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शहरबेड़ा में दर्जनों चिमनी व बंगला ईट भट्ठों ने किसानों की जमीन

को जबरन खोदकर किया बर्बाद, सरकारी नियमों को ताक पर रखकर

चला रहे है भट्टा के संचालक, किसानों को भूखमरी के साथ कई

बीमारीयों में झोख रहे है भट्टा के संचालक…..

(किसान उपायुक्त से भूमि संरक्षण का लगाया गुहार)

सरायकेला (सुदेश कुमार) – जिले को प्रदुषण मुक्त और वन भुमि और नदी जल संरक्षण को लेकर उपायुक्त सरायकेला अरवा राजकमल के द्वारा ठोस कदम उठाये है और आमजनों की समस्य को सीधे सुनकर कार्रवाही करने का अवाशसन दिये है ।

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उपायुक्त को द्वारा अपील के बावजूद सरायकेला जिले के चाण्डिल प्रखण्ड के शहेरबेड़ा के स्वर्णरेखा नदी किनारे और दलमा से महेज 200 से 300 मीटर ग्रामीण क्षेत्र में कुकुरमुत्ते की तरह सारे नियम कायदे को ताक रख कार्य किया जा है । मिट्टी का कटाव रोकने के लिए जहां नदियों के किनारे ईट भट्ठों पर प्रतिबंध लगा है वहीं वायु प्रदूषण रोकने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से चिमनी व बंगला ईट भट्ठों पर पाबंदी लगाई गई है। इसके बावजूद जिले के अधिकांश क्षेत्रों में अफसरों की सांठगांठ से ईट भट्टा धड़ल्ले से चल रहे हैं। इससे भट्ठा मालिक मालामाल होते जा रहे हैं। पर लोगों के जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहा है. आलम यह है कि ईंट भट्ठा वाले ऐसे गांव के लोग सांस से संबंधित बीमारी, दमा , टीबी समेत अन्य रोगों से ग्रसित होकर अस्पतालों का चक्कर काट रहे हैं. ।

ईंट भट्ठा लगाने का प्रावधान :-

 

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ईंट भट्ठा का संचालन गांव, टोले व मुहल्ले के कम से कम दो किलो मीटर की दूरी होनी चाहिए. लेकिन नियम और कानून के विपरीत चिमनी संचालक द्वारा उक्त कार्य को अंजाम दिया जा रहा है. हैरत बात तो यह है कि प्रखंड क्षेत्र के अधिकांश संचालक एक चिमनी भट्ठा का लाइसेंस लिया जाता है. साथ ही वे कई स्थानों पर इस कार्य को अंजाम दे रहे हैं. इन बातों से विभाग अवगत भी है. बावजूद इसके ऐसे संचालकों पर विभाग द्वारा किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं किया जा रहा. जो लोगों के समझ से परे है.

क्या कहते हैं डॉक्टर

इस बाबत जब चिकित्सक डॉ डी एन यादव जानकारी ली गयी तो उन्होंने बताया कि चिमनी से निकलने वाले धुएं से सांस, एलर्जी, केंसर जैसे भयानक रोग के चपेट में आ सकते हैं. लोगों को चिमनी से निकलने वाले धूएं से बचाव करना निहायत जरूरी …..

बगैर अनुमति नहीं खुल सकते भट्ठे फिर भी किन नियमों के तहत् शहेरबेड़ा में

दर्जनों चिमनी भट्टे खुले :-

सरकारी नियम के अनुसार प्रदूषण नियंत्रण तहसील तथा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति के बगैर चिमनी वाले ईट भट्ठा नहीं खोले जा सकते हैं। मिट्टी वाले नए ईट भट्ठा खोलने की अनुमति पर भी रोक लगी है। इसके बावजूद हर साल स्वर्णरेखा नदियों के किनारे बड़ी संख्या में नए ईट भट्ठे खुल रहे हैं। मिट्टी वाले ईट पर सरकारी कार्य तो नहीं हो रहे हैं पर निजी भवन एवं अन्य निर्माण कार्याे में मिट्टी से बनी लाल ईट का ही इस्तेमाल हो रहा है। जिसका वर्तमान में प्रति ढाई हजार ईट का दाम 18 से 20 हजार रुपये है।

ईंट्ट भट्टा ने काटी स्वणरेखा नदी की तटबंध जल्द दिखेंगी गांव के अन्दर स्वर्ण रेखा

का पानी :-

शहरवेड़ा और कान्दरवेड़ा गांव स्वर्णरेखा नदियों के किनारे बसा है और नदी किनारे खुलेआम ईट भट्ठों के लिए मिट्टी की खुदाई होने से भूमि का कटाव बढ़ता ही जा रहा है नदी को तटबंध को मिटट्ी खुदाई कर काट दिया गया है । जिस कारण बरसात में भारी मात्र में पानी गांव में प्रवेश होने से किसानों की फसाल नष्ट हो जाता है । वहीं धुआं उड़ने से आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण भी फैल रहा है। ईट भट्ठों की मिट्टी खेतों में जाने से जमीन भी दूषित हो रहा है।

मामला क्या है :-

शहरवेड़ा गांव के अन्दर एस एन एस चिमनी भाट्टा संचालक रामकेवल औरा अभय सिंह द्वारा संचालित किया जा रहा है । जो आसनबनी पंचायत के अधिन शारहवेड़ा गांव और स्वर्णरेखा नही के किनारें स्थापित है । वही भट्टे के निकट होने के कारण संचालक द्वारा 12 घर बसे है जिसे नीचे की मिट्टी को काट कर सभी किसानों को बेधर करने के उद्देश से घर के नीचे की मिट्टी काटा जा रहा है जिसका विरोध किसान सुरेन्द्र महतों द्वारा कियें जाने से संचालक के द्वारा घमकी दी गई । किसान का कहना है कि क्षेत्र के सभी सरकारी और रैयती जमीन का 10 फीट माटी काट लिया गया जिससे स्वर्णरेखा नदी का पानी खेत में जमा हो जाता है । अब भट्टा संचालक हम सबों को बेधर करना चहता है । हम लोगों को जनकारी का अभाव होने के कारण स्थानीय प्रशसन द्वारा भी दबाव दिया जा रहा है ।

वही जिला प्रसाशन से किसान अनुरोध कर रही है कि घर और खेतीहर भूमि को बचाया जाये