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डॉ मयंक मुरारी को मिलेगा शब्द शिल्प सम्मान
जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल में होंगे पुरस्कृत

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Arjun Kumar Pramanik…..✍️

नामकुम(राँची)। चिंतक, लेखक व ग्रामीण विकास के संवाहक डॉ मयंक मुरारी को जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल  में “शब्द शिल्प सम्मान” से सम्मानित किया जाएगा। डॉ मुरारी को सम्मान के साथ एक लाख रुपए की राशि भी दी जाएगी। कार्यक्रम का आयोजन 20 व 21 दिसंबर, 2025 को होगा। विद्यापीठ फाउंडेशन और इस आयोजन के निदेशक संदीप मुरारका ने यह जानकारी दी। श्री मुरारका ने बताया कि डॉ मुरारी को यह सम्मान अंग्रेजी में लिखी पुस्तक ज्तपइंस इतंअमीमंतज के लिए दिया जाना है। यह प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित हुई और जिसके सह लेखक अचल प्रियदर्शी हैं।
डॉ मयंक मुरारी अपने सार्वजनिक जीवन में 20 किताब और 700से अधिक आलेख लिखा चुके हैं। वह मुख्यतः अध्यात्म, आदिवासी जीवन और ग्रामीण विकास पर लेखन करते हैं ।
राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाले इस आयोजन में देश के सात लब्धप्रतिष्ठित व्यक्तित्व को सम्मानित किया जाना है। इसमेंल राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, दिव्य प्रकाश दूबे, बाबुश कोहली, व्योमेश शुक्ला, अंजुम शर्मा, रविदत्त वाजपेयी को भी सम्मानित किया जाएगा। इसके अलावा दो दिन के कार्यक्रम में विभिन्न विषयों पर विचारोत्तेजक चर्चा होनी है। एक सत्र में अध्यात्म और समाज विषय पर परिचर्चा भी होगी। इसमें डॉ मुरारी अपने विचार रखेंगे।
डा मयंक मुरारी एक  विचारक और सक्रिय लेखक हैं। वह सामाजिक व्यक्तिगत विकास के लिए लिखते और काम करते हैं। वह भारत के ज्ञान प्रणाली के आंतरिक मूल्य और अंतर्निहित पहलू पर सोचते हैं और चिंतन करते हैं। उन्होंने 30 सालों  में अभी तक 20 किताबें और 700 से अधिक रिपोर्ट, भारतीय समाचार पत्र और पत्रिका में  लिख चुके हैं। इन कार्यों के कारण उन्हें कई अवार्ड और पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। वह उषा मार्टिन में महाप्रबंधक सीएसआर और पीआर के रूप में काम कर रहे हैं, जहां  पिछले 15 सालों से गांवों के टिकाऊ विकास के प्रति संकल्पित है। वह हमारे समाज की सामूहिक जागरूकता के लिए विभिन्न मंचों से व्याख्यान भी देते है।
जनजाति आंदोलनों की प्रमुख विशेषताएं सामाजिक और आर्थिक शिकायतों, जैसे ब्रिटिश नीतियों द्वारा शोषण, भूमि और वन अधिकारों का हनन, और पारंपरिक जीवन शैली में हस्तक्षेप का विरोध थीं। इस जनजातीय आंदोलन की चेतना राष्ट्रीय थी। आंदोलनों का नेतृत्व अक्सर करिश्माई और मसीहा जैसे नेताओं द्वारा किया जाता था।
एकजुटता और पहचान सांस्कृतिक और पारंपरिक संबंधों पर आधारित थी, जिसमें समुदाय के नायकों और मिथकों से प्रेरणा ली जाती थी।

डा मयंक मुरारी ने बताया कि ये आंदोलन अक्सर करिश्माई नेताओं के नेतृत्व में होते थे, और उनमें सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतिरोध का एक मजबूत तत्व शामिल था, जिसमें अपनी पहचान और रीति-रिवाजों को संरक्षित करने पर जोर दिया जाता था। इसके अतिरिक्त, इन आंदोलनों की प्रकृति अक्सर स्थानीय और छिटपुट होती थी, हालांकि वे अपने विरोध को व्यक्त करने के लिए गुरिल्ला युद्ध जैसी हिंसक रणनीतियों का भी उपयोग करते थे।