
डुमुरिया : परंपरा के तहत सोहराय पर्व का दो दिवसीय सेमिनार आयोजित
रिपोर्ट : प्रभाकर कुमार
# अमावस्या के बजाय पूर्णिमा के सोहराय पर्व को आदिवासियों का पारंपरिक पर्व बताया
झोराड़ीह : अखिल भारतीय सरना धर्म चेमेद आसड़ा, झोराड़ीह, मयूरभंज (ओडिशा) के तत्वावधान में 18 एवं 19 अक्टूबर 2026 तक दो दिवसीय सोहराय सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार में झारखंड, ओडिशा, बिहार और पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
सेमिनार में आदिवासी समाज के पारंपरिक पर्व सोहराय की पहचान, परंपरा और धार्मिक महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि सोहराय आदिवासी समाज का पारंपरिक पर्व है, जिसे परंपरागत रूप से सोहराय महीने की पूर्णिमा के अवसर पर मनाया जाता है।

सेमिनार में यह भी बताया गया कि अमावस्या के अवसर पर मनाए जाने वाले सोहराय को आदिवासी समाज के मूल पारंपरिक पर्व के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वक्ताओं ने इसे दीपावली से जोड़ते हुए कहा कि आदिवासी समाज को अपने पारंपरिक सोहराय पर्व की मूल पहचान और परंपराओं को समझने तथा संरक्षित करने की आवश्यकता है।
वक्ताओं के अनुसार सहराय पर्व में बैल और गोमाता का विशेष महत्व है। पर्व के दौरान पशुओं को धान के फूल से सजाया जाता है तथा उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। यह पर्व पांच दिनों तक विभिन्न पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है।
सेमिनार के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के आदिवासी समाज को जागरूक करते हुए आह्वान किया गया कि वे अपनी पारंपरिक संस्कृति, पर्व और धार्मिक पहचान को सुरक्षित रखें तथा सोहराय चौँदो कुनामी यानी पूर्णिमा के सोहराय को ही पारंपरिक आदिवासी पर्व के रूप में मनाने की दिशा में समाज को जागरूक करें।
कार्यक्रम में अखिल भारतीय सरना धर्म चेमेद आसड़ा के अध्यक्ष कान्हू राम हुई, उपाध्यक्ष हीरामुनी मुर्मू, महासचिव निरोमुनि मुर्मू,, आयोजक गोपाल टुडू, बुढ़ान सोरेन, ओकील मुर्मू, बनाव मुर्मू, दास्मात सोरेन, जितराई टुडू, जादुनाथ सोरेन सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता एवं प्रतिनिधि उपस्थित थे।
