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चांडिल में सादगी से मनाया गया ‘विद-दीरि झंडा दिवस’, भुमिज समाज की संस्कृति व शिक्षा पर दिया गया जोर

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चांडिल: चांडिल प्रखंड अंतर्गत वीर शहीद गंगानारायण सिंह ऑल अनोल वाकुल, रामगढ़ के प्रांगण में ‘विद-दीरि झंडा दिवस’ सादगीपूर्ण वातावरण में मनाया गया। कार्यक्रम में बाकुल के छात्र-छात्राओं के साथ गांव के सामाजिक बुद्धिजीवियों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
इस अवसर पर भारतीय आदिवासी भुमिज समाज के जिला सचिव एवं सामाजिक कार्यकर्ता रविन्द्र नाथ सिंह ने संबोधित करते हुए कहा कि विद-दीरि झंडा भुमिज समाज का सामाजिक ध्वज है, जो समाज की पारंपरिक पहचान और गौरवशाली विरासत को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि इस ध्वज को 12 फरवरी 2012 को तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के कार्यकाल में सरकारी मान्यता प्राप्त हुई थी, जबकि यह ध्वज वर्ष 1984 से प्रचलन में है।
उन्होंने कहा कि ‘विद-दीरि’ का अर्थ है नियम अनुसार शिला (पत्थर) को गाड़ना। प्राचीन काल से ही भुमिज समुदाय में शासन दिरी एवं निशान दिरी के रूप में शिला पर लाल रंग से ‘विद-दीरि’ प्रतीक चिन्ह उकेरकर गाड़ने की परंपरा रही है। विशेष रूप से किसी व्यक्ति के निधन के पश्चात दाह संस्कार स्थल, घर के द्वार के समीप तथा अस्ति कलश स्थापना स्थल पर गोत्रानुसार शिला स्थापित की जाती है, जिसे ‘हांड़शाली’ या उकसाशन कहा जाता है।
झंडे के स्वरूप की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि इसमें समान चौड़ाई की दो आयताकार पट्टियां होती हैं ऊपरी सफेद रंग भुमिज समाज की सादगी और सरल स्वभाव का प्रतीक है, जबकि निचला पीला रंग शुभता का प्रतीक माना जाता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हर सामाजिक अनुष्ठान में हल्दी के उपयोग की परंपरा इसी शुभता को दर्शाती है।
विद-दीरि प्रतीक चिन्ह में कुल्हाड़ी खुंटकटी अर्थात जंगल साफ कर बसने की परंपरा को दर्शाती है, वहीं तीर-धनुष समाज के शौर्य और संघर्षशीलता का प्रतीक है। साथ ही ये उनके पारंपरिक औजार भी हैं। कलश का प्रयोग भी जन्म से मृत्यु तक हर संस्कार में होता है, जो जीवन चक्र की निरंतरता को दर्शाता है।
रविन्द्र नाथ सिंह ने कहा कि आधुनिक समय में समाज के लोगों को अपनी संस्कृति, परंपरा, भाषा और पहचान के संरक्षण के साथ-साथ शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अशिक्षा के कारण समाज के लोग अपने मौलिक अधिकारों से वंचित हो रहे हैं। पुत्र हो या पुत्री, सभी को समान रूप से शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए।
कार्यक्रम में विशंभर सिंह, सर्वेश्वर सिंह, शंकर सिंह, सहदेव सिंह, आशा सिंह, चंद्रकाना सिंह, रूपोषी सिंह, सोनामनी सिंह, दीपाली सिंह, ईसा रानी सिंह, श्वेता रानी सिंह, उर्मिला सिंह, शिवानी, भवानी, पार्वती, आकाश सिंह सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे।
कार्यक्रम का समापन समाज की एकता, सांस्कृतिक संरक्षण और शिक्षा जागरूकता के संकल्प के साथ किया गया।