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हूल दिवस पर भाजपा जिला इकाई दुमका ने सिद्धो-कान्हू की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर दी श्रद्धांजलि

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कांग्रेस की सरकारों ने 70 साल तक संथाल हूल के इतिहास को छुपा कर रखा- सीता सोरेन

 

दुमका : संथाल हूल दिवस के अवसर पर मंगलवार को भाजपा जिला इकाई दुमका ने पोखरा चौक स्थित सिद्धो-कान्हू की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर 1855 के हूल विद्रोह के महानायकों को श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम का नेतृत्व भाजपा जिला अध्यक्ष रूपेश कुमार मंडल ने किया।

जिला अध्यक्ष रूपेश कुमार मंडल ने इस मौके पर कहा कि 30 जून 1855 को सिद्धो-कान्हू ने जिस हूल की शुरुआत की थी, वो अंग्रेजों के खिलाफ भारत का पहला संगठित जन-आंदोलन था। दुख की बात है कि कांग्रेस की सरकारों ने 70 साल तक इस इतिहास को छुपा कर रखा। स्कूल की किताबों में संथाल हूल का जिक्र तक नहीं था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भोगनाडीह आकर शहीदों को नमन किया और दुनिया को बताया कि देश की आजादी की पहली लड़ाई झारखंड की इस मिट्टी से लड़ी गई थी।

वही प्रदेश कार्यसमिति सदस्य परितोष सोरेन ने कहा कि भाजपा ने हूल दिवस को राजकीय मान्यता दी, भोगनाडीह का विकास किया, कांग्रेस ने आदिवासियों को सिर्फ वोट बैंक समझा, भाजपा ने सम्मान दिया। भाजपा दुमका लोकसभा की पूर्व प्रत्याशी सह पूर्व पूर्व विधायिका सीता सोरेन ने कहा कि 30 जून 1855 का हूल सिर्फ पुरुषों की लड़ाई नहीं थी। फूलो-झानो जैसी वीरांगनाओं ने भी अंग्रेजों से लोहा लिया था। लेकिन कांग्रेस की सरकारों ने 70 साल तक संथाल हूल के इतिहास को छुपा कर रखा। हमारी बहन-बेटियों के बलिदान को किताबों से गायब कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भोगनाडीह आकर न सिर्फ सिद्धो-कान्हू को नमन किया, बल्कि संथाल समाज की महिलाओं को भी राष्ट्रीय मंच पर सम्मान दिया।

हूल दिवस पर भाजपा विधायक देवेंद्र कुंवर ने कहा कि 1855 का हूल विद्रोह सिर्फ संथाल समाज का नहीं, बल्कि संथाल परगना के सभी आदिवासी और मूलवासियों की साझा लड़ाई थी। सिद्धो-कान्हू मुर्मू जी के नेतृत्व में हर वर्ग-समाज के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की पहली जंग लड़ी थी।
हूल दिवस हमें याद दिलाता है कि यहां के आदिवासी और मूलवासियों ने देश की आजादी की पहली लड़ाई लड़ी। ये लड़ाई ‘जल-जंगल-जमीन’ बचाने के लिए थी। सिद्धो-कान्हू मुर्मू के आह्वान समाज के हर वर्ग के लोग एक साथ खड़े हुए थे। सबका योगदान है, सबको नमन करता हूं|

उन्होंने कहा कि भाजपा की नीति ‘सबका साथ, सबका विकास’ हूल की उसी भावना का विस्तार है, जहां सब एकजुट होकर अन्याय के खिलाफ लड़े थे, को सरकारी मान्यता दी, भोगनाडीह को तीर्थ स्थल बनाया। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ से लेकर ‘लखपति दीदी’ तक – मोदी जी ने आदिवासी बहन-बेटियों को असली ताकत दी है।

जरमुंडी विधायक देवेंद्र कुंवर ने कहा कि 1855 का हूल विद्रोह सिर्फ संथाल समाज की नहीं, बल्कि संथाल परगना के सभी आदिवासी और मूलवासियों की साझा लड़ाई थी। सिद्धो-कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में हर वर्ग-समाज के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की पहली जंग लड़ी थी। हूल दिवस हमें याद दिलाता है कि यहां के आदिवासी और मूलवासियों ने देश की आजादी की पहली लड़ाई लड़ी। ये लड़ाई ‘जल-जंगल-जमीन’ बचाने के लिए थी। सिद्धो-कान्हू मुर्मू जी के आह्वान समाज के हर वर्ग के लोग एक साथ खड़े हुए थे। सबका योगदान है, सबको नमन करता हूं.
उन्होंने कहा कि भाजपा की नीति ‘सबका साथ, सबका विकास’ हूल की उसी भावना का विस्तार है, जहां सब एकजुट होकर अन्याय के खिलाफ लड़े थे|
मौके पर विधायक देवेंद्र कुंवर, पूर्व प्रत्याशी सीता सोरेन, सुरेश मुर्मू, जिलाध्यक्ष रूपेश मंडल, जिला महामंत्री मृणाल मिश्रा, धर्मेंद्र सिंह, अंजुला मुर्मू, अमिता रक्षित, रवींद्र बास्की, पवन केसरी, बिमल मरांडी, सोनी हेंब्रम, पिंटू अग्रवाल, गायत्री जायसवाल, श्रीधर दास, मनोज साह, नीतू झा, पंकज वर्मा, ओम केसरी, अनुज आर्य, अजय गुप्ता, किशोरेंद्र दास, सुदीप राउत, नवल किस्कू, दिनेश सिंह सहित अन्य कार्यकर्ता मौजूद रहे।

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