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बकला (फाबा बीन) जर्मप्लाज्म क्षेत्र दिवस का सफल आयोजन

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Arjun Kumar Pramanik…..✍️

नामकुम(रांची) । आईसीएआर–राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर), क्षेत्रीय स्टेशन, रांची (झारखंड) में 9 मार्च 2026 को बकला (फाबा बीन) जर्मप्लाज्म क्षेत्र दिवस का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बकला (फाबा बीन) के 781 जर्मप्लाज्म की विविधता और उनकी आनुवंशिक क्षमता का प्रदर्शन किया गया। इस अवसर पर विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों तथा लगभग 50 प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), रांची के कुलपति डॉ. सुनील चंद्र दुबे उपस्थित थे। वहीं आईसीएआर-आईआईएबी, रांची के निदेशक डॉ. सुजय रक्षित, आईसीएआर-आईआईएबी के जॉइंट डायरेक्टर (रिसर्च) डॉ. विजय पाल भड़ाना तथा आईसीएआर-आरसीईआर, प्लांडू के अध्यक्ष डॉ. अवनी कुमार सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। मुख्य अतिथि डॉ. सुनील चंद्र दुबे ने अपने संबोधन में पादप आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण और न्यूट्रिशनल सिक्योरिटी को मजबूत करने के लिए पोषक दलहनी फसलों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि फाबा बीन में एल-डोपा (L-DOPA) पाया जाता है, जो डोपामाइन का एक महत्वपूर्ण प्रीकर्सर है और पार्किंसंस बीमारी के उपचार में उपयोगी माना जाता है। उन्होंने 781 बकला जर्मप्लाज्म के मूल्यांकन में आईसीएआर-एनबीपीजीआर के प्रयासों की सराहना की। आईसीएआर-आईआईएबी, रांची के निदेशक डॉ. सुजय रक्षित ने इस कम उपयोग में लाई जाने वाली दलहनी फसल पर केंद्रित अनुसंधान को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. विजय पाल भड़ाना ने पोषक दलहनी फसलों के विकास और उनके अनुसंधान में सहयोग को सुदृढ़ करने की बात कही। वहीं डॉ. अवनी कुमार सिंह ने खाद्य प्रणालियों में विविधता लाने तथा जलवायु के अनुकूल फसल के रूप में फाबा बीन के महत्व को रेखांकित किया और झारखंड में इसकी खेती को बढ़ावा देने के उपाय किसानों को बताए। कार्यक्रम की शुरुआत आईसीएआर-एनबीपीजीआर, क्षेत्रीय स्टेशन, रांची के ऑफिसर-इन-चार्ज डॉ. मोनू कुमार के स्वागत भाषण से हुई। इसके बाद डॉ. कुलदीप त्रिपाठी और डॉ. सुजीत कुमार बिशी (वरिष्ठ वैज्ञानिक) ने बकला के पोषण संबंधी लाभों और इसे पोषक दलहन फसल के रूप में बढ़ावा देने के महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के अंत में डॉ. एन. एस. पंवार (वरिष्ठ वैज्ञानिक) ने वैज्ञानिकों और किसानों को बकला के खेत का भ्रमण कराया, जहां विभिन्न प्रकार के जर्मप्लाज्म लाइनों का प्रदर्शन किया गया। इस दौरान फसल सुधार की संभावनाओं और उसकी विशेषताओं की विस्तृत जानकारी भी दी गई।

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