
घाटशिला : विधानसभा उपचुनाव के कुरुक्षेत्र में हैं “दो युवा सोरेन हुए आमने-सामने”
दीपक नाग …✍️

आज 17 अक्टूबर के दिन झामुमो के प्रत्याशी सोमेश चंद्र सोरेन और भाजपा के प्रत्याशी बाबुलाल सोरेन ने पार्टी टिकट से घाटशिला अनुमंडल अधिकारी के दफ्तर में पारी-पारी अपने आवेदन जमा कर नामांकन दर्ज करवाया। दोनों प्रत्याशियों ने अपने पीछे लम्बी कांरवा लेकर नोमिनेशन करने गए थें। झामुमो के प्रत्याशी का नामांकन दर्ज करवाने स्वयं झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन साथ मौजूद थे। दुसरी ओर झारखंड के दो पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी और चंपाई सोरेन भाजपा प्रत्याशी को नामांकन करवाने के दौरान साथ मौजूद थें।
अब आते हैं मुख्य बातों पर, घाटशिला विधानसभा उपचुनाव में घमासान इस बार लगता है झारखंड राज्य में पहली बार दिलचस्प और कुटनीतिज्ञ घमासान का रिकार्ड तोड़ने वाला है। क्यों कि, चुनावी मैदान में भले ही दो युवा सोरेन आमने-सामने दिख रहा है पर परिदृश्य कुछ भी इशारा कर रहा है । जिसे फिल्माया नहीं जा सकता है पर अनुभव आसानी से की जा सकती है। ऐसा लगता यह चुनाव दो युवाओं के बीच हार-जीत का सिर्फ फैसले की नहीं है। ऐसा लगा है जैसे राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री के बीच प्रतिष्ठा की परिक्षा है!
इतना तो स्पष्ट है यह सीधे टक्कर झामुमो और भाजपा के बीच की है। एसमे कोई “किन्तु-परंतु” की बात ही नहीं है। अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए दोनों राजनीति पार्टी मतदाताओं के बीच “फुल सेंटिमेंट के फार्मूले को अप्लाई करने में लगे हुए हैं। क्योंकि, बेरोजगारी, पलायन, भ्रष्टाचार, शिक्षा, चिकित्सा वगैरह-वगैरह ‘आउट डेटेड डायलॉग्स’ हो चुकी है। ऐसी बातें सुनते-सुनते लोगों को कंठ्यस्थ हो गया है। जनता समझ चुके हैं कि, सरकार बदलते रहती है पर व्यवस्था नहीं। इस विधानसभा उपचुनाव में पहली भाजपा बार-बार बंग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दे को प्रमुखता देकर झारखंड राज्य का डेमोग्राफी खतरे में बता रहे हैं तो दुसरी और झामुमो ने आदिवासी-मूलवासियों के स्मिता भाजपा से खतरे की बात कह रहें हैं। यह दोनों ही बातें मतदाताओं के सेंटिमेंट से जुड़ी हुई है।
ऐसे में जीत और हार कैसे तय होगा? सभा मंचों से वक्ताओं ने अपने पार्टी के कार्यकताओं को कहते सुना गया कि, “चुनाव में पार्टी प्रत्याशी सामने जरुर है पर चुनाव में लड़ना होगा आप सबों को । यह लड़ाई एक जन की नहीं सबों की है।” इसे कहते हैं सामने वाले को “सेल्फ मोटिवेटेड होना।” अर्थात, उस पार्टी के जीत-हार का भविष्य पार्टी के कार्यकताओं पर निर्भर करता है। बातें भी सही है। राजनीतिक दल की छवी + प्रत्याशी का छवी + कार्यकर्ताओं का कार्यशैली = हार या तो जीत सुनिश्चित करता है। सजग मतदाता इन तीन चीजें को देखने के पश्चात ही अपने बहुमूल्य मतदान प्रत्याशी को करतें हैं।
इससे साफ जाहिर होता है कि, यह तीनों बातें उस पार्टी के जीत के लिए अहम भूमिका निभाते हैं। चुनाव के वक्त तत्काल जो सबसे अधिक अहम् भूमिका निभाते हैं वह है पार्टी के प्रखंड स्तरीय कार्यकर्ता। अब समझने वाली बात यह कि, झामुमो और भाजपा के प्रखंड स्तरीय पदाधिकारियों की क्या स्थिति है ? घाटशिला विधानसभा के अन्तर्गत चार प्रखंड है – घाटशिला, मुसाबनी, गुड़ाबांधा और धालभूमगढ़ है ।
झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रखंड स्तरीय जिम्मेदार पदाधिकारी :-

भारतीय जनता पार्टी के प्रखंड स्तरीय जिम्मेदार पदाधिकारी :-

देखा जाए तो घाटशिला विधानसभा में लगभग 51% गैर आदिवासी संथाली समुदाय के लोग शामिल हैं। जिनमें मूलत: – हिन्दू, मुस्लिम, सीख और ईसाई शामिल हैं। भाजपा का मुख्य वोट बैंक शहरी क्षेत्रों में रहा है। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा को भी पकड़ है पर, यह पकड़ पहले के तुलना में नुकसान जरूर होता नजर आ रहा है। घाटशिला और मुसाबनी दो प्रखंड भाजपा के लिए मजबूत माना जाता रहा है। वोटिंग स्कोर भी पहले अच्छी रही है । प्रखंड की राजनीति आसान नहीं होती है। यहां, धरातल में जाकर काम करने की जरूरत होती है। अनुभव और संगठन चलाने की हुनर की जरूरत होती है। इस चुनाव में मुसाबनी और घाटशिला दोनों ही प्रखंडों कमेटी पहले की तुलना में नाजुक दिख रहा है। क्यों कि, चुनाव प्रचार प्रसार के लिए चंद दिनो ही रह गई है, पर दोनों प्रखंडों की कमेटी में शहरी राजनीति से दूर नज़र आ रही है ।
सवाल उठता है कि, दोनों राजनीतिक दल के चुनाव प्रभारी अवश्य होंगे। प्रभारियों को बारीकी से प्रखंड कमेटी के कमजोरीयों को समझने और अमीरों को निवारण करने जरूरतें हो सकता है? झामुमो के लिए जिस तरह शहरी क्षेत्रों में मजबूत पकड़ बनाने की दिशा में प्रभारियों को नजर देने की जरूरत लगता है, वहीं भाजपा के लिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अपने कमजोर कड़ी को मजबूत करने की जरूरतें एहसास हो रह है। क्या पार्टी के प्रत्याशियों के लिए यह चिंता का विषय नहीं है ? जो तन, मन, धन सब कुछ व्याय कर रहे हैं?
क्यों कि राजनीति इतिहास गवाह है किसी भी राजनीतिक दल को केवल उनके पार्टी कार्यकर्ताओं के वोट जीत नहीं दिला सकी है । जीत दिलाने वाले साधारण मतदाता होते हैं, जो किसी भी राजनीतिक पार्टी झंडा-बैनर ढोने वाले नहीं होते है। इन्हें आप छोड़ेंगे तो फिर चुनाव कैसे लड़ेंगे ? ऐसे में तो चुनावी टाइटेनिक जहाज का डुबने का भय हमेशा बना रह सकता है।
