Advertisements
Spread the love

“वंदेमातरम देश की स्वतंत्रता आंदोलन की सांस्कृतिक विरासत “

संजय कुमार विनित  (राजनीतिक विश्लेषक)… ✍️

Advertisements

स्वतंत्रता संग्राम में फांसी के फंदे से लटकते वीर सेनानियों के आखिरी शब्द “वंदे मातरम्” देश की राष्ट्रीय गीत होते हुए भी अपनी रचना के 150 वीं बर्ष पर फिर से विरोध के स्वर से घिरी हुई है। राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में सालभर चलने वाले स्मरण समारोह की शुरुआत की, साथ ही डाक टिकट और सिक्का भी जारी किया। पर इसके संपुर्ण संस्करण के देश भर में सार्वजनिक स्थानों पर सामुहिक गायन को लेकर एक बार फिर से विरोध के स्वर उठ रहे हैं। भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र से राज्यों तक की सरकारें इस पर किसी भी विरोध से बेपरवाह हैं। 

आज ही के दिन, 7 नवंबर 1875 को बंकिम चन्‍द्र चटर्जी ने वंदे मातरम् को पहली बार साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित किया। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने मंच पर वंदे मातरम् गाया। यह पहला मौका था जब यह गीत सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर गाया गया। सभा में मौजूद हजारों लोगों की आंखें नम थीं। वंदे मातरम् ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध क्रांति का गान था। इस गीत की प्रशंसा भगत सिंह, अशफाकउल्लाह खान, राजगुरु, सुखदेव, खुदी राम बोस, राम प्रसाद बिस्मिल आदि सभी महान क्रांतिकारियों ने की थी। भारत माता को नमन करते हुए उन्होंने फांसी का फंदा चूमा। 17 अगस्त 1909 को जब मदनलाल ढींगरा को इंग्लैंड में फांसी दी गई, तब भी उनके आखिरी शब्द वंदे मातरम् ही थे। 

रविंद्रनाथ टैगोर के इस गीत को स्वर देने के साथ ही यह गीत आजादी के आंदोलन में दूर तक गूंजते हुए अंग्रेजों के खिलाफ़ लोगों में जोश भरने लगा। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में हिस्सेदारी करने वाले हर आंदोलनकारी के होठ पर यह गीत हुआ करता था। लाल- बाल-पाल की त्रिमूर्ति की तो हर सभा, रैली और प्रदर्शन में जोश-खरोश के साथ यह गाया जा रहा था‌। रचना भले इसकी बंगाल में हुई, भाषा भी संस्कृत-बांग्ला मिश्रित थी, लेकिन यह किसी सीमाओं में नहीं बांधा जा सका और देश के हर हिस्से में कोटि कोटि स्वतंत्रता सेनानियों के जयघोष बन गया। देश की हर सडकों पर, देश की हर गलियों में, देश के बाहर के भी स्वतंत्रता सेनानी जब भी एक साथ मिलते थे तो यही वंदेमातरम एकमात्र उनका आपसी अभिवादन था। 

इस जयघोष से अंग्रेज काफी चिंतित होकर 1907 में इसके गायन पर पाबंदी लगा दी। “बांटो और राज करो” की नीति लेकर चलने वाले अंग्रेजों को हमेशा हिंदुओं-मुसलमानों के बीच दूरियां बढ़ाने के मौके की तलाश रहती थी।“वंदे मातरम” गीत भी इसका जरिया बना। मुस्लिम लीग को उकसाने में अंग्रेज कामयाब रहे और लीग के 1909 के अमृतसर अधिवेशन में “वंदे मातरम” का खुला विरोध हुआ। तब के अध्यक्ष रहे सैयद अली इमाम ने ‘वंदे मातरम’ को सांप्रदायिक और इस्लाम विरोधी करार देते हुए इसे अस्वीकार किया। 

अंग्रेजों के खिलाफ लड़ती कांग्रेस “वंदे मातरम” को लेकर दोहरे दबाव में थी। एक ओर आजादी के लिए जूझ रहे हिन्दू आंदोलनकारी “वंदे मातरम” को राष्ट्रभक्ति के पवित्र मंत्र जैसे दोहराते थे, दूसरी ओर इस सवाल पर लीग से उलझकर कांग्रेस अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष को कमजोर नहीं होने देना चाहती थी। कांग्रेस ने समाधान के रास्ते की तलाश की जिम्मेदारी पार्टी की एक कमेटी को सौंपी गयी। 1937 में इस कमेटी ने “वंदे मातरम” का विरोध करने वालों की शिकायतें पर गौर किया और कमेटी ने न तो गीत को पूरी तौर पर स्वीकार किया और न पूरी तौर पर अस्वीकार। हल निकाला गया कि गीत के शुरू के दो पद्य दो गाए जाएंगे जिनमें कोई धार्मिक पहलू नहीं ‌। आज भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र से राज्यों तक की सरकारें किसी भी विरोध से बेपरवाह हैं। 

