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रांची : श्याम परिवार के द्वारा 27 – 28 मई को श्री श्याम वार्षिक महोत्सव आयोजन 

दीपक नाग… ✍️

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झारखंड राज्य के घाटशिला अनुमंडल अंतर्गत मौभंडार के श्याम परिवार श्रद्धालुओं द्वारा श्याम वार्षिक महोत्सव और निशान यात्रा विगत पांच सालों से आयोजन किया जा रहा है। भले ही कार्यक्रम का आयोजन मारवाड़ी समाज के द्वारा किया जाता है पर यह सार्वजनिक स्तर से मनाया जाता है। इस कारण श्री श्याम महोत्सव में अन्य समाज के सनातनी भी जोर-शोर से शामिल होते हैं और निशान यात्रा करते हैं।

दरअसल, श्री श्याम जी के संबंध मे विस्तृत पौराणिक कथाओं को बिना जाने हम इनके महिमा को शायद अच्छी तरह नहीं समझ सकते हैं। कुरुक्षेत्र के युद्ध से जुड़ा हुआ है श्री श्याम जी की कथाएं। जिन्हें तीनों लोक के महा योद्धा बर्बरीक के नाम से भी जाना जाता है ‌। चलिए जानने के लिए यात्रा किजिए मेरे साथ।

इनकी यानी बर्बरीक का मुख्य और प्रसिद्ध मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में स्थित है। जिसे खाटू श्याम जी मंदिर के नाम से जाना जाता है। यहाँ देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दर्शन और निशान यात्रा के लिए आते हैं।

बर्बरीक जिन्हें कलियुग में खाटू श्याम के नाम से जाना जाता है, महाभारत के सबसे शक्तिशाली योद्धा के रुप में जाने जाते थे। महान पराक्रमी भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक को उनकी माता से यह वचन मिला था कि, वे हमेशा हारने वाले पक्ष का साथ देंगे।

बर्बरीक बचपन से ही अत्यंत वीर थे। उन्होंने भगवान शिव और देवी कामाख्या की घोर तपस्या करके तीन ऐसे अचूक बाण प्राप्त किए, जो पल भर में पूरी सृष्टि का विनाश कर सकते थे। इन तीन बाणों की शक्ति ही उनके लिए ‘तीन वाणधारी’ नाम का कारण बनी।

कुरुक्षेत्र की यात्रा और श्रीकृष्ण की परीक्षा :-

जब महाभारत का युद्ध शुरू हुआ, तो बर्बरीक अपने अजेय बाणों के साथ युद्ध देखने के लिए कुरुक्षेत्र की ओर चल पड़े। भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि यदि बर्बरीक युद्ध में शामिल हुए, तो वे हमेशा हारने वाले का साथ देंगे। इस नियम के अनुसार, पहले वे कौरवों हारते दिख उनका साथ देंगे और फिर पांडवों की हारते देख पांडवों का साथ देंगे। ऐसा होने से युद्ध का परिणाम एकदम से अलग हो जाता और दोनों पक्षों का सर्वनाश हो जाता। 

 

 परिस्थितिओं को श्री कृष्ण को समझने में देर नहीं लगा। उन्होंने एक साधारण ब्राह्मण का रूप धारण कर बर्बरीक को रास्ते में रोका और उनकी शक्ति का मजाक उड़ाया। चुनौती मिलने पर, बर्बरीक ने एक पेड़ के सभी पत्तों को एक ही बाण से छेद दिया। श्रीकृष्ण ने जानबूझकर एक पत्ता अपने पैर के नीचे छिपा लिया। जब बाण श्रीकृष्ण के पैर के ऊपर से गुजरने लगा, तो बर्बरीक ने समझाया कि पैर हटा लीजिए, अन्यथा बाण पैर में लग जाएगा। 

ब्राह्मण रूपी श्रीकृष्ण ने बर्बरीक की वीरता की परीक्षा लेने के बाद उनसे गुरु दक्षिणा के रूप में उनका शीश (सिर) मांग लिया। एक वीर क्षत्रिय होने के नाते बर्बरीक ने अपना सिर खुशी-खुशी काटकर दान कर दिया। लेकिन उन्होंने श्रीकृष्ण से इच्छा जताई कि वे अंत तक महाभारत का युद्ध देखना चाहते हैं। 

श्रीकृष्ण ने उनकी इस इच्छा को पूरा किया और उनके कटे हुए सिर को युद्ध समाप्त होने तक एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया। जहाँ से बर्बरीक ने पूरा महाभारत युद्ध अपनी आँखों से देखा। युद्ध खत्म होने के बाद जब पांडवों ने पूछा कि युद्ध का असली नायक कौन है, तो बर्बरीक ने उत्तर दिया कि उन्होंने रणभूमि में केवल श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र चलते हुए देखा है। अर्थात् सारा युद्ध श्री कृष्ण द्वारा ही संचालित था। 
भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के बलिदान और महानता से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि कलियुग में बर्बरीक की पूजा की जाएगी और उन्हे ‘श्याम’ नाम से जाना जाएगा।बर्बरीक में वह शक्ति था कि वे अपने तीन वाणों से तीनों लोक का अध्याय समाप्त कर सकते थे। उन्होने हमेशा हारने वालों का ही साथ दिया। इसलिए कलियुग में उन्हें ‘हारे के सहारे’ नाम से पुकारा जाता है।
इन्हीं अटुट श्रद्धा और आस्था का के बल पर मौभंडार के मारवाड़ी समाज अपने और क्षेत्र की रक्षा के लिए श्री श्याम वार्षिक महोत्सव और विशाल निशान यात्रा का आयोजन करतें हैं। जिसमे नर-नारी बच्चे-बूढ़े सब शामिल होते हैं ।

आगामी 27 और 28 मई से यह आयोजन आरंभ किया जा रहा है। निर्धारित के अनुसार 27 मई के संध्या 6 बजे मौभंडार शिव मंदिर से निशान यात्रा निकलेगी और घाटशिला के डाहिगोड़ा मैदान में बना भव्य पंडाल में श्री श्याम जी जोत के समक्ष विसर्जन करेंगे। यात्रा समापन के पश्चात श्रद्धालुओं के लिए यहां स्वादिष्ट शुद्ध शाकाहारी भोजन व्यवस्था और प्रसाद वितरण किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि, इस भव्य पंडाल में श्री श्याम जी का पूजा-अर्चना निरंतर चलता रहेगा। साथ ही संध्याकालीन समय में श्री श्याम जी के भजन प्रस्तुती के लिए दुसरे शहरों से कलाकार आ रहें हैं।

 

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