
सरायकेला विधानसभा सीट का सफरनामा पद्म फूल छाप से लेकर तीर धनुष तक।
हमेशा से हॉट रही सरायकेला विधानसभा सीट अबकी बार फुली हॉट….
सरायकेला -संजय मिश्रा । झारखंड प्रदेश के लिए हमेशा से ही महत्व की सीट रही सरायकेला विधानसभा सीट का राजनीतिक सफरनामा बड़ा ही रोचक और पब्लिक ओरिएंटेड रहा है। शुरू से ही प्रदेश के लिए हॉट सीट रही सरायकेला विधानसभा सीट वर्ष-2024 के विधानसभा चुनाव में अत्यधिक हॉट बनी हुई है। जिसे लेकर वर्तमान में उम्मीदवारी और उम्मीदवारों तथा कार्यकर्ताओं की रस्साकसी और उछल कूद जारी है।

परंपरागत निर्वाचन का साक्षी रहा सरायकेला विधानसभा सीट पर बारी-बारी से सभी दलों ने अपने आप को साबित करने में सफलता हासिल की है। जिसका प्रमुख कारण बताया जा रहा है कि आम जनता और मतदाताओं के लिए पार्टी से अधिक उनसे जुड़ा पार्टी का उम्मीदवार मायने रखता है। क्षेत्र के 76 वर्षीय पूर्व मुखिया गुरुपद महतो यादों के झरोखों से सरायकेला विधानसभा सीट के सामान्य से परिसीमन के बाद अनुसूचित जनजाति रिजर्व सीट होने तक के सफरनामा और तत्कालीन से लेकर अब तक के चुनावी माहौल पर विशेष चर्चा करते हैं। जिसमें उन्होंने बताया है कि बिना किसी जागरूकता अभियान के एक पर्व की तरह उल्लास पूर्ण माहौल में चुनाव हुआ करता था। और वर्तमान में भारी ताम-झाम के बीच पर्व की तरह चुनाव का उल्लास लोप सा हो गया है।

जाने गुरुपद महतो को :- सरायकेला क्षेत्र में मुखिया जी के नाम से प्रसिद्ध गुरुपद महतो राजनीतिक दृष्टि से अपने विचारधारा रखते हैं। जो सरायकेला प्रखंड के जुरगुड़िया पंचायत के वर्ष 1971 से 2010 तक मुखिया रहे हैं।
सरायकेला विधानसभा सीट का सफरनामा गणतंत्र पार्टी के पद्म फुल से तीर धनुष तक:-
स्वतंत्रता के बाद प्रथम विधानसभा आम निर्वाचन-1952 से लेकर 1976 तक सरायकेला विधानसभा सीट सामान्य रहा। वर्ष 1976 में परिसीमन के बाद सरायकेला विधानसभा सीट अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व सीट घोषित हुआ। जिसके बाद से वर्तमान तक सरायकेला विधानसभा सीट अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व सीट बना हुआ है।
ऐसा रहा जीत का सिलसिला:-
सरायकेला विधानसभा सीट से पहले विधायक रहे मिहिर कवि
1952- मिहिर कवि (पद्म फुल छाप, गणतंत्र पार्टी).
1957- राजा आदित्य प्रताप सिंहदेव (तारा छाप, गणतंत्र परिषद).
1962- टिकायत नृपेंद्र नारायण सिंहदेव (तारा छाप, गणतंत्र परिषद).
1967- रुद्र प्रताप षाडंगी (जनसंघ).
1969- बन बिहारी महतो (तीर कमान, अखिल भारतीय झारखंड पार्टी).
1972- सत्यभानु सिंहदेव (कांग्रेस पार्टी).
1977- कादे माझी (जनता पार्टी).
1980- कादे माझी (भारतीय जनता पार्टी).
1985- कृष्णा मार्डी (झारखंड मुक्ति मोर्चा).
1990- कृष्णा मार्डी (झारखंड मुक्ति मोर्चा).
1991- चंपाई सोरेन (झारखंड मुक्ति मोर्चा).
1995- चंपाई सोरेन (झारखंड मुक्ति मोर्चा).
2000- अनंत राम टुडू (भारतीय जनता पार्टी).
2005- चंपाई सोरेन (झारखंड मुक्ति मोर्चा).
2009- चंपाई सोरेन (झारखंड मुक्ति मोर्चा).
2014- चंपाई सोरेन (झारखंड मुक्ति मोर्चा).
2019- चंपाई सोरेन (झारखंड मुक्ति मोर्चा).
चुनाव का होता था पर्व की तरह उल्लास : परंपरागत धोती कुर्ता से शुरू हुई नेतागिरी वर्तमान में कोट पैंट, लग्जरी गाड़ी और बॉडीगार्ड के लाव लश्कर तक पहुंच गई है। पूर्व मुखिया गुरुपद महत बताते हैं कि पहले उम्मीदवार गांव-गांव पहुंचकर पैदल चलते हुए डोर टू डोर जनसंपर्क किया करते थे। जहां घरों के द्वार पर खटिया बेचकर नेताजी का मीठा पानी से स्वागत किया जाता था। और लोग उनकी बातों एवं विचारों को सुना करते थे।
समय के साथ-साथ ट्रेंड चेंज होता गया। और वर्तमान में नेतागिरी को मंच की आवश्यकता पड़ने लगी है। साथ ही अपनापन घटना और दूरियां बढ़ती रही है। जिसका परिणाम भी बताते हैं कि अपनापन बढ़ाने और दूरियां घटाने के लिए के लिए विशेष हथकंडे अपनाए जाने का ट्रेंड चल पड़ा है।
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