Advertisements
Spread the love

मकर पोरोब और टुसू को लेकर सजे बाजार; पीठा पकवान को लेकर चलने लगे प्राचीन ढेकी…

डिग्ता डिदांग मकर पोरबे…..

सरायकेला। सरायकेला-खरसावां जिले के सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध वार्षिक पर्व मकर परब के आने का काउंट डाउन शुरू होते ही पूरा क्षेत्र मकरमय बनने लगा है। एक ओर जहां मकर पर्व और टुसू पर्व के मनोहारी गीतों से क्षेत्र गुंजायमान हो रहा है। वहीं दूसरी ओर मूर्तिकार भी टुसू की प्रतिमा को अंतिम रूप देने की तैयारी कर रहे हैं। छोटे से बड़ा हर वर्ग अपने अपने सामर्थ्य और तरीके से मकर पर्व मनाने की तैयारी में जुटा हुआ देखा जा रहा है। इधर पंचांगीय दशा के अनुसार मकर पर्व के आयोजन दिन को लेकर भी लोग जानकारों की सलाह ले रहे हैं। जबकि स्थानीय पंचांग दशा के अनुसार 14 एवं 15 जनवरी दोनों ही मकर पर्व मनाए जाने की तैयारी की जा रही है।

Advertisements

13 प्रकार के पीठा का होता है महत्व:-
मकर पर्व में क्षेत्र के अनुसार कहीं चूड़ा दही और खिचड़ी की तैयारी हो रही है। तो एक बड़े समाज जिले भर में विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों में मांस पीठा का सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है। जिसमें 13 प्रकार के पीठा बनाए जाने की परंपरा रही है। परंतु समय के साथ और आधुनिकता के बीच में 13 प्रकार का पीठा याद बनता जा रहा है। बुजुर्ग जानकार बताते हैं कि बनाए जाने वाले 13 प्रकार के पीठों में गुड पीठा सबसे महत्व का होता है। जिसे प्रत्येक घरों में मेहमान नवाजी के साथ-साथ साथी मित्रों और परिजनों के घरों तक पहुंचाने के लिए भी बनाया जाता है। इसके अलावा खपरा पीठा, मांस पीठा, दूध पीठा, डुबू पीठा, काकरा पीठा, जेंठुवा पीठा, लव पीठा, डिंगला पीठा, मोड़ा पीठा, अलसा पीठा, छिलका पीठा एवं बिरा पीठा भी बनाए जाते हैं।

मकर में आती है ढेकी की याद:-
मकर पर्व के आते ही लगभग लुप्त हो चुकी प्राचीन परंपरा का अभिन्न अंग ढेकी का महत्व दोगुना हो जाता है। न्यूट्रिशन और पूजा परंपरा का फंडा देखें तो हमारी भारतीय सभ्यता में ढेकी के चावल को ही शुद्ध और पौष्टिक माना गया है। इसलिए मकर पर्व में ढेकी के चावल की उपयोगिता काफी बढ़ जाती है। जिसमें बाजार में उपलब्ध सामान्य पॉलिशिंग चावल की अपेक्षा अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट और ग्लूकोज की मात्रा होती है। और ढेकी से चावल कुटे जाने के कारण पौष्टिकता और मीठापन बरकरार रहती है। मकर पर्व पर में विशेष रुप से तैयार किए जाने वाले चावल के आटे का पीठा, चूड़ा और चढ़ावे के लिए नए धान का चावल भी ढेकी से कूटा जाता है। परंतु ढेकी से चावल कूटने का काम काफी मेहनत भरा होने के कारण आज के आधुनिकता के समय में ग्रामीण परिवार भी इससे दूर होते हुए देखे जा रहे हैं। अब इक्के दुक्के घरों में ही ढेकी के दर्शन हो पाते हैं।

टुसू की होती है पूजा:-
सरस्वती एवं लक्ष्मी माता के कुंवारी स्वरूप में टूसू के कुंवारियों द्वारा पूजन की परंपरा है। इसलिए इसे स्थानीय तौर पर टुसू पर्व के रूप में जाना जाता है। वैभव और सुख समृद्धि की प्रतीक माने जाने वाली टुसु की पूजा अर्चना कुंवारियों द्वारा विधि विधान के साथ की जाती है। 7 दिनों के विशेष टूसु पूजन के बाद कुंवारी कन्याएं मकर पर्व के दिन टूसु की प्रतिमा को सिर पर उठा कर घर घर पहुंचती है। इस दौरान मनोहरी टुसू गीतों के साथ टुसु का स्वागत और पूजा अर्चना किया जाता है। जिसके बाद परंपरा अनुसार टुसू प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

मकर के गीतों से गुंजायमान हो रहे हैं क्षेत्र:-
आसछे मकर दु दिन सबुर कर; छांका पीठा होबेक सबुर कर….. और तोरा राह काढो नाई गोरोबे; डिग्ता डिदांग मकर पोरबे….. जैसे गीतों से क्षेत्र गुंजायमान हो रहा है। इसके अलावा कई कलाकार मौके पर नए नए गीतों की रचना भी कर रहे हैं। हालांकि मकर पर्व के साथ कोरोना के थर्ड वेब को देखते हुए पूर्व के वर्षों की भांति त्यौहार में उत्साह नहीं देखा जा रहा है। बावजूद इसके लोग परंपराओं के साथ मकर का त्यौहार मनाने की तैयारी कर रहे हैं।

You missed

#दरभंगा #दरभंगा #चंपारण #भागलपुर #दहशत #आतंक #दंगा #नक्सल #लूट #संथाली #आदिवासी #हरिजन # पिछड़ी जाती News Uncategorized उत्पिड़न किसान कोडरमा कोयलांचल कोल्हान क्राइम खुटी गढवा गिरीडीह गुमला गोड्डा चतरा चाईबासा चोरी जमशेदपुर जरा हटके जामताड़ा झारखण्ड टेक्नोलॉजी दिल्ली दुमका दूर्घटना देवघर धनबाद पटना पलामू पश्चिम सिंहभूम पाकुड़ पूर्वी सिंहभूम प्रशासन - सुरक्षा बल बिज़नेस बिहार बिहार बोकारो भ्रष्टाचार/अराजकता राँची राजनीति राज्य राज्यसभा रामगढ़ लाइफस्टाइल लातेहार लोकसभा लोहरदग्गा विकास कार्य विधानसभा शहर शिक्षा व रोजगार शोकाकुल संथाल सरायकेला-खरसावाँ साहिबगंज सिमडेगा सुर्खियां स्वास्थ्य हजारीबाग

रांची : पंचायती राज का सपना धरातल में कहां तक सच हो पाया है ?