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नशा से समाज में दुष्प्रभाव, संस्कृति संरक्षण और सप्ताहिक मंझी थान पूजा को बढ़ावा देने हेतु चलाया जा रहा जागरूकता अभियान

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दुमका संवाददाता- मौसम गुप्ता

समाजसेवी सच्चीदानंद सोरेन द्वारा विभिन्य आदिवासी गांवो में कुल्ही दुरुप(बैठक) कर ग्रामीण बच्चों को नशा से बचा कर रखने, नशा से समाज में दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करने तथा अपने धर्म, संस्कृति एवं पारंपरिक पर्व-त्योहारों के संरक्षण हेतु जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। इसी क्रम में बुधवार को दुमका प्रखंड के माचखिचा गांव में समाजसेवी सच्चिदानंद सोरेन की पहल पर गांव के मंझी बाबा राजा मरांडी की अध्यक्षता में कुल्ही दुरुप (बैठक) आयोजित की गई।

बैठक को संबोधित करते हुए श्री सोरेन ने कहा कि संताल परगना के अधिकांश आदिवासी गांवों में बुजुर्गों की संख्या लगातार कम होती जा रही है, जिसका प्रमुख कारण अत्यधिक नशापान है। उन्होंने कहा कि आज छोटे-छोटे बच्चे भी नशे की चपेट में आ रहे हैं, जो समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।ग्रामीणों ने स्वीकार किया कि यह एक बड़ी समस्या है। समाजसेवी सच्चीदानंद सोरेन ने आगे कहा कि बच्चो को नशा से बचाने के लिए गांव के बाहर से कोई लोग नही आयेगे, हमारे गांव के बच्चे है,अपने घर के बच्चे है इसलिए हम सभी माता-पिता, परिजन और गांव को ही आगे आकर बच्चो को नशापान से बचाना होगा। उन्होंने आगे कहा कि बच्चे जो देखते है, वे वहीं सीखते है। इसलिए सभी माता-पिता यह शपथ ले कि बच्चों के सामने न तो नशापान करे और न ही बच्चो को दारू लाने के लिए कहे, क्योकि जब बच्चे अपने माता-पिता को नशापान करते देखते है तो बच्चे के मन में बचपन से ही यह धर कर जाता है कि दारू पीना ठीक है, क्योकि हमारे स्वंय के माता-पिता दारू पीते है। श्री सोरेन के आग्रह पर पर सभी ग्रामीणों ने शपथ लिया कि अब से बच्चों के सामने न तो नशा करेगे और न ही बच्चो से दारू मंगवायेगे|

आगे ग्रामीणों को संबोधित करते हुए समाजसेवी सच्चीदानंद सोरेन ने कहा कि अधिकाश गांवो में सोहराय, बाहा आदि पर्व में पूजा के समय सिर्फ लेखा होड़(गांव को चलाने वाले) रहते है, ग्रामीण पूजा के समय नही रहते है, यह चिंता का विषय है। क्योकि सोहराय, बाहा आदि पर्व पूरे गांव का पर्व है। इस पूजा में सभी बच्चे और ग्रामीणों को अवश्य भाग लेना चाहिय। अगर आज हम सभी और हमारे बच्चे पूजा में भाग नही लेगे तो भविष्य में नयी पीढ़ी तक यह परंपरा, धर्म और संस्कृति आगे नही जा पायेगी।जिससे संताल आदिवासियों का पूजा, पर्व, धर्म, संस्कृति धीरे-धीरे विलुप्त होने लगेगी| इसलिए युवा पीढ़ी और बच्चो का सांस्कृतिक, धार्मिक आयोजनों में भाग लेना अत्यंत ही जरुरी है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आजकल बच्चे, बड़े लोग मंझी थान एवं जाहेर थान जैसे पवित्र स्थलों के पास से गुजरते समय डोबोह(प्रणाम) नहीं करते, जो सांस्कृतिक मूल्यों में गिरावट को दर्शाता है। इस पर ग्रामीणों ने अपनी गलती स्वीकार की और सुधार का संकल्प लिया।आगे श्री सोरेन ने कहा कि हमारे संताल गांव में वैसी व्यवस्था नही है कि घर में कोई दुःख तकलीफ होने पर मंझी थान में जाकर इष्ट देवी-देवता से सुख शांति के लिए प्राथना कर सके| गांव में ऐसी व्यवस्था नही होने के कारण हमारे अपने लोग कोई दुःख तकलीफ होने पर बाहर जाकर घर की सुख शांति के लिए प्रार्थना/पूजा करते है।समाज को इस दशा से बचाने के लिय श्री सोरेन ने प्रत्येक रविवार को सभी महिला-पुरुष, बच्चे, बुजुर्ग मिलकर मंझी थान में साप्ताहिक सामूहिक पूजा प्रारंभ करने का प्रस्ताव रखा। इससे बच्चे अपने पूजा,पर्व और संस्कृति को जान पायेगे और बच्चो को सकारात्मक जीवन मूल्यों की ओर प्रेरित करने के लिए विशेष विनती(प्रार्थना)किया जायेगा, जिसमें नशा से दूर रहने, नियमित रूप से विद्यालय जाने, माता-पिता एवं बुजुर्गों की सेवा और सम्मान करने और सामाजिक कार्यो में भाग लेने का संदेश दिया जायेगा। इसके साथ साथ बड़े-बुजुर्ग, माता-पिता अपने घर के सुख शांति के लिय मंझी थान में पूजा व प्राथन करने का अवसर प्राप्त होगा।समाजसेवी सच्चीदानंद सोरेन ने आतु लेखा होड़(गांव को चलाने वाले) और ग्रामीणों से पूछा कि क्या मंझी थान में महिला पूजा कर सकती है ? इस पर सभी ने एक स्वर में कहा कि हाँ मंझी थान में महिलाएं भी पूजा कर सकती है। गांव के मंझी बाबा, आतु लेखा होड़ एवं सभी ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से साप्ताहिक रविवार पूजा प्रारंभ करने का समर्थन किया और इसे शीघ्र लागू करने का निर्णय लिया।समाजसेवी सच्चीदानंद सोरेन ने कहा कि सप्ताहिक मंझी थान पूजा ही सामुदायिक एकता, आध्यात्मिक शांति तथा सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित कर और आगे नई पीढ़ी तक पहुंचायेगा और विशेष रूप से युवा पीढ़ी और बच्चों को अपनी परंपरा और संस्कृति से जोड़ने का काम करेगा, ताकि वे अपने रीति-रिवाजों को समझें, उनका सम्मान करें और उस पर गर्व महसूस करें। सप्ताहिक मंझी थान पूजा संताल समाज के लिये आगे चलकर मिल का पत्थर साबित होगा।जो आगे चलकर संताल समाज में धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक रूप से समाज को और मजबूती प्रदान करेगा। सप्ताहिक मंझी थान पूजा हर रविवार दिन को इसलिए रखा गया है कि इस दिन को बच्चों का स्कूल बंद रहता है,ताकि बच्चे पूजा में भाग ले सके।इस अवसर में पालटन हेम्ब्रोम, सुशील मरांडी, बुधन हांसदा, मोनुह मुर्मू, जीवन टुडू, जय मुर्मू, एलीजाबेथ मरांडी, सुकुरमुनि टुडू, सोहागनी मरांडी, चुड़की मुर्मू, हिरामुनी टुडू, बिटीया सोरेन, मकु मुर्मू, बाबुसोल हांसदा के साथ काफी संख्या में महिला-पुरुष, बुजुर्ग और बच्चे उपस्थित थे|

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