बीजेपी के बिछाई चक्रव्यूह में फंसती नजर आ रही विपक्षी पार्टियां
संजय कुमार विनीत
(वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक)
बीजेपी की एक सोची समझी रणनीति के तहत ईद पर “सौगात-ए-मोदी” दिये जाने के बाद से एक ओर जहाँ मोदी समर्थक अचंभित हैं, वहीं विपक्षी पार्टियां भी कम अचंभित नहीं है। सौगात-ए-मोदी से घबराकर विपक्षी पार्टियां मुस्लिम मतदाताओं पर अपनी पैठ बनाये रखने के लिए कुछ ऐसा करे जा रही है, जिससे कहा जा सकता है कि वे हिंदू वोट से कटते चले जा रहे हैं। इसमें तो ऐसा देखा जा रहा है कि मोदी एक गेंद फेंक रहे हैं – चाहे औरंगजेब वाली हो या राणा सांगा वाली और विपक्षी पार्टियां गेंद के पीछे दौर लगा रही है। बीजेपी तो यही चाह ही रही है कि सनातनी हिंदू के रूप में मुस्लिम हितैषी पार्टियां खुलकर सामने आ जायें, फिर हिंदू मतों पर एकाधिकार जमाया जा सके।
पीएम मोदी ने मुस्लिम हितों के लिए ऐसी योजना कोई पहली बार लेकर नहीं आये हैं। इसके अलावे उड़ान योजना, शादी शगुन योजना, उस्ताद योजना, सीखो और कमाओ योजना, ईदी योजना केंद्र सरकार की मुस्लिमो के लिए महत्वपूर्ण योजनाएँ पहले से कार्यरत हैं । केंद्र की मोदी की सरकार द्वारा चलाए जा रहे प्रधानमंत्री आवास योजना, जनधन योजना, उज्जवला योजना, सौभाग्य योजना, उस्ताद योजना, मुद्रा योजना समेत जितनी भी योजनाएं केंद्र सरकार की चल रही है , उसका सबसे ज्यादा लाभ मुसलमानों को ही मिला है, यह भी सर्वविदित है। इसके अलावे अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए बजट की राशि निरंतर बढायी जा रही है।
इसके अलावा यह नरेंद्र मोदी की ही सरकार थी, जिसने सैकड़ों साल से तीन तलाक का दंश झेल रही मुस्लिम महिलाओं को कानून बनाकर उन्हें बराबर का हक दिलाने का काम किया। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने मुसलमानों के लिए सऊदी अरब से आग्रह कर न सिर्फ हज का कोटा बढ़वाया बल्कि उस पर लगने वाली जीएसटी को 18 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया। इसके अलावा नरेंद्र मोदी की सरकार ने ही 6 लाख से अधिक वक्फ बोर्ड और वक्फ संपत्तियों के कागजातों का डिजिटलीकरण करवाने का काम किया है।
इससे देश – विदेश में मुस्लिम समुदाय में मोदी की स्वीकार्यता भी बढी है। मुसलमानों की दुनिया में मोदी की स्वीकार्यता का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि मुस्लिम देश उन्हें अपना सबसे बड़ा सम्मान दे रहे हैं। पीएम नरेंद्र मोदी का शासन मॉडल धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करता है, जबकि 2002 के बाद उनकी छवि को खराब करने के प्रयास किए गए थे। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का यह कहना कि हिंदुस्तान मुसलमानों के बिना अधूरा है और नरेंद्र मोदी का मस्जिदों में जाना, बड़े नीतिगत बदलाव का संकेत हैं। इस पर लोगों की राय भले ही बंटी हुई हो, पर पढें लिखे मुस्लिमो के अंदर हलचल मची है। नगण्य ही सही पर राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए ने 2024 की लोकसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं के 8 प्रतिशत मत पाये हैं। सीएसडीएस-लोकनीति के लोकसभा चुनाव-पश्चात सर्वेक्षण के डाटा देखने से यह तो पता चलता है।
बीजेपी जानती है कि मुस्लिम समाज में बीजेपी के लिए अभी भी संकोच है। वह खुलकर भाजपा के साथ नहीं आ रहा है, और ना ही आयेगी। पर पसमांदा समाज का झुकाव धीरे धीरे देखने को मिल रहा है। सौगात-ए-मोदी से बीजेपी अपने परम्परागत मतदाताओं को कभी नाराज नहीं करना चाहेगी, पर सनातन की आड़ लिए सिर्फ मुस्लिम हितैषी बात करने वाली पार्टियों को जरूर सामने लाना चाहेगी। राजधर्म अपनी जगह होनी चाहिए और कुटनीति अपनी जगह। बीजेपी बस यही लेकर आगे बढ़ना चाह रही है।।
