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पेंटिंग का काम छोड़ आधुनिक खेती से आत्मनिर्भर बने प्रेमनाथ महतो

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Arjun Kumar…✍️

नामकुम (रांची)। सीमित आय और आर्थिक चुनौतियों के बीच पेंटिंग (रंगाई-पुताई) का कार्य करने वाले प्रेमनाथ महतो ने आधुनिक खेती अपनाकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम की है। तीन एकड़ कृषि भूमि पर वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाकर आज वे प्रतिवर्ष लगभग 3 से 4 लाख रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं। प्रेमनाथ महतो के परिवार में चार सदस्य हैं। पहले पेंटिंग के कार्य से होने वाली आय परिवार का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। ऐसे समय में उन्होंने आधुनिक तकनीकों के साथ खेती को आजीविका का आधार बनाने का निर्णय लिया। इस परिवर्तन में उषा मार्टिन फाउंडेशन ने महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया। फाउंडेशन के हेड डॉ. मयंक मुरारी के मार्गदर्शन में उन्हें प्रत्येक सीजन के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण बीज, स्ट्रॉबेरी के पौधे, गेंदा फूल के बीज, ड्रिप सिंचाई प्रणाली, पॉली शेड नेट तथा सोलर इंसेक्ट ट्रैप उपलब्ध कराए गए। साथ ही आधुनिक खेती, फसल प्रबंधन एवं वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों का प्रशिक्षण और निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया गया। प्रेमनाथ महतो ने अपनी तीन एकड़ भूमि पर टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च, फूलगोभी, खीरा, स्ट्रॉबेरी तथा गेंदा फूल की खेती शुरू की। ड्रिप सिंचाई प्रणाली से जल संरक्षण हुआ, पॉली शेड नेट से पौधों की बेहतर वृद्धि हुई तथा सोलर इंसेक्ट ट्रैप के माध्यम से कीट प्रबंधन अधिक प्रभावी बना। इससे फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा खेती की लागत और जोखिम में कमी आई। आज आधुनिक खेती के माध्यम से प्रेमनाथ महतो प्रतिवर्ष लगभग 3 से 4 लाख रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं। उनकी आय में लगभग तीन गुना वृद्धि हुई है, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है। अब वे अपने बच्चों की शिक्षा, खेती में पुनर्निवेश तथा परिवार की अन्य आवश्यकताओं को सहजता से पूरा कर रहे हैं। प्रेमनाथ महतो का कहना है, “यदि खेती को आधुनिक तकनीक, गुणवत्तापूर्ण बीज और सही मार्गदर्शन के साथ किया जाए, तो यह सबसे लाभदायक व्यवसाय बन सकती है। उषा मार्टिन फाउंडेशन के सहयोग ने मेरी जिंदगी बदल दी। आज खेती ही मेरे परिवार की मुख्य आय का स्रोत है और मैं अन्य किसानों को भी आधुनिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित करता हूँ।” प्रेमनाथ महतो की सफलता इस बात का सशक्त उदाहरण है कि आधुनिक कृषि तकनीकों, गुणवत्तापूर्ण कृषि आदानों, संस्थागत सहयोग और किसान की मेहनत के समन्वय से खेती को लाभकारी एवं टिकाऊ आजीविका का माध्यम बनाया जा सकता है। उनकी उपलब्धि आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

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