वंदेमातरम” के विरोध का मुद्दा धार्मिक और ऐतिहासिक कारणों से जुड़ा है, क्योंकि कुछ लोगों को लगता है कि यह गीत इस्लामी विरोधी है, जबकि गीत के समर्थक इसे देशभक्ति का प्रतीक मानते हैं। कुछ धार्मिक समूहों ने गीत के कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताई है, क्योंकि वे इसे धार्मिक सिद्धांतों के विरुद्ध मानते हैं। यह गीत बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास आनंद मठ से लिया गया है, इसलिए भी कुछ लोग इसे सांप्रदायिक मानते हैं। हालांकि, 1937 में, संविधान सभा ने गीत के विरोध को स्वीकार करते हुए एक बीच का रास्ता निकाला और तय किया कि केवल शुरुआती दो पद्यों को ही गाया जाएगा। इस समाधान से तब भी कुछ समर्थक और विरोधी दोनों असंतुष्ट थे।जबकि स्वतंत्रता संग्राम में इसकी संपूर्ण संस्करण की स्वीकार्यता अधिकांशतः लोगों के बीच थी। 

भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय गीत ‘‘वंदे मातरम’’ की 150 वीं वर्ष गांठ को देश भर में 7 नवम्बर 2025 से 7 नवम्बर 2026 तक समारोहपूर्वक आयोजित किये जाने का निर्णय लिया गया है। वंदे मातरम् के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के दृष्टिगत वर्षभर विविध गतिविधियों चार चरणों में प्रथम चरण में 7 से 14 नवम्बर (शुभारंभ), द्वितीय चरण 19 से 26 जनवरी 2026 (गणतंत्र दिवस), तृतीय चरण 7 से 15 अगस्त 2026 (हर घर तिरंगा अभियान के साथ) तथा चतुर्थ चरण एक से 7 नवम्बर 2026 (समापन सप्ताह) में व्यापक रूप से आयोजित किये जायेंगे। यह निर्णय निश्चित ही भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इस गीत की भूमिका और इसकी स्थायी सांस्कृतिक विरासत के महत्व को प्रदर्शित करता है। 

वर्तमान की केन्द्र सरकार का मानना है कि राष्ट्रगीत को एक राजनीति के तहत प्रतिबंधित करते हुए घेरा गया और मुसलमानों को शांत करने के उद्देश्य से, 1937 में कोलकाता में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के दौरान इस राष्ट्रीय गीत को छोटा करने का निर्णय लिया गया। और इस तरह इस गीत का दुर्भाग्य का दौर शुरू हुआ, इसी दुर्भाग्य को दूर करने के लिए वंदेमातरम की रचना के 150 वीं बर्ष पर इसके संपूर्ण संस्करण के गायन के पक्षधर है। पर न्यायालय के आदेश की अध्ययन की जाये तो सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि किसी को भी राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता,‌ बशर्ते वह इसका अपमान ना करें ‌। बस सम्मानपूर्वक खड़ा रहे। इसी के साथ न्यायालय ने वंदे मातरम को अनिवार्य बनाने से इनकार कर दिया और इस बात पर भी जोर दिया कि देशभक्ति को किसी बाध्यता से नहीं मापा जा सकता। 

केंद्र सरकार की यह निर्णय निश्चित ही भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इस गीत की भूमिका और इसकी स्थायी सांस्कृतिक विरासत के महत्व को प्रदर्शित करता है। वन्देमातरम्’ का सम्मान एक नागरिक के रूप में देश की गरिमा और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को बनाए रखने का प्रतीक है। इस गीत पर हर बार का विवाद इस बहस को ताज़ा कर देता है कि देश के मुसलमान इस देशभक्ति के तराने को गाना नहीं चाहते हैं और इस तरह उनकी देशभक्ति संदिग्ध है। हमारे देश की दूर्भाग्य है कि अगर किसी भी मुद्दे या विमर्श में मुसलमान या इस्लामी पहलू जुड़ जाए तो वह बहस सेहतमंद ना रहकर उग्र सांप्रदायिक रूप ले लेती है। इसपर न्यायालय के स्पष्ट आदेश हैं, और न्यायालय के अनुसार व्यवहार करने वालों पर अंगुली उठाना सही नहीं कहा जा सकता है।

You missed