
कुड़मी समाज के अगुआ ने भाषा आंदोलन में लिया हिस्सा
Arjun Kumar….✍️
रांची। झारखंड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन को लेकर को जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा के बैनर तले जागरूकता आंदोलन आयोजित किया गया। मोरहाबादी मैदान से शुरू हुई पदयात्रा फिरायालाल चौक और लालपुर चौक होते हुए कोकर स्थित भगवान बिरसा मुंडा के समाधि स्थल तक पहुंची। इसमें हजारों छात्र-छात्राओं और बुद्धिजीवियों के साथ कुड़मी समाज के अगुआ शीतल ओहदार भी शामिल हुए।
इस अवसर पर शीतल ओहदार ने राज्य सरकार की भाषा नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह विडंबना है कि झारखंडी संस्कृति, भाषा और जल-जंगल-जमीन की रक्षा की बात करने वाले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाले राज्य में ही जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाएं उपेक्षा का शिकार हैं। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समाज की संस्कृति, परंपरा और पहचान की बुनियाद होती है। यदि झारखंड की मूल भाषाएं लुप्त हो गईं तो झारखंडी पहचान भी संकट में पड़ जाएगी।
ओहदार ने सरकार से मांग की कि प्राथमिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई अनिवार्य रूप से पाठ्यक्रम में शामिल की जाए। उन्होंने कहा कि कई विश्वविद्यालयों में अब भी क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई की समुचित व्यवस्था नहीं है। इसके कारण इच्छुक छात्र-छात्राएं अपनी मातृभाषा का अध्ययन करने से वंचित रह जा रहे हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने समय रहते ठोस पहल नहीं की और भाषा संरक्षण से जुड़े प्रावधानों को सख्ती से लागू नहीं किया तो झारखंड की कई समृद्ध भाषाएं विलुप्ति के कगार पर पहुंच जाएंगी। भाषा संरक्षण के लिए केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है।
