महत्वपूर्ण सदस्यों का अनवरत सहयोग मिलता रहा है। वर्ष 2018 में हमें जनसंख्या नियंत्रण कानून विषयक हमारे मांग-पत्र पर 125 सांसदों का लिखित समर्थन भी प्राप्त हुआ।

जिसे हमारे संगठन और 4 सांसदों के संयुक्त प्रतिनिधिमंडल द्वारा 9 अगस्त 2018 को तत्कालीन राष्ट्रपति को उनसे विषय पर विस्तृत चर्चा के उपरान्त सौंपा गया। इस सबके बावजूद इतने गंभीर विषय पर केन्द्र सरकार द्वारा अभी तक कोई कदम ना उठाए जाने से हमें ऐसा लगता है कि हम अपनी बात सरकार के शीर्ष स्तर तक ठीक प्रकार से पहुँचाने में असमर्थ रहे हैं। संगठन के हजारों कार्यकर्ताओं के 9 वर्षों से अधिक समय से जारी अनवरत प्रयासों के बावजूद राष्ट्रीय महत्व की इस समस्या की ओर अब तक सरकार का ध्यान आकर्षित कराने में असफल रहने पर हमने राष्ट्रव्यापी जनसंख्या अभियान के अपने अनुभव, भारत की जनगणना एवं अन्य स्रोतों से प्राप्त विभिन्न जनसांख्यिकीय आंकड़ों के अध्ययन और विश्लेषण तथा जनसांख्यिकीय असंतुलन के खतरों की भयावहता को लेकर संगठन के देशभर के कार्यकर्ताओं के माध्यम से प्राप्त आम जनमानस की धरातलीय फीडबैक के आधार पर एक पुस्तिका तैयार की है।

पुस्तिका में दिए तथ्यों एवं निष्कर्षो को पढ़कर जनसांख्यिकीय असंतुलन के कारण भारत के पल-प्रतिपल गृहयुद्ध की ओर अग्रसर होने का स्पष्ट रूप से आभास हो जाता है। हमारा मानना है कि इन सभी बिन्दुओं पर तार्किक रूप से विचार करके पुस्तिका में सुझाए ठोस कानूनी कदम उठाने से विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच जनसंख्या का अनुपात निश्चित रूप से हमेशा-हमेशा के लिए वर्तमान अनुपात के अनुसार बना रह सकता है। जनसांख्यिकीय असंतुलन की विभीषिका पर तर्कों और तथ्यों के साथ प्रकाश डालती इस पुस्तिका को हमने भारत सरकार के शीर्ष नेतृत्व को आवश्यक विषयों पर सुझाव देने में सक्षम महत्वपूर्ण लोगों (हमारी समझ के अनुसार) तक विभिन्न माध्यमों से पहुँचाया है। परन्तु उनमें से कुछ तो राष्ट्र के समक्ष उपस्थित जनसांख्यिकीय असंतुलन के खतरों को ही नकारते दिख रहे हैं। भारत के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब बौद्धिक श्रेष्ठता भाव के कारण बड़े लोगों ने साधारण जन की ओर से आई राष्ट्रहित की महत्वपूर्ण बातों को भी नकार कर बड़ी गलतियां कीं, जिसकी कीमत समूचे राष्ट्र को पीढ़ियों तक चुकानी पड़ी।

ईश्वर करें यह ऐतिहासिक अवधारणा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गलत साबित हो। विगत 9 वर्षों से अधिक समय से संगठन द्वारा जारी जनसंख्या अभियान के अन्तर्गत देशभर के विभिन्न राज्यों के अधिकांश जिलों के अनेक शहरों, कस्बों और गांवों में अपने प्रवास के दौरान आम लोगों से संपर्क और इस विषय में उन सबकी राय जानकर हमें यह अहसास हो गया है कि जनसांख्यिकीय असंतुलन के खतरों को भांपकर उनमें एक अंडरकरंट चल रहा है। देश के एक बहुत बड़े वर्ग की यह चिंता सीधे अथवा हमारे अनेक प्रयासों के बावजूद भी सरकार तक ना पहुँचने के कारण आशंका होने लगी है कि राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर आम जनमानस के सुझावों को आप तक पहुँचाने वाले इन्फॉर्मेशन नेटवर्क में कहीं कोई गड़बड़ है।

