चांडिल : संदर्भ ~ बलभद्र गोराई, सत्ता परिवर्तन होता रहा पर व्यवस्था नहीं…
दीपक नाग…✍️
ईचागढ़ अन्तर्गत बुरुहातु के बलभद्र गोराई का कहना है, उसने 2006 बर्ष से ग्राम प्रधान के रूप से सेवा प्रदान किया पर एक वर्षों से अंचल कार्यालय से उनका नाम ग्राम प्रधान की पद से हटा दिया है । उच्च न्यायालय के शरण में जाने के लिए है बाध्य । वर्षो से मानदेय नहीं मिलने की बात कही ।
परिवार का बोझ जब कांधे पर हो तो उम्र उसे हरा नहीं सकता है । खास करके एक असहाय गरीब वृद्ध व्यक्ति के लिए यही वजह होता है । बलभद्र गोराई की कहानी भी कुछ ऐसी दास्तां से जुड़ी हुई है । बुढ़ापे के दहलीज पर शायद विधाता ने उनके लिए एक संघर्षमय जीवन लीख रखी है । परिवार के नौ परिवार का पेट भरना उनकी जिम्मेदारी हो गई है । टेंपू चलाकर अपना और परिवार का आजीविका चलाता है। बर्ष 2006 से ईचागढ़ विधान सभा क्षेत्र में टेंपू चलाकर लोगों को सेवा कर रह हे । पर आज खुद ईचागढ़ प्रखंड कार्यालय का चक्कर काट कर थक चुका है । श्री गोराई ने कहा कि, अंचल और प्रखंड स्तर में उनका कोई सुनने वाले नहीं हैं । इस लिए वह वृद्धावस्था पेंशन और ग्राम प्रधान का मानदेय का मामले को लेकर उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर न्याय का गुहार लगाएंगे।
बलभद्रा गोराई की घटना तो केवल एक उदाहरण है स्मिथ और समाचार के लिए। न जाने ऐसे कितने गुमनामी किस्से होंगे जो नजरों के सामने आ ही नहीं सका और नाइंसाफी की मोटी परत गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिये होंगे।
जाहिर है, समय-समय पर सत्ता का तो परिवर्तन होता रहा पर व्यवस्था में परिवर्तन किसी भी राजनीतिक दल करवा न सका ।