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साप्ताहिक आलेख की 21 वीं कड़ी में “होली की मंगलकामना के साथ” सनातन उत्सव का भारत देश।।।

राँची । भारतवर्ष की आत्मा उसके धर्म और संस्कृति में बसती है। बिना इसके राष्ट्र-जीवन का कोई कल्पना नहीं है। राष्ट्र-जीवन का प्राण तीर्थ, पर्व, ऋतु राग, उत्सव में बसता है। तीर्थ देश का लघु रूप है। तो पर्व काल का प्रवाह है। ऋतु राग है, तो उत्सव उस राग का रस है। सूर्य के आगमन भगवान विष्णु का पहला चरण है, तो दोपहर दूसरा और सांध्य-वेला तीसरा पग है। यहां नदियां माता का आशीष है तो पहाड़़ पिता का पुण्य है।

इसलिए भारतीय मन हरेक समय, ऋतु और परिवर्तन का उत्सव मनाता है। आनंद खोजता है। जहां आनंद है, वहां जागरण है और जहां जागरण है वहां जीवन है। संवत्सर में वसंत ऋतु आती है और चली जाती है। पुनः कुछ दिनों के बाद इसका पुनर्जन्म होता है। भारतीय मन कहता है कि अस्तित्व में सदैव ही वसंत हैं। शरद हैं, हेमंत हैं और पतझड़़ है।

इस पर बीते सप्ताह देश के विभिन्न हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में प्रकाशित आलेख को पढ़िए और हां, अपनी प्रतिक्रिया देना याद रखियेगा।

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