वर्ना कोई कारण नहीं है कि जनसांख्यिकीय असंतुलन के जिस खतरे को देश का बच्चा-बच्चा समझ रहा है, आप जैसे राष्ट्रभक्त नेतृत्व द्वारा उस पर अब तक कोई निर्णय ना ले लिया गया होता। हमें ज्ञात है कि विगत 9 वर्षों में आपके नेतृत्व में भारत ने एक सशक्त राष्ट्र के रूप में प्रत्येक क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है और राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय महत्व के अनेक विषयों पर ऐतिहासिक कार्य हुआ है। किसी राष्ट्र के लोगों को ऐसा नेतृत्व भाग्य से ही मिलता है, जिसे संजोकर रखने की जिम्मेदारी उस राष्ट्र के विवेकशील नागरिकों की होती है। परन्तु जागरूक नागरिक और एक राष्ट्रवादी संगठन के सदस्य होने के नाते हमारा यह कर्तव्य भी है कि हम जनसांख्यिकीय असंतुलन के कारण राष्ट्र के अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट और आम जनमानस में इस विषय पर चल रहे अंडरकरंट से देश के शीर्ष नेतृत्व को अवगत कराकर इस विकट समस्या का समाधान कराने हेतु भरसक प्रयत्न करें। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रीय महत्व की बात शीर्ष नेतृत्व तक पहुँचाने के सभी रास्ते बंद दिखाई पड़ने पर सार्वजनिक प्रदर्शन ही एकमात्र विकल्प बचता है। विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर जिलाधिकारियों के माध्यम से ज्ञापन देकर आप तक अपनी बात पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है। आगामी 22 सितंबर को हस्ताक्षरित पत्रकों के साथ देशभर से आए कार्यकर्ताओं के दिल्ली-गाजियाबाद बॉर्डर के निकट संगठन के अस्थाई कैम्प पर एकत्रीकरण से पूर्व आपसे भेंट करने का अवसर मिलने पर हम एक प्रतिनिधिमंडल (आपके द्वारा निर्देशित संख्या) के रूप में इस विषय पर आपके समक्ष संगठन के 23 राज्यों के अपने प्रतिनिधियों द्वारा सुझाए गए बिन्दुओं के आधार पर प्रस्तुतिकरण देने का प्रयास करेंगे। आम जनमानस से प्राप्त हस्ताक्षरित पत्रकों को लेकर 23 सितंबर को संगठन के अस्थाई कैम्प से प्रधानमंत्री कार्यालय दिल्ली की ओर रैली के रूप हम इस अपेक्षा के साथ कूच करेंगे कि आप अथवा आपके द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि इंडिया गेट के सामने के मैदान में देशभर से आए हमारे कार्यकर्ताओं से समर्थन पत्रक ग्रहण करके उनसे वार्ता करेंगे।

चूंकि राष्ट्र के अस्तित्व को चुनौती दे रही जनसांख्यिकीय असंतुलन की समस्या का समाधान किया जाना हमारे सुविधाजनक जीवनयापन और यहां तक कि हमारे अपने प्राणों की कीमत से भी कहीं अधिक बड़ा है, इसलिए जनसंख्या नियंत्रण कानून बनने की प्रक्रिया प्रारम्भ करने की सहमति ना बनने की स्थिति में हम अंतिम विकल्प के रूप में शांतिपूर्ण और अनुशासित ढंग से परन्तु दृढ निश्चय के साथ धरने पर बैठ जाएंगे और कानून बनने की प्रक्रिया प्रारम्भ होने पर ही धरने का समापन करेंगे।

आप जैसे क्षमतावान व राष्ट्रभक्त नेतृत्व से आग्रह है कि आप विश्व के मात्र 2.4% भू-भाग पर विश्व की कुल लगभग 800 करोड़ जनसंख्या के 17.8% अर्थात 142 करोड़ से अधिक आबादी का भार वहन कर रहे भारत की जनसंख्या विस्फोट और जनसांख्यिकीय असंतुलन की समस्या के समाधान के लिए अपनी ओर से पहल करके प्रस्तुत किए गए प्रावधानों से युक्त मसौदे पर मंत्रिमंडल समूह में आवश्यक चर्चा कराकर जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की प्रक्रिया 22 सितंबर से पूर्व ही प्रारम्भ करने की कृपा करें।

