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संस्थापक के रिश्तेदारों के निजी लाभ के लिए विद्यालय के छात्रों का भविष्य होगा अंधकारमय

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रिपोर्टर – जगबंधु महतो

कांड्रा : सरायकेला जिला अंतर्गत कांड्रा स्थित ऐतिहासिक हरिश्चंद्र विद्या मंदिर एक बार फिर चर्चा में है। विद्यालय को लेकर चल रहे विवाद में ट्रस्ट के वर्तमान निदेशक जितेन्द्र मिश्रा ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि यह पूरा विवाद केवल पैसों के लिए खड़ा किया जा रहा है। जितेन्द्र मिश्रा ने जानकारी दी कि विद्यालय के संस्थापक हरिश्चंद्र वार्ष्णेय के पोते राजकुमार वार्ष्णेय उन्हें 45 लाख रुपये में विद्यालय बेचने की पेशकश कर रहे थे जबकि विद्यालय की जमीन का खतियान विद्यालय के ही नाम पर है। उन्होंने इस प्रस्ताव को सिरे से नकारते हुए कहा कि जब यह स्कूल ट्रस्ट के नाम से है तो मैं इसे कैसे खरीद सकता हूँ। उन्होंने यह भी बताया कि 32 वर्षों से विद्यालय संचालन कर रहे शिक्षकों ने उन्हें विद्यालय संचालन के लिए एनओसी दे दी है। वर्तमान में विद्यालय में 300 छात्र पढ़ रहे हैं जबकि जब उन्होंने जिम्मेदारी संभाली थी तब केवल 51 छात्र थे। उन्होंने विद्यालय भवन की मरम्मत करवाई, बेंच-डेस्क, पुताई, और अन्य मूलभूत सुविधाएं बहाल करवाई हैं।

विद्यालय के दुर्दिन और पुनरुत्थान की कहानी

हरिश्चंद्र विद्या मंदिर एक समय कांड्रा क्षेत्र का इकलौता विद्यालय था जहाँ बारह-तेरह सौ छात्र पढ़ते थे। लेकिन फैक्ट्री बंद होने और प्रबंधन के अभाव में स्कूल की स्थिति दिनों-दिन बिगड़ती गई। शिक्षक बिना वेतन के कार्य करते रहे। एक शिक्षक को पैरालिसिस भी हो गया। आर्थिक संकट के कारण अधिकांश शिक्षकों ने विद्यालय छोड़ दिया। स्थानीय लोगों की पहल पर एक पंचायत बैठक बुलाई गई जिसमें यह निर्णय लिया गया कि विद्यालय को सरकार के अधीन कर देना ही बेहतर विकल्प है। इसके लिए प्रधान मंत्री को एक आवेदन भी भेजा गया जिसमें विद्यालय की अधिग्रहण प्रक्रिया को शीघ्रता से पूरा करने की माँग की गई।

प्रधानमंत्री को भेजा गया आवेदन

दिनांक 13 जनवरी 2023 को हरिश्चंद्र उच्च विद्यालय, कांड्रा के शिक्षकों और स्थानीय जन प्रतिनिधियों द्वारा प्रधानमंत्री को एक विस्तृत पत्र भेजा गया। इसमें बताया गया कि यह विद्यालय अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों की बहुलता वाले क्षेत्र में स्थित है। 1962 से इसे बिहार विद्यालय परीक्षा समिति की मान्यता प्राप्त है। बिहार सरकार द्वारा 1978 में जारी अध्यादेश के तहत अधिकांश निजी विद्यालयों को सरकार ने अधिगृहीत कर लिया था लेकिन सरायकेला ग्लास वर्कर्स ने विद्यालय को सरकार को नहीं सौंपा। परिणामस्वरूप यह विद्यालय लंबे समय तक उपेक्षित रहा। 1993 में कंपनी बंद हो गई जिसके बाद विद्यालय की स्थिति और भी खराब हो गई। वेतन भुगतान बंद हो गया। कई बार जिला प्रशासन, विधायक चंपई सोरेन और अन्य जनप्रतिनिधियों को पत्राचार कर विद्यालय के अधिग्रहण की माँग की गई।

विद्यालय की स्थिति और सुधार की पहल

जितेंद्र मिश्रा द्वारा स्कूल संभालने से पहले तक विद्यालय की इमारत जर्जर हो चुकी है। छत का प्लास्टर झड़ चुका था जिससे छात्र-शिक्षक दोनों असुरक्षित थे। बिजली, पंखा, पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव था। विद्यालय की चारदीवारी टूटी हुई थी जिससे चोरों का प्रवेश और जानवरों का खतरा बना रहता था। इन हालात को देखते हुए विद्यालय परिसर में दिनांक 8 जनवरी 2025 को एक आमसभा बुलाई गई जिसकी अध्यक्षता प्रधानाध्यापक विनोद वार्ष्णेय ने की। बैठक में सभी शिक्षक, अभिभावक और स्थानीय नागरिक उपस्थित हुए। सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि जितेन्द्र नाथ मिश्रा को विद्यालय संचालन की जिम्मेदारी सौंपी जाए।

जगन्नाथ मिश्रा की अपील

विद्यालय के पूर्व छात्र और सरायकेला ग्लास फैक्ट्री के मजदूर के पुत्र जगन्नाथ मिश्रा ने भी विद्यालय को बचाने के लिए कई प्रयास किए हैं। उन्होंने जिलाधिकारी, अनुमंडल पदाधिकारी और शिक्षा विभाग को पत्र लिखकर विद्यालय की मरम्मत, नए शिक्षकों की बहाली और संचालन के लिए स्थायी समिति गठन की अपील की थी। उन्होंने अपने पत्र में बताया था कि पहले इसी विद्यालय से आईपीएस, इंजीनियर, शिक्षक जैसे अनेक प्रतिभाशाली छात्र निकले हैं। विद्यालय को यदि शीघ्र मरम्मत नहीं कराई गई तो कोई बड़ी दुर्घटना हो सकती है।

विवाद की जड़ में 45 लाख की माँग?

जितेन्द्र मिश्रा का आरोप है कि जब उन्होंने विद्यालय की मरम्मत और संचालन में लाखों रुपये खर्च किए तब कुछ लोगों ने सवाल उठाना शुरू किया कि स्कूल क्यों उन्हें चलाने दिया जा रहा है। संस्थापक के पोते राजकुमार वार्ष्णेय ने स्कूल खरीदने की बात कहते हुए 45 लाख रुपये की माँग की जिसे मिश्रा ने नकार दिया। राजकुमार वार्ष्णेय से जब इस विषय में प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की गई तो उन्होंने कॉल काट दिया और जवाब नहीं दिया।

हरिश्चंद्र विद्या मंदिर एक ऐतिहासिक धरोहर है जिसे उपेक्षा, राजनीति और निजी स्वार्थ ने लगभग बर्बादी के कगार पर पहुँचा दिया। परंतु स्थानीय जनता, शिक्षकगण और कुछ जागरूक समाजसेवियों की पहल से विद्यालय को फिर से नया जीवन देने का प्रयास हो रहा है। अब यह सरकार और प्रशासन पर निर्भर है कि वह इस विद्यालय को अधिग्रहित कर इसे फिर से शिक्षा का केंद्र बना पाते हैं या यह विरासत अंततः इतिहास में खो जाएगी।

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