
“चुनाव का नीतीश बनाम तेजस्वी होने से महागठबंधन को नुकसान”
संजय कुमार विनित… ✍️

पटना : बिहार विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के अभूतपूर्व मतदान के बाद दर्जनों एजेंसियों ने अपने सर्वे रिपोर्ट में बिहार में एनडीए की सरकार बनने के संकेत दिये हैं। महागठबंधन की सरकार दूर दूर तक बनती दिखाई नहीं दे रही है।महागठबंधन के हार के जो ये संकेत हैं, इसके कयी कारण हो सकते हैं। इन कारणों में सबसे प्रमुख कारण जो सामने आ रही है, वो इस चुनाव का नीतीश कुमार बनाम तेजस्वी यादव का होना कहा जा सकता है।
बिहार में दोनों चरणों के मतदान के बाद दोनों गठबंधनों के जीत हार के कारणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई है। बिहार चुनाव को लेकर दर्जनों एजेंसियों ने एग्जिट पोल लाकर बहस को और तेज बना दिया है। तमाम एग्जिट पोल के आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि एनडीए की सरकार बहुमत के साथ एक बार फिर से सरकार बनाने जा रही है और भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आ रही है और दूसरे नंबर की पार्टी को लेकर जदयू और राजद के बीच लड़ाई है। प्रशांत किशोर बहुत कुछ करते नजर नहीं आ रहे है।
बिहार में विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के अभूतपूर्व उत्साह को लेकर इन वोटों को एंटीइनकंम्बेसी और प्रोइनकंम्बेसी के रूप में दोनों गठबंधनों में अपने – अपने हिसाब से देखा जा रहा है। दोनों चरणों के अगर वोटर टर्न आउट को अगर देखें तो यह लगभग 67 ℅ है जो आजादी के बाद यह पहली बार देखा गया है। 20 वर्षों से लगातार नीतीश कुमार के सरकार में रहने से इन वोटों को एंटीइनकंम्बेसी से ही ज्यादातर लोग देख रहें थे, जबकि 20 साल के अनेक जनकल्याणकारी कार्य को लेकर इस टर्न आउट को विभिन्न एजेंसियों ने अपने सर्वे में प्रोइनकंम्बेसी के रूप में प्रस्तुत किया है।
बिहार में दो चरणों में चुनाव संपन्न हुआ है।पहले चरण में 6 नवंबर को 65.08 प्रतिशत की रिकॉर्ड वोटिंग दर्ज की गई, जबकि दूसरे चरण में भी 68.70 प्रतिशत मतदाताओं ने भारी उत्साह के साथ मतदान में भाग लिया। इस बार महिला और युवा मतदाताओं की भागीदारी भी अधिक देखने को मिली है। इससे साफ है कि जनता ने इस चुनाव में अपनी राय खुलकर व्यक्त की है। इस बार मुकाबला दिलचस्प नजर आ रहा है। महागठबंधन और एनडीए के साथ पीके की जन सुराज पार्टी, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम , तेज प्रताप यादव की जनशक्ति जनता दल भी प्रमुख रूप से चुनावी मैदान में है।
अगर, पिछले चुनाव परिणाम पर गौर करें तो,बिहार में 2020 में विधानसभा चुनाव जीतकर एनडीए ने सरकार बनाई थी। एनडीए को कुल 125 सीटें मिली थीं, जबकि महागठबंधन को 110 सीटें मिली थीं। राजद 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी। इसमें एनडीए गठबंधन में सीटें,भाजपा – 74, जदयू – 43,विकासशील इंसान पार्टी – 4, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा – 4 थी, जबकि महागठबंधन को मिली 110 सीटें में राजद – 75, कांग्रेस -19, सीपीआई (एमएल) -12 और एआईएमआईएम समेत अन्य – 5 थी।
मतदाताओं के अभूतपूर्व टर्नआउट के कई कारण हो सकते हैं। जैसे कि मतदाताओं के बीच जागरूकता, मतदान के लिए उचित माहौल, छठ पूजा के बाद चुनाव होने के कारण प्रवासी बिहारियों का योगदान, मौसम खुशनुमा, मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण। पर नीतीश कुमार से बढ़कर तेजस्वी यादव के बढ चढ कर वायदों के बाद भी नीतीश कुमार के पक्ष में वोट जाने के कारणों की चर्चाएं शुरू हो गयी है। अगर दर्जनों एग्जिट पोल पर विश्वास कर आगे बढ़ा जाये तो महागठबंधन के हार के भी कई कारण हो सकते हैं। जैसे कि चुनावी वादे का असरहीन होना, चुनाव प्रबंधन में कमी, गठबंधन के साथी दलों के बीच बेहतर तालमेल का अभाव, उचित मुद्दे को नहीं उठा पाना।
