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बिहार :  बम्पर वोटिंग : किसका होगा नफा और किसका होगा नुकसान ?

संजय कुमार विनित… (राजनीतिक विश्लेषक)

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बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में कुल 18 जिलों की 121 विधानसभा सीटों के लिए 1314 प्रत्याशियों की किस्मत आज इवीएम मे कैद हो गया। मतदाताओं ने भारी संख्या में घर से निकलकर अपने मताधिकार का प्रयोग किया जो पिछले 32 बर्षो का रिकार्ड तोड़ दिया । सियासी गलियारों में अब इस रिकार्ड वोटिंग के मायने तलाशे जा रहे हैं कि इस बम्पर वोटिंग से किसका नफा, किसका नुकसान होने जा रहा है। 

यूँ तो, बिहार के हर विधानसभा चुनाव में टर्नआउट बढ़ा है।2010 के चुनाव में टर्नआउट 52.1% था जो 2015 में 55.9% और 2020 में बढकर 56.1% पहुंच गया। और चुनाव आयोग के अनुसार आज संध्या 5 बजे तक यह आंकडा 60 ℅ से अधिक पहुँच गयी है और अब भी मतदान केंद्रों में लम्बी लम्बी कतारें देखी जा रही है। चुनाव आयोग ने प्रेस कांफ्रेंस कर अभी अभी कहा है कि 64.46℅ मतदाताओं ने इस महापर्व में हिस्सा लिया। फायनल आंकड़े आने में समय लग सकता है। पर इस बम्पर वोटिंग को लेकर चर्चा तेज हो गयी है कि यह नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के रूप बिहार की जनता देखना चाहती है या फिर नीतीश की विदाई कर तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है। 

इधर हाल के विधानसभा चुनाव में बिहार के हर विधानसभा चुनाव में मतदाताओं का टर्नआउट लगातार बढ़ा है। 2010 के चुनाव में मतदाताओं की टर्नआउट 52.1% था जो 2015 में 55.9% और 2020 में 56.1% पहुंच गया। यानि पिछले 15 साल में मतदाता भागीदारी लगभग एक समान रही है। न कोई नई लहर, न कोई भारी गिरावट, लेकिन 2025 के चुनाव में मतदाताओं की बम्पर टर्नआउट इस स्थिरता को तोड़ता दिख रहा है। 2010,2015,2020 भले ही नीतीश कुमार के लिए रही हो, पर इस बम्पर वोटिंग से बिहार के दोनों गठबंधनों में से किसका कल्याण होगा, इसपर किसी निष्कर्ष पर तुरंत आना ठीक नहीं होगा। इसके लिए चुनाव आयोग के मतदाताओं के आंकड़ों का इंतजार करना चाहिए। 

बिहार की राजनीति में अक्‍सर कांटे का टक्कर देखने को मिलता रहा है। यहां कुछ प्रतिशत मतदान का इजाफा भी नतीजों को पलट सकता है। पहले कहा जाता था क‍ि अगर मतदान प्रत‍िशत बढ़ा तो सरकार के ल‍िए मुश्किल है- मतलब एंटीइनकंबेंसी है। बीते कुछ सालों में यह पैटर्न पूरी तरह बदला हुआ देखा जा रहा है। हाल के दिनों में हरियाणा, उत्तराखंड सहित कई राज्‍यों में एंटीइनकंबेंसी से ज्‍यादा प्रोइनकंमबेंसी नजर आई है। इसलिए बम्पर वोटिंग का मतलब हमेशा एंटीइनकंबेसी नहीं हो सकता है। 

अगर पिछले 70 साल 1951 से अबतक के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर गौर करें तो बिहार में वोटिंग इस बात का कोई इशारा नहीं करता कि मतदाता गुस्से में वोट कर रहे हैं या समर्थन में। फिलहाल तो प्रत्याशियों के भाग्य इवीएम मे सुरक्षित है और चुनाव आयोग के आंकड़ों का इंतजार है। दूसरे चरण के भी मतदान 11 नवंबर को होने हैं। दोनों गठबंधनों ने चुनाव प्रचार में अपनी पुरी शक्ति लगायी हुई है ।

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