1. सरकार जनसंख्या के उचित समाधान के लिए ऐसा कानून बनाए जिसमें भ्रम की स्थिति ना रहे और जाति, धर्म, क्षेत्र व भाषायी बंधनों से ऊपर उठकर, राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए यह कानून देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो
2. इस कानून के सभी दंडात्मक प्रावधान कानून अधिसूचित होने की तिथि के एक वर्ष के पश्चात कानून तोड़कर दूसरी जीवित संतान से अधिक बच्चे की उत्पत्ति करने वाले जैविक माता-पिता पर लागू हों। कानून बनने के पूर्व में उत्पन्न दो से अधिक संतानों के मामले में किसी भी नागरिक पर किसी भी रूप में यह कानून लागू नहीं होगा ।
3. जनसंख्या समाधान विषयक कानून अधिसूचित होने की तिथि के एक वर्ष के पश्चात कानून तोड़कर दूसरी से अधिक संतान उत्पन्न करने वाले दंपत्ति को सरकार द्वारा मिलने वाली सभी प्रकार की सहायता एवं अनुदान आदि समाप्त किए जाने का प्रावधान कानून में किया जाए।
4. वर्तमान में राजकीय सेवा में नियोजित, दो या दो से अधिक बच्चों वाले माता-पिता सरकार द्वारा कानून अधिसूचित होने की तिथि के एक वर्ष के पश्चात कानून तोड़कर अगली संतान की उत्पत्ति करने पर अपने पद पर नहीं बने रह सकें तथा भविष्य में नियोजित किए जाने की पात्रता भी समाप्त हो जाए, ऐसा प्रावधान कानून में किया जाए।
5. कानून अधिसूचित होने की तिथि के एक वर्ष के पश्चात कानून तोड़कर दूसरी से अधिक संतान उत्पन्न करने वाले जैविक माता-पिता व संतान को जीवन पर्यन्त मताधिकार एवं किसी भी प्रकार की चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने से वंचित किया जाए।
6. कानून का एक बार उल्लंघन करने के बाद दोबारा उल्लंघन करने अर्थात चौथी संतान की उत्पत्ति की स्थिति में पिछले प्रावधानों के साथ-साथ ऐसे दंपत्ति (पति-पत्नी दोनों) की अनिवार्य नसबंदी करके उनको 10 वर्ष की जेल की सजा का प्रावधान किया जाए ताकि चौथी संतान के बारे में कोई नागरिक स्वप्न में भी ना सोच सके ।
7. दंपत्ति को प्रथम बार में जुड़वाँ संतान उत्पन्न होने की स्थिति में परिवार पूर्ण माना जाए और अगली संतान की उत्पत्ति कानून का उल्लंघन मानी जाए दूसरे बच्चे के समय जुड़वाँ संतान होना एक अपवाद मानकर ऐसी स्थिति में कानून प्रभावी ना हो ।
8. जाति, धर्म व संप्रदायों से ऊपर उठकर यह प्रावधान स्पष्ट रूप से रहे कि पहली शादी से दो जीवित संतानों के साथ तलाक होने की स्थिति में स्त्री या पुरुष में से कोई भी दूसरी शादी के बाद संतानोत्पत्ति के अधिकारी नहीं रहेंगे, भले ही दूसरे जीवनसाथी को पहले से अथवा पहली शादी से कोई संतान ना हो। अगर एक बच्चा हो तो केवल एक बच्चे की उत्पत्ति का अधिकार रहे।
9. बहुविवाह ( एक से अधिक पत्नी) एवं बहुपतित्व विवाहों के मामले में कहीं कोई भ्रम की स्थिति नहीं रहनी चाहिए। अगर कानूनन भी कोई पुरुष एक से अधिक पत्नी रखता है और उन्हें तलाक देकर अदल बदल करते हुए अपने जीवनकाल में अनेक शादियां करता है तो उसे सभी पत्नियों के माध्यम से अलग अलग दो-दो बच्चे पैदा करने की छूट नहीं दी जा सकती। किसी एक अथवा दो पत्नियों से कुल दो बच्चों की उत्पत्ति पर (पत्नियों अथवा पतियों की संख्या जो भी हो) परिवार पूर्ण माना जाए। कुल मिलाकर पत्नियों अथवा पतियों की संख्या कितनी भी क्यों ना हो, उसे एक परिवार मानते हुए बच्चों की कुल संख्या 2 से अधिक होना कानून का उल्लंघन माना जाए।
10. पूर्वोत्तर भारत के राज्यों असम, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम, मणिपुर, – मेघालय एवं त्रिपुरा की मूल धार्मिक जनजातियों की जनसंख्या अवैध घुसपैठ के कारण अनुपातिक रूप से घटते जाने के कारण कुछ निश्चित समय के लिए वहां की मूल धार्मिक जनजातियों को जनसंख्या नियंत्रण कानून की परिधि से बाहर रखा जाए। अवैध घुसपैठ के पश्चात स्थानीय लड़कियों से शादी करके वहीं बस जाने वाले किसी भी बाहरी व्यक्ति / घुसपैठियों को किसी प्रकार की छूट नहीं मिलनी चाहिए ।
11. उपरोक्त प्रावधानों के क्रियान्वयन हेतु आवश्यक होने पर संविधान में उपयुक्त संशोधन किया जाए।
22वें विधि आयोग ने देश के विभिन्न कानूनों के क्रियान्वयन में एकरूपता लाने के उद्देश्य से प्रत्येक नागरिक के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने के संबंध में आम लोगों और धार्मिक समूहों से राय मांगी है। आपसे आग्रह है कि जनसंख्या नियंत्रण कानून के विभिन्न दंडात्मक प्रावधान भले ही अलग कानून के रूप में निरूपित किये जाएं, परन्तु इन्हें देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू करने के लिए प्रस्तावित “यूनिफॉर्म सिविल कोड” में समायोजित करने हेतु विधि आयोग को निर्देशित करने की कृपा करें। जनसांख्यिकीय असंतुलन पर कुशल एवं प्रभावी नियंत्रण भारत ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व और समूची मानवता के लिए अत्यन्त आवश्यक है।

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