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चांडिल : अपने बचे कुचे वजूद बचाने के लिए सड़कों पर उतरे चांडिल डैम के विस्थापित

दीपक नाग …✍️

२५, अगस्त’ २०२६ : झारखंड सरकार मुल वासी और आदिवासीयों के हित में बातें तो करतें हैं पर धरातल में हकीकत क्या ब्यां कर रहा है, इसे वहीं समझ सकते हैं जो करीब और गहराई तक जाकर बातों को समझने की कोशिश की है। इसे जानने के लिए हम पुरे प्रदेश की बातें तो बता नहीं सकते हैं, पर झारखंड राज्य के सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल प्रखण्ड स्थिति चांडिल डैम के विस्थापितों के परेशानी पर बातें कर सकतें हैं। जानने के लिए यात्रा किजिए मेरे साथ।

वैसे तो लगभग पीछले पचास सालों से चांडिल डैम के विस्थापितों के आंदोलन का इतिहास रहा है। अविभाजित बिहार ने हरित क्रांति की सोच बनाई और हजारो लोग सैकड़ों परिवार के घर-जमीन एक के बाद एक गांव जलमग्न होता गया। परिवार सड़कों पर आ गया। सरकार ने विस्थापितों के लिए विस्थापित नीति बनाई। नीतिओं में कुछ कम-बेसी होने के कारण विस्थापितों के मन में व्यवस्था तंत्रों के प्रति असंतोष व्याप्त रहा। और समय के अंतराल मे असंतोष बढ़ता गया। विस्थापितों का माने तो व्यवस्था तंत्रों के एक अधिकारी से लंबे आलोचना के बाद कुछ आशा बनने के पहले ही अधिकारीयों का तबादला होने से आशा अनुकूल कार्य आज तक नहीं हो सका।

बहरहाल, समय – समय पर विस्थापित अपने विभिन्न मांगों को लेकर एड़ी-चोटी रगड़ते रहें। अंततः विस्थापितों ने मिल कर “चांडिल डैम विस्थापित समन्वय मंच” का गठन किया। जिसमें कुल दस मांगों को रखा गया है –

१. विस्थापन आयोग को शीघ्र चालू किया जाए।

२. विस्थापितों के लिए सरकार अविलंब पुनर्वास पैकेज आरंभ करें।

३. अवसर प्राप्त कर्मचारियों के रिक्त पदों को अविलंब भरा जाए।

४. पालिटेक्निक संस्थानो में विस्थापितों के परिजनों को पचास प्रतिशत आरक्षण दिया जाए।

५. पुनर्वास कार्यालयों भ्रष्टाचार मुक्त और जबाबदेह बनाएं।

६. चांडिल डैम के भंडारित जल में मत्स्य पालन का धिकार विस्थापितों को दिया जाए।

७. पुनर्वास स्थलों का भूमि पट्टा विस्थापितों को दीया जाए।

८. चांडिल डैम में नौका विहार के अलावा अन्य आर्थिक रोजगारों का अधिकार विस्थापितों को दिया जाए।

९. लिफ्ट सिंचाई प्रणाली से चांडिल डैम का पानी किसान के खेतों तक पहूचाने की व्यवस्था किया जाए।

१०. पुनर्वास, रोजगार और मुआवजा से जुड़े मामलों को  अविलंब निपटारा किया जाए।

बता दूं कि, आम तौर पर चांडिल के विस्थापितों के पुनर्वास नीति के तहत पुरी प्रतिक्रियाएं अभी तक आधा-अधूरा पड़ा हुआ है। अपने ही राज्य में अपरिचित का संज्ञा देकर जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य है। अभी तक पुनर्वास नीति के तहत पुनर्वास स्थल का भुमि पट्टा नहीं दिया गया है।

औसतन विस्थापितों का जीविका निर्वाह डैम के जलासय में मत्स्य पालन और पर्यटकों को नौका विहार पर आश्रित है। विस्थापितों के प्रतिनिधित्व करने वाले श्यामल मार्डी का कहना है कि, झारखंड राज्य के पर्यटन मंत्रालय ने इसका टेंडर निकाल कर किसी बाहरी ठेकेदार को देने की कोशिश करके विस्थापितों के रोजी-रोटी पर प्रहार करने की कोशिशें की जा रही है। उन्होंने कहा, घर-द्वार और जमीं हमने खोया है। देखा जाए तो हम चांडिल डैम के विस्थापित कायदे से कानून पता विहिन है। हमारे वजूद पुरी तरह मिटाने की कोशिश किया जा रहा है। हम जान दे देंगे पर झुकेंगे नहीं। श्यामल मार्डी ने कहा, विस्थापितों मे अधिकांश संथाली आदिवासी और मुल वासी हैं। जल, जंगल और जमीन पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

बहरहाल, चांडिल डैम के विस्थापितों का मामला तुल पकड़ता जा रहा है। प्रभावित परिवार के जीवन यापन करने वाले इलाकों में मुख्य रूप से अंबिका यादव, विवेक सिंह, बाबु, श्यामल मार्डी, राकेश रंजन, कार्तिक कालिंदी, संजीव यादव, किरण हेम्ब्रम,होगा माझि, गुरु चरन टुडू जन जागरण अभियान चलाया। यह जागरूकता अभियान 27 अगस्त’ 2026 तक चलाया जाएगा। समय रहते हेमंत सरकार को इनके बातों पर विचार करना लाजिमी होगा।

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