नीतीश कुमार ने जनता के लिए जब और जितनी घोषणाएं कीं, उससे काफी पहले तेजस्वी यादव ने उनसे भी आकर्षक वादे जनता से किए। मसलन महिलाओं को 2500 रुपए की मासिक मदद, 200 यूनिट फ्री बिजली, 500 रुपए में सिलिंडर, 1500 रुपए सामाजिक सुरक्षा पेंशन और ब्रह्मास्त्र के तौर पर हर परिवार को सरकारी नौकरी देने का तेजस्वी ने वादा किया। वहीं, इससे मिलती-जुलती, पर सुचिंतित अंदाज में नीतीश ने महिलाओं में उद्यम को बढ़ावा देने के लिए 10 हजार नकद उनके बैंक खातों में डाले। एक करोड़ नौकरी व रोजगार का वादा किया। सामाजिक सुरक्षा पेंशन में 700 रुपए का इजाफा किया और 125 यूनिट बिजली फ्री कर दी। एग्जिट पोल के मुताबिक पब्लिक ने नीतीश पर भरोसा किया है और तेजस्वी के वादों को नकार दिया।
नीतीश कुमार को बीमार – लाचार कहा जाता रहा,जबकि नीतीश ने जमकर चुनावी सभा और रोड शो कर चुनाव प्रचार भी किया। नरेंद्र मोदी, केंद्र के केबिनेट मंत्रियों और भाजपा शासित मुख्यमंत्रियों का भी साथ उन्हें मिला। दूसरी ओर महागठबंधन में सीटों के लिए आखिरी वक्त तक मारामारी मची रही। एक दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार उतारने में होड़ लगी रही। घटक दलों के नेता एक दूसरे के खिलाफ कम से कम 6 सीटों पर चुनाव प्रचार करते रहे। मतदाता पुनरीक्षण अभियान का मुद्दा राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष ने प्रमुखता से उठाया, जो बिहार में बेअसर दिख रहा है।
सबसे बड़ी कारण जो लालू के लाल के पिछड़ने के कारणों में समझा जा रहा है वो इस चुनाव को नीतीश कुमार बनाम तेजस्वी यादव का होना समझा जा रहा है। शायद कांग्रेस इसलिए महागठबंधन में मुख्यमंत्री की घोषणा से बचती रही थी। एनडीए में भी मुख्यमंत्री को लेकर थोड़ी विवशता देखी गयी, पर बडे़ ही तरीके से नीतीश कुमार के नेतृत्व और बिहार में मुख्यमंत्री के पद खाली नहीं है, बोलकर मैनेज कर लिया गया। जैसे ही यह चुनाव नीतीश कुमार बनाम तेजस्वी यादव हुआ, इसको धीरे धीरे चालाकी से नीतीश बनाम लालू यादव और फिर नीतीश कुमार के सुशासन बनाम लालू यादव के जंगलराज- भ्रष्टाचार का बना दिया गया। लालू परिवार पर जहां भ्रष्टाचार के दाग हैं, वहीं नीतीश कुमार लम्बे समय तक मुख्यमंत्री रहते हुए भी स्वच्छ छवि के जाने जाते हैं।
एनडीए के सभी नेता और स्वयं प्रधानमंत्री मोदी जी भी हर जनसभाओं में इस जंगलराज के मुद्दों पर ही जोर देकर जनता को समझाने की कोशिश में लगे रहें। महागठबंधन सिवा इसे पुरानी बात और गलत बात या फिर वर्तमान कानून अव्यवस्था पर कहने के अलावा अंत तक कोई काट नहीं ढूंढ पायी । एनडीए के मजबूत चुनावी प्रबंधन ने महागठबंधन को इससे निपटने का मौका तक नहीं दिया। और शायद घर से अभूतपूर्व संख्या में निकले महिलाओं और युवाओं ने इसी जंगलराज और भ्रष्टाचार को ध्यान में रखकर मतदान किया, जिसे एजेंसियों ने अपने एग्जिट पोल में दिखाया।
वैसे, यह सिर्फ एग्जिट पोल है और बिहार एग्जिट पोल्स के नतीजे अगर सही साबित होते हैं तो एक बार फिर राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, वाम दल और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के महागठबंधन के लिए सत्ता दूर की कौड़ी साबित होगी। वहीं नीतीश कुमार के नेतृत्व में भाजपा, जदयू, लोजपा, हम पार्टियां एकबार फिर से बिहार में सत्ता हासिल कर पायेगी। अब चुनाव परिणाम के लिए 14 नवंबर का इंतजार करना चाहिए, एग्जिट पोल के नतीजों से सिर्फ अनुमान भर ही लगाया जा सकता है। अगर यह एग्जिट पोल सही होते हैं तो महागठबंधन के हार का कारणों में चुनाव का नीतीश कुमार बनाम तेजस्वी यादव का होना प्रमुख रूप से माना जायेगा।
