
घाटशिला : उपचुनाव का परिणाम कुछ भी क्यों न हो, अंत में समीक्षा तो करनी ही होगी…
दीपक नाग… ✍️

पच्चीस साल पहले १५ नवंबर के दिन झारखंड राज्य का उदय हुई थी और लोगों को एक नया पहचान मिला था। आज यह राज्य २६ वर्ष आयु में कदम रखा है। साथ है घाटशिला विधानसभा को झारखंड मुक्ति मोर्चा का एक नया युवा चेहरा सोमेश चंद्र सोरेन के रुप मे विधायक स्वरूप मिला है।
चुनावी समर पर तो पूर्ण विराम लग गया है पर हार-जीत पर मंधन होना बाकी है अभी ? जीतने वाले जीत का जश्न मनाएंगे तो पराजीत होने वाले कारणों को तलाशेंगे जरुर। मंथन होगा, अपने और दुसरे की खामियाजा ढूंढा जाएगा । क्यों कि, देखते-ही-देखते तीन साल गुज़रने में वक्त नहीं लगेगा। अगली बार दुबारा ऐसी गलतियां ना हो इस पर विचार भी किया जाएगा।
बहरहाल, चुनाव में भाग लेने वाले प्रत्याशी और पार्टी के लोग अपने समय अनुकूल मंथन करेंगे। पर हम इस पर अपने तरीकों से विचार जरुर करना चाहेंगे।
चुनावी कुरुक्षेत्र में झामुमो और भाजपा के बीच मुकाबला तो होना सबों को स्वाभाविक लग रहा था। जबकि, जेएलकेएम ने भी अपने सीमित संसाधनों के साथ इस दंगल में जनमत जुटाने में अपने और से कोई कसर नहीं छोड़ी थी । यह और बात है कि, जेएलकेएम प्रतिस्पर्धा से काफी दूर रह गया।
हम आरंभ करते हैं क्षेत्रीय राजनीतिक दल ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ के विजय रथ के कथा से। मै समझता हूं झामुमो के सफलता के कारणों को ढूंढ पाए तो, अन्य सारे प्रत्याशी के खेमें में कमियां में खामियों का आलोचना करने की जरूरत नहीं होगी । आप खुद ही कारणों को समझ सकेंगे।

भावनात्मक लाभ :
घाटशिला विधानसभा के पूर्व विधायक सह मंत्री दिवंगत रामदास सोरेन के पुत्र होने से उनके पुत्र सोमेश चंद्र सोरेन को मतदाताओं का भावनात्मक सहानुभूति मिलना स्वाभाविक था। क्यों कि, दिवंगत रामदास सोरेन के लंबे कार्यकाल में उन्होंने भले ही अनेकों के लिए विशेष कुछ कर नहीं सका, पर किसी का प्रत्यक्ष रूप से बुरा नहीं किया। जिस कारण, विपक्ष के लोग भी उनके खिलाफ कोई कटाक्ष करते नहीं देखा गया। साधारणतः राजनीतिक गलियारों में बहुत ही कम लोग होंगे जो स्व. रामदास सोरेन के तरह कटु आलोचनाओं से परे रहे होंगे । स्वर्गीय रामदास सोरेन का इन गुणों को झुठलाना संभव नहीं है। इसके एक अच्छा प्रतिफल चुनावी कुरुक्षेत्र मे उनके पुत्र को अवश्य अनुभव हुआ होगा । उदाहरण के लिए, बिहार में तेजस्वी यादव को अपने पिता के शासन काल का बुरी तरह झटका इस चुनाव में खाना पड़ा।
मंईया सम्मान योजना :
मंईया सम्मान योजना पिछले चुनाव की भांति इस चुनाव में भी ‘मास्टर स्ट्रोक’ का काम किया है। मतदान होने से पहले एक महिने पहले से ही ढाई हजार करके तीन बार यानी साढ़े सात हजार रुपए लाभार्थी महिलाओं के बैंक के खाते में झामुमो सरकार के द्वारा भेजा जाना अलाउद्दीन का चिराग साबित हुआ। परिणाम स्वरूप महिलाओं ने इस चुनाव में बढ़चढ़ कर अपना भागेदारी निभाईं। ठिक ऐसा ही आर्थिक लाभ बिहार के चुनाव में देखा गया। एनडीए सरकार ने चुनाव से पहले एकमुश्त दस हजार रुपए देकर महिलाओं का सोच ही बदल डाला। परिणाम भी सामने है ‘इडिया गठबंधन’ का चुनाव में गर्दा उड़ गया ।
कैडर बेस्ड पार्टी है झामुमो :