बीजेपी ने इसबार कोशिश कर रखी है कि चाहे किसी राज्य में विधानसभा चुनाव हो फिर लोकसभा चुनाव गोल पोस्ट इनके द्वारा ही तैयार किया गया हो। अभी सिर्फ हाल की घटनाओं को देंखे तो वक्फ, छावा, औरंगजेब, संभल के रास्ते राणा सांगा तक पहुंच चुकें हैं। इतने में ही महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश , चुनावी राज्य बिहार सहित पुरे देश में मुस्लिम मतदाताओं के कथित ठेकेदार बिलबिला रहे हैं। बीजेपी की रणनीति को अगर समझें तो अभी तो ऐसे कई मुद्दे उछाल कर मुस्लिम मतदाताओं के ठेकेदारो को सामने लाकर सनातनी विरोधी के रूप में खड़ा करना बाकी है।
महाराष्ट्र को अगर देखें तो औरंगजेब मामले में शिवसेना उद्भव, एनसीपी को बीजेपी ऐसे मोड़ पर ला दिया कि अब उन्हें सनातनी होने का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की जरूरत आ रही है। उत्तर प्रदेश में सपा राणा सांगा का विरोध करते करते राजपूतों के नाराजगी के करीब पहुंच गयी। इसी क्रम और संभल का विरोध करते करते सपा गौशाला पर विवादित टिप्पणी कर सनातनी विरोधी होने के लगभग पहुंच आयी। राम मंदिर,महाकुंभ और अन्य मुद्दे ही कम थोडे़ थे, जो बैठे बिठाये नित्य नये सनातनी विरोधी होने के प्रमाण बटोरे जा रही है। यूपी में तो लखनऊ में सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा ने तो नमाज पढकर एक कीर्तिमान स्थापित कर दिया है। यह सौहार्द का संदेश है या नाटकीय अंदाज आप खुद तय कर लें। आज मिडिया की गति शायद प्रकाश की गति से भी तेज हो गई है,जनमानस तक पहुंचते देरी नहीं लगती। और ये पब्लिक है, सब जानते लगी है।
उत्तर प्रदेश और बिहार की ओर जरा गौर करें तो और मजेदार स्थिति आप समझ पायेंगे। परिवारिक परम्पराओं को बढ़ा रहे अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव दोनों ही यादव और मुस्लिम समुदाय की राजनीति करते आ रहें हैं। समय समय पर दोनों ने एमवाई में अन्य जातियों को जोड़ने की कोशिश भी करी है। पर अब अगर वर्तमान स्थिति को देखें तो अखिलेश यादव इनदिनों विरोध में इतने ताबड़तोड़ वयान दिये कि मुस्लिम के होकर रहकर अपने जाती से दूर हो गये। गौ पालन उनके जाती का सम्मानजनक पेशा रहा है और उन्हें अब ईत्र की खुशबू के सामने गौशाला से दुर्गंध आनी शुरू हो गई। और तेजस्वी यादव को विवाह के लिए कोई अपनी जाती में लड़की नहीं मिली कहकर उनके ही समाज के लोग नाराज दिख रहे हैं। ऐसा एक यादव बहुल गांव में रात बिताने की मौका मिलने पर खुद चौपाल में यह बातें मैंने सुनी।
अब थोड़ी चुनावी राज्य बिहार की बातें कर लें। यहाँ लगभग 18 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, और 81 प्रतिशत हिंदू मतदाता। वक्फ संशोधन विधेयक को लेकर जो विरोध हुआ, तो दिल्ली से होते हुए विरोध की चिंगारी बिहार में भी पहुंची। विपक्षी दल आरजेडी ने जोरदार विरोध दर्ज कराया। मुस्लिम संगठनों के साथ प्रदर्शन में लालू यादव की मौजूदगी में तेजस्वी यादव ने कहा कि ‘इंशाअल्लाह जीत हमारी होगी’। लालू यादव और तेजस्वी यादव ने तो वक्फ के विरोध में वक्फ विरोधी मुस्लिमों के समर्थन कर जरूर संदेश देने में कामयाब हुए हो गये हों, पर मुस्लिम समुदाय के साथ खड़े होने के बाद सवाल उठता है कि क्या वे इस कदम से गैर-मुस्लिम समुदाय की नाराजगी का जोखिम नहीं उठा रहे हैं। ऐसे में आरजेडी को मुस्लिम वोट बैंक तो मिल सकता है, लेकिन इससे राजनीतिक जोखिम भी बढ़ सकता है। बस ऐसे ही सभी विपक्षी पार्टियां गैर मुस्लिम समुदाय की नाराजगी की तरफ बढे जा रहे हैं।
वक्फ संशोधन विधेयक पर विरोध को झेलना पीएम मोदी की बहुत बड़ी चुन्नौती होगी, खैर बडे़ बडे़ कदम उठाने वाले मोदी यह विरोध आसानी से झेल लेंगे। वैसे भी वक्फ़ संशोधन विधेयक पुरी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद सदन में रखी गई है। पर बीजेपी अपने परम्परागत मतदाताओं को बढ़ाने के लिए जो खेल खेल रही है, एक एक कर विपक्षी पार्टियां उसमें फंसते जा रही है। बीजेपी का ध्यान सिर्फ गोल पोस्ट पर है। तब ना कहते आ रहे हैं बंटेंगें तो कटेंगे,एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे। ये कहना उचित होगा कि गोल पोस्ट बीजेपी का गेंद बीजेपी की और बीजेपी के फेंकें गेंद के पीछे दौड़ लगा रहे हैं एकसाथ सारी विपक्षी पार्टियां। बीजेपी आज जीत के लिए यही मंत्र अपना रही है। अब आगे क्या होता है, देखना दिलचस्प होगा।