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पटना : बिहार में पीके फैक्टर का क्या होगा असर, किसकी बनेगी सरकार ?

संजय कुमार विनित…✍️

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(वरिष्ठ पत्रकार सह राजनीतिक विश्लेषक)

प्रशांत किशोर की भारतीय राजनीति पर अच्छी पकड़ है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की तरह बिहार की भी राजनीति की रुख बदलने को प्रयासरत हैं। दिल्ली की तरह ना तो उन्हें यहां माहौल मिल पा रहा और ना ही अन्ना हजारे जैसा कोई गुरु। विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की बात करते करते अब जाति – धर्म की राजनीति पर उतर गये प्रशांत किशोर की बिहार की राजनीति में क्या हासिल हो पायेगा, यह तो चुनाव परिणाम के बाद ही पता चल पायेगा। पर एनडीए और महागठबंधन में से किसे कमजोर करेंगे, मुस्लिम मतदाताओं को कितना लुभा पायेंगे, किस जाति पर अपनी कितनी छाप छोड़ेंगे, इसपर राजनीतिक गलियारों में चर्चा का बाजार काफी गर्म हो गया है। 

दिल्ली में भ्रष्टाचार का मुद्दा तो काफी जोर पर था, वैसे ही प्रशांत किशोर ने बिहार में एनडीए सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का प्रयास करते रहें हैं। इसी तर्ज पर प्रशांत किशोर ने जदयू के वरिष्ठ नेता अशोक चौधरी और भाजपा के वरिष्ठ नेता संजय जायसवाल पर कही गंभीर आरोप लगाये। अब इन दोनों नेताओं ने करोड़ों रुपये की मानहानि का दावा ठोंक दिया है। अब क्या और कितनी सच्चाई इन आरोपों में है, यह तो जांच का विषय है। पर अगर माफी मांगने की नौबत आयी तो यह भी अरविन्द केजरीवाल की एक नकल ही कही जायेगी। वैसे अरविंद केजरीवाल की ऐसी माफीनामा की एक लंबी लिस्ट है, पर प्रशांत किशोर की यह शुरुआत होगी। 

अरविंद केजरीवाल की राजनितिक रणनीति के तहत प्रशांत किशोर का बिहार में सत्ताधारी पार्टी के नेताओं पर आरोप लगाने से महागठबंधन जरूर खुश है। क्योंकि महागठबंधन लालू यादव की भ्रष्टाचार खासकर चारा घोटाले और अन्य को लेकर खुद सरकार को घेरने की स्थिति में नहीं है। इसलिए, महागठबंधन बिहार में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कुछ बोलने लायक नहीं है और ना ही बिहार के विकास पर। इन दो प्रमुख चुनावी मुद्दों पर महागठबंधन के बदले प्रशांत किशोर के बोलने पर महागठबंधन को फायदा होते दिख रहा था। यह भी सच है कि एनडीए के 20 साल के कार्यकाल में कभी भी भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे और प्रशांत किशोर के ऐसे आरोपों से एनडीए थोड़ी असहज भी हो गयी है। 

 विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर प्रशांत किशोर द्वारा एनडीए सरकार को घेरने पर महागठबंधन ठीक से खुश भी नहीं हो पायी होगी कि प्रशांत किशोर ने अब मुस्लिम कार्ड खेलकर महागठबंधन की खुशियों में पतीला लगा दिया। प्रशांत किशोर ने बिहार में मुस्लिम प्रतिनिधित्व को सही स्थान ना दिया जाना और इसे वोटबैंक मानकर सिर्फ राजनीति करने के आरोप लगाते हुए 40 उम्मीदवार मुस्लिम उतारे जाने की बात करते हुए महागठबंधन को एक नया चैंलेज दे दिया। प्रशांत किशोर ने चैंलेज में स्पष्ट कहा कि अगर महागठबंधन मुस्लिमों के सच्चे हितैषी हैं तो जहां हमारी पार्टी के मुस्लिम उम्मीदवार हों, वहां महागठबंधन मुस्लिम उम्मीदवार ना उतारें। और जहाँ महागठबंधन के मुस्लिम उम्मीदवार होगें, वहां जन स्वराज मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारेगी। 

प्रशांत किशोर के इस चैंलेज को स्वाभाविक तौर पर महागठबंधन नहीं मान सकती। शायद, महागठबंधन इसपर चुप्पी साध ले, कोई प्रतिक्रिया ना दे। इसी तरह से एआईएमआईएम के ओवैसी भी मुस्लिमों के हित में महागठबंधन द्वारा उनकी पार्टी को गठबंधन में शामिल ना किये जाने को लेकर सीमांचल इलाके में एकला चलो रे के राह पर निकल पड़े हैं। एआईएमआईएम , 2020 के चुनाव में पांच विधानसभा सीट पर जीत दर्ज की थी, जिसमें से चार विधायक राजद में शामिल हो गये थे। प्रशांत किशोर मुसलमानों को उचित सम्मान देते हुए 40 सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारने की बात कर रहें हैं । 

बिहार में 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने मुस्लिम और यादव को एकजुट कर सत्ता हासिल की। 1990 से शुरू हुआ यह समीकरण आरजेडी के साथ आज भी मजबूती के साथ जुड़े है। आज भी उनकी पार्टी का जनाधार इसी एम वाई समीकरण पर निर्भर है। हालांकि तेजस्वी यादव इसे विस्तार देने के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं लेकिन अभी तक बहुत कुछ बदलाव होता नहीं दिख रहा है। अब सीमांचल में ओवैसी की मजबूत पकड़ और हलचल तेज होने और फिर 40 सीटों पर प्रशांत किशोर का मुस्लिम उम्मीदवार उतारने से महागठबंधन को मुस्लिम वोटों का कुछ नुकसान होता दिख रहा है। 

अब अगर एनडीए खेमे पर गौर करें तो नीतीश कुमार के लवकुश और महिला समीकरण से 2005 में बिहार की राजनीति में बदलाव का दौर आया था। लव कुश के साथ-साथ अति पिछड़ा वोटबैंक के सहारे नीतीश कुमार बिहार की सत्ता पर काबिज हुए। नीतीश ने अति पिछड़ा वर्ग और महिलाओं को विशेष योजनाओं के जरिए साधा और सत्ता पर अबतक काबिज हैं। लेकिन, प्रशांत किशोर आबादी के हिसाब से 40 सीट पर मुस्लिम कैंडिडेट खड़ा करेंगे तो इसके अलावे बिहार 70 सीटों पर अति पिछड़ा उम्मीदवार खड़ा करने की योजना बनाये हुए हैं। प्रशांत किशोर 110 सीट को लेकर राजनीति कर रहे हैं । इस हिसाब से उन्होंने 40 सीट का सौदा आरजेडी से करने की कोशिश की है और 110 सीट की जदयू से। इससे एनडीए को भी कुछ नुकसान की संभावना दिखती है। 

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि बिहार में इस बार भी आखिरकार जातीय गणित और दोनों प्रमुख गठबंधनों के समीकरण से ही परिणाम तय होने वाला है। अलबत्ता, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने चुनावी मुकाबले को दिलचस्प जरूर बना दिया है और जिसकी वजह से कुछ हद तक अभी एक अनिश्चितता की स्थिति दिख रही है। वैसे भी, प्रशांत किशोर के लिए इस विधानसभा चुनाव में खोने के लिए कुछ नहीं है, पर पाने के लिए पुरा आसमान है।

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