झारखंड मुक्ति मोर्चा का आरंभ एक संगठन के रुप में हुई थी। आगे चलकर राजनीतिक पार्टी का स्वरूप धारण किया। झारखंड अलग राज्य की लंबी लड़ाई लड़ने का लंबा अनुभव रहा है। जिसकारण, धरातल से जुड़े कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है। वैसे बता दूं कि, झारखंड मुक्ति मोर्चा में पार्टी के पदाधिकारियों को मनोनित नहीं किया जाता है! पार्टी के सक्रिय सदस्यों के द्वारा चुनाव किया जाता है। जिसे अधिक मत मिलता है वह अध्यक्ष बनते हैं। अध्यक्ष बने रहने के लिए सक्रिय कार्यकर्ताओं को जीवित रखना जरूरी हो जाता है। यही वजह है कि, किसी भी गांव, मोहल्ले में कम-से-कम एक झामुमो कार्यकर्ता आपको जरूर दिखाई देगी।
चुनाव चिन्ह या प्रतिक चिन्ह :
किसी भी समाज में कोई न कोई प्रतिक चिन्ह होता है। जो उस समाज के आस्था और भावनाओं से जुड़ा होता है। संथाली आदिवासी में इस चिन्ह को ‘आर-सार’ कहा जाता है, यानी ‘तीर-धनुष’। तीर धनुष संथाली आदिवासी परंपरा से जुड़ा हुआ है। यह उन लोगों के लिए केवल एक चुनाव चिन्ह मात्र नहीं है। यही वजह है कि, इस समाज के एक बड़ा हिस्सा को आप चाहे कितना भी कोशिश कर लो बरगला नहीं पाएंगे।
मालिकाना सोच :
मैंने अपनी लंबी पत्रकारिता जीवन में पहली बार देखा है जब, पार्टी का एक अदना सा कार्यकर्ता का सोच ऐसा हो गया था जैसे चुनावी मैदान में वह खुद जीत के लिए लड़ रहा हो ! आम तौर पर देखा गया कि, चुनावी सत्र में कार्यकर्ता अपने प्रत्याशी को जीत दिलाने के लिए कोशिश जरूर करते हैं और एक जिम्मेदारी निभाते देखा जाता है। इस बार चुनावी दंगल में झामुमो को छोड़कर बाकी सारे चुनावी खेमों में कार्यकर्ताओं के बीच के भावनाओं में फर्क देखा गया। जिसका परिणाम १४ नवंबर को सबों ने देखा।
कार्यकर्ता दादा कहते थें :
दिवंगत रामदास सोरेन को इस विधानसभा में पार्टी के सारे नर-नारी प्यार से दादा कह कर पुकारते थें। अब सोचिए उनके उत्तराधिकारी के रुप में पुत्र सोमेश जब सब के सामने आया होगा तो सबों ने उसे एक ‘भतिजा’ के रुप में स्वीकारा होगा ् न ? सोचिए जरा एक मात्र भतीजा को इससे बड़ा विश्वास युक्त सुरक्षा कवच और कोन दे सकता था।
आप सबों को याद होगा, जिस दिन स्व. रामदास सोरेन हमेशा के लिए अलविदा कह कर चलें गये तो कुछ ही दिनों में घाटशिला विधानसभा उपचुनाव के लिए यहां के सारे पार्टी के लोग एक सुर में सोमेश का नाम बिना पार्टी हाईकमान के इजाजत के अखबारों में, मीडिया में और सोशल मीडिया के माध्यम से घोषणा कर रखा था। ऐसा दृशय झारखंड के राजनीति में शायद ही कभी देखने मिला होगा ?
नव निर्वाचित युवा पीढ़ी का विधायक सोमेश चंद्र सोरेन के इस चुनाव में उनके अपने असिम प्रयासों के साथ-साथ चर्चा किया गया सारे सदृश और अदृश्य ताकतें काम करता रहा और झारखंड विधानसभा सभा तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। जिस कारण पहली बार किसी ने घाटशिला विधानसभा चुनाव में एक लाख से भी ज्यादा मत अपने झोली में इकट्ठा करने कि रिकार्ड बना सका।
इस चुनाव में सोमेश चंद्र सोरेन के पास के पास जितने सारे चुनावी ब्रह्म अस्त्र मौजूद था, शायद ही किसी दुसरे योद्धा के पास रहा होगा, जिससे कि, चुनावी चक्रव्यूह के संरचनाओं को भेद सके।
