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घाटशिला : घाटशिला विधानसभा उपचुनाव में अनेक प्रभावशाली नेता हैं नदारद…

दीपक नाग… ✍️

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चुनावी कुरुक्षेत्र में हार और जीत के पीछे कुछ चीजे अहम रोल अदा करती है, जो हार और जीत का मुख्य कारण भी हो सकता है। इन पहलुओं में अच्छा या खराब प्रतिफल के रुप में चुनाव के बाद नतिजा सामने आता है। इन पहलुओं को पहले जान लें, जैसे गठबंधन, चुनावी क्षेत्र में कार्यकर्ताओं में गूट बाजी, नाराज नेताओं का दिलों में दबा हुआ भीतराघात इत्यादि। चलिए इस विश्लेषण को जानने के लिए बारी-बारी आगे बढ़ते हैं।

गठबंधन की राजनीति कितना सफल और कितना असफल इस चुनाव में :- 

जेएलकेएम चुनाव अपने बल बूते लड़ रहा है। इसलिए गठबंधन का फार्मूला उन पर लागु नहीं होता है। घाटशिला विधानसभा उपचुनाव चुनावी कुरुक्षेत्र में आमने-सामने खड़े झामुमो और भाजपा पर गंठबंधन का फार्मूला लागू होता है। 

चलिए सुरु करते हैं हम झारखंड मुक्ति मोर्चा का इस चुनाव में गठबंधन फार्मूला कैसा दिख रहा है ? वैसे तो वामपंथी दल, आरजेडी के अलावा कुछ और राजनीतिक दल इसमें शामिल हैं, जिनके इस क्षेत्र में विशेष कोई जोर अब नहीं है। पर, गठबंधन में सम्मिलित सारे दलों से कहीं अधिक इस चुनाव में कांग्रेस का गठबंधन में तुलनात्मक रुप से झामुमो के लिए अहमियत रखता है। प्रश्न यह है कि, घाटशिला विधानसभा के कांग्रेसी डा. प्रदीप कुमार बलमुचू का भावनाओं को अधिक महत्व देंगे या गठबंधन धर्म को। घाटशिला विधानसभा में डा. बालमुचू को माइनस करके कांग्रेस का सोचना संभव नहीं है। डा. बलमुचू घाटशिला विधानसभा से कांग्रेस के टिकट से तीन बार परचम लहराया है। और झामुमो के प्रत्याशी दिवंगत रामदास सोरेन से मात खाने के बाद कभी डा. बलमुचू अपने खोए हुए जगह को प न सका। इसके बाद जितने बार भी झारखंड में वि. स. का चुनाव हुए हैं डा. बलमुचू हमेशा कांग्रेस से टिकट पाना चाहा पर गंठबंधन धर्म हमेशा आढ़ा बना। घाटशिला के जनता कहते हैं, बलमुचू को अपना राजनितिक पहचान बनाने का मौका और विधानसभा तक जाने का रास्ता इस विधानसभा के मतदाता पहली बार दिया। इसलिए डा. प्रदीप कुमार बलमुचू का कुछ अधिक ही लगाव हमेशा घाटशिला विधानसभा क्षेत्र से रहा है। वर्षों पहले ही यहां अपना घर भी ले रखा है। 2019 में जब गठबंधन के कारण फिर से डा. बलमुचू कै निराशा हाथ लगा तो उन्होंने ने आजसू के टिकट पर यहां चुनाव लड़ा। भले ही हाल गया पर 35000+ मतदान उन्हे मिला था। चुंकि, आजसू NDA में सम्मिलित हैं इसलिए मुस्लिम कांग्रेसी वोट बैंक एक एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन नहीं मिला उन्हें। डाक्टर प्रदीप कुमार बलमुचू इस बार के चुनाव में खुद को दूर रखे हुए है। “न राधो से कुछ काम और न माधो से।” रहिम जी के कुछ पंक्तियां :- 

“रहीमन धागा प्रेम का नहीं तोड़ो चटकाए, टूटे से न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए ‌।” 

भाजपा में भी यही स्थिति लगभग बनी हुई है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री सह केन्द्र के पूर्व मंत्री रह चुके अर्जुन मुंडा इस चुनावी कुरुक्षेत्र में नदारद है। 

इधर भाजपा के प्रत्याशी के चुनावी नामांकन में आजसू के सुप्रीमो सुदेश महतो जोरदार भाषण देकर जनता का भाजपा के प्रत्याशी को जीत दिलाने की अपील किया पर आजसू के कोई दुसरा प्रभावशाली नेता भाजपा के चुनावी रथ में नहीं देखा गया । ऐसा लग रहा है जैसे भाजपा के चारों प्रखंड घाटशिला, मुसाबनी, धालभुमगढ़ और गुड़ाबांधा कमेटी के कमजोरी के कारण आजसू के लोकल नेतृत्व को साथ लेकर चलने में असफल रहा है।

ऐसी स्थिति में उनके सिपाही-सालार का मन क्या गठबंधन धर्म निभाएंगे? समझदारों के लिए इशारा ही काफी होता है। हाथी का दिखाने और खाने का दांतों में फर्क होता है। शायद इन बातों को जब तक दोनों दावेदार करने वाले दल के प्रत्याशी समझेंगे तब तक चिड़िया खेत चुग चुकी होगी।

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