
171वें हूल दिवस पर गूंजा शहीदों का गौरवगान, कुमडीह में शिक्षा, एकता और अधिकारों की रक्षा का लिया गया संकल्प


रिपोर्टर- जगबंधु महतो
“आज की लड़ाई कलम और शिक्षा से होगी” – हूल दिवस समारोह में पूर्वजों के संघर्ष को आगे बढ़ाने का आह्वान
राजनगर : सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर प्रखंड अंतर्गत कुमडीह गांव में मंगलवार को आकिल आखड़ा जियाड़ कुमडीह के तत्वावधान में 171वां हूल दिवस पूरे श्रद्धा, उत्साह और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। समारोह में वीर सिदो-कान्हू, चाँद-भैरव तथा फूलो-झानो के अद्वितीय बलिदान को नमन करते हुए उनके संघर्ष, त्याग और स्वाभिमान की विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम के दौरान शिक्षा, सामाजिक एकजुटता तथा जल, जंगल और जमीन की रक्षा का संदेश प्रमुखता से दिया गया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि झामुमो केंद्रीय सदस्य कृष्णा बास्के तथा विशिष्ट अतिथि सांसद प्रतिनिधि कालीपद (केपी) सोरेन सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। समारोह की शुरुआत राजनगर और कुमडीह में स्थापित वीर सिदो-कान्हू की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण एवं श्रद्धांजलि अर्पित कर की गई। इसके बाद आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने पूरे वातावरण को हूल आंदोलन की वीरगाथाओं से ओत-प्रोत कर दिया।
मुख्य अतिथि कृष्णा बास्के ने कहा कि वीर सिदो-कान्हू, चाँद-भैरव और फूलो-झानो ने अंग्रेजी हुकूमत, महाजनी प्रथा और शोषण के खिलाफ ऐतिहासिक हूल आंदोलन का बिगुल फूंककर आदिवासी समाज को स्वाभिमान की नई राह दिखाई। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में समाज की सबसे बड़ी ताकत शिक्षा है और अब अधिकारों की लड़ाई तीर-धनुष से नहीं, बल्कि कलम, जागरूकता और संगठन से लड़ी जाएगी। उन्होंने हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने का आह्वान किया।
विशिष्ट अतिथि कालीपद (केपी) सोरेन ने कहा कि पूर्वजों के संघर्ष से प्रेरणा लेकर आज भी समाज को अपने अधिकारों और अस्तित्व की रक्षा के लिए एकजुट रहना होगा। उन्होंने ईचा डैम जैसी परियोजनाओं से उत्पन्न विस्थापन की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए शिक्षा को पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि बताया।
समारोह में पांच टीमों ने संथाली नाटक के माध्यम से हूल विद्रोह की गाथा का जीवंत मंचन किया, जिसने उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया। इस अवसर पर विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में ग्रामीणों की गरिमामयी उपस्थिति रही।

