
स्वास्थ्य की परवाह किए बिना जनहित की लड़ाई में डटे उमेश बड़ाइक, आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए राज्यपाल से लगाई गुहार
Arjun Kumar…..✍️
अनगड़ा(रांची) । स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के बावजूद समाज और जनता के हितों को लेकर लगातार चिंतित रहने वाले रांची जिला ग्राम प्रधान संघ के सह जिला अध्यक्ष एवं बीसा ग्राम प्रधान उमेश कुमार बड़ाइक ने एक बार फिर जनहित के महत्वपूर्ण मुद्दों को मजबूती से उठाया है। अपनी शारीरिक तकलीफों को दरकिनार करते हुए उन्होंने आदिवासी समाज, ग्रामसभा और पारंपरिक ग्राम प्रधान व्यवस्था के अधिकारों की रक्षा के लिए झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार को पांच सूत्री मांगपत्र सौंपा है।
इस मांगपत्र के माध्यम से उन्होंने झारखंड में आदिवासी जमीन, प्राकृतिक संसाधनों, धार्मिक स्थलों और पारंपरिक ग्राम व्यवस्था से जुड़े गंभीर सवालों पर सरकार का ध्यान आकृष्ट कराया है। उनका कहना है कि आदिवासियों के संवैधानिक एवं पारंपरिक अधिकारों की रक्षा केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि जमीन पर भी इसका सख्ती से पालन होना चाहिए। पांच सूत्री मांगों में उठाए आदिवासी हितों के अहम सवाल सीएनटी एक्ट का सख्ती से हो अनुपालन: मांगपत्र में झारखंड में सीएनटी एक्ट को पूरी तरह लागू करने की मांग की गई है। आरोप लगाया गया है कि कुछ मामलों में कानून का उल्लंघन कर फर्जी वंशावली तैयार करने तथा मुखिया के हस्ताक्षर और मुहर का दुरुपयोग कर अवैध रूप से जमीन की खरीद-बिक्री एवं हस्तांतरण किया जा रहा है। ऐसे मामलों की उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। बालू घाटों का संचालन ग्रामसभा को मिले: झारखंड के सभी बालू घाटों का संचालन एवं प्रबंधन ग्रामसभा के अधिकार क्षेत्र में देने की मांग की गई है। इससे स्थानीय ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित होने के साथ उनके अधिकारों की रक्षा हो सकेगी। रिक्त ग्राम प्रधान पदों पर शीघ्र नियुक्ति: रांची सहित झारखंड के विभिन्न जिलों में रिक्त पड़े ग्राम प्रधान पदों को पारंपरिक ग्राम व्यवस्था एवं निर्धारित नियमों के अनुसार शीघ्र भरे जाने की मांग उठाई गई है, ताकि गांवों की पारंपरिक व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित हो सके। जल, जंगल, जमीन और धार्मिक स्थलों को अतिक्रमण मुक्त कराया जाए: आदिवासियों के सरना स्थल, मसना स्थल एवं हड़गड़ी जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों पर हो रहे कथित अवैध अतिक्रमण पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है। ऐसे स्थलों की पहचान कर उन्हें अतिक्रमण मुक्त कराने पर जोर दिया गया है। बड़ाइक, चिक बड़ाइक एवं लोहार/लोहारा समाज की जमीन की सुरक्षा: इन समुदायों की पुश्तैनी जमीन की खरीद-बिक्री और हस्तांतरण सरकार के निर्धारित नियमों तथा सक्षम प्राधिकारियों की अनुमति के अनुरूप ही सुनिश्चित करने की मांग की गई है, ताकि उनकी पारंपरिक जमीन सुरक्षित रह सके। अपनी तकलीफ से ज्यादा समाज के अधिकारों की चिंता उमेश कुमार बड़ाइक का कहना है कि ग्रामसभा, ग्राम प्रधान और आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा सामूहिक जिम्मेदारी है। यही वजह है कि स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बावजूद वे लगातार सामाजिक एवं जनहित के मुद्दों को उठाते रहे हैं। व्यक्तिगत तकलीफों को प्राथमिकता देने के बजाय समाज की समस्याओं और ग्रामीणों के अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करना उनकी सक्रियता को दर्शाता है। उन्होंने राज्यपाल से आग्रह किया है कि सभी पांच मांगों पर गंभीरता से विचार करते हुए संबंधित विभागों को आवश्यक जांच और उचित कार्रवाई का निर्देश दिया जाए। अब देखना होगा कि आदिवासी अधिकारों, ग्रामसभा की स्वायत्तता और पारंपरिक ग्राम व्यवस्था से जुड़े इन महत्वपूर्ण सवालों पर सरकार कितनी गंभीरता दिखाती है।
