
सस्टेनेबल डेवलपमेंट से बचेगा फ्यूचर का जीवन : मयंक मुरारी

Arjun Kumar Pramanik……✍️
रांची । इस दुनिया में, आशावादी लोग सफल होते हैं, इसलिए नहीं कि वे हमेशा सही होते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि वे सकारात्मक होते हैं। गलत होने पर भी, वे सकारात्मक होते हैं, और यही उपलब्धि, सुधार और सफलता का मार्ग है। उक्त बातें विचारक और उषा मार्टिन के सीएसआर हेड डॉ मयंक मुरारी ने कही । वह आज सीआईआई द्वारा आयोजित समिट में विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि। धरती का भविष्य के लिए सस्टेनेबल डेवलपमेंट एप्रोच अपनाना होगा।विभिन्न पहलों के बावजूद, भारत में जनजातीय समुदायों को विकास में कई महत्वपूर्ण बाधाओं का सामना करना पड़ता है। आदिवासी क्षेत्र दुर्गम क्षेत्रों में हैं, जिससे बुनियादी ढांचे का विकास (सड़कें, स्कूल, स्वास्थ्य सेवा) मुश्किल हो गया है। खराब परिवहन और संचार नेटवर्क बाजारों, सेवाओं और अवसरों तक पहुंच में बाधा डालते हैं। खनन, बांधों या वन नीतियों के कारण विस्थापन अक्सर जनजातियों को आजीविका या मुआवजे के बिना छोड़ देता है। डा मयंक मुरारी ने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक सीमित पहुंच, जिससे उच्च शिक्षा या कुशल नौकरियों के अवसर कम हो गए है। इसके अलावा आधिकारिक भाषाएँ जनजातीय भाषाओं से भिन्न होती हैं, जिससे शिक्षा और शासन में बाधाएँ पैदा होती हैं।आधुनिकीकरण कभी-कभी सांस्कृतिक विरासत से टकराता है, जिससे पहचान संबंधी चुनौतियाँ पैदा होती हैं।-शिक्षित, खुली आँखों वाला आशावाद लाभदायक होता है; निराशावाद केवल सही होने का खोखला सांत्वना प्रदान कर सकता है। उन्होंने बताया कि विश्व के देशों के प्रमुख जब अफ्रीका की धरती पर जी-20 सम्मेलन के लिए इकटठा हुए तो एक अनोखी पहल की गयी है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कई दशकों से जी-20 दुनिया की अर्थव्यवस्था को आकार देता रहा है, लेकिन वर्तमान विकास मॉडल ने बड़े समुदायों को संसाधनों से वंचित किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान विकास के मॉडलों ने प्रकृति का अंधाधुंध दोहन बढ़ाया है और सबसे अधिक असर अफ्रीका और ग्लोबल साउथ पर पड़ा है। इस बैठक में ऐसी ज्ञान-परंपराओं की बात उठाई गयी है जो सदियों से दुनिया के विभिन्न हिस्सों में प्रकृति-संतुलन, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समरसता को बनाए रखती हैं।

