Spread the love

मसला : दर्द ए विस्थापित चांडिल डैम…..

तो खींच मेरी फोटो…..

सरायकेला (संजय मिश्रा ) आजकल फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर पब्लिसिटी करने का फैशन आम हो चला है। हद तो तब हो जाती है जब लोग किसी के दुख में भी अपना पब्लीसिटी करने से बाज नहीं आते हैं। कुछ ऐसा ही माजरा पीछले 5 दशक से होता आ रहा है । जिसका निदान नहीं हो सका है । बाढ़ आते ही राजनिति के ज्ञानी राहत ने नाम पर दिलों में जगह बना कर फिर वोट की राजनीति शुरू हो जाती है विस्थापित यह सोचकर वोट की ताकत से अपना इन चालबाजों को रहानुमा बना लेते हैं, पर बारिश की चन्द बुंद की तरह उम्मीदें की काली फिल्म पांच वर्षो में हटने लगती है, धीरे-धीरे उम्मीदें टुटने लगती है फिर क्या—-

चाण्डिल डैम की विस्थापितों की कहानी प्रत्येक वर्ष यह नई लिखी जाती है । जहां पीछले 5 दशक से आतिवृष्टि होने के साथ ही डैम डूब क्षेत्र में निवासी कर रहे विस्थापितों के दिल की धड़कनें तेज हो जाती है, और वही इसके साथ ही स्थानीय जनप्रतिनिधियों के दिलों में फोटो खिंचवाने की उम्मीदें तेज हो जाती है। हर साल की भांति इस साल भी चांडिल डैम का जलस्तर 183 से बढ़ा और डैम के गेट खुलने के साथ ही जनप्रतिनिधियों के फोटो खिंचवाने का सिलसिला जारी हो गया है। जिसमें विस्थापितों और प्रभावितों से मिलकर आश्वासन के दो घूंट देते हुए फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर एवं मीडिया में छाए रहना एकमात्र परम लक्ष्य है। कई सरकारें बनी और कई सांसद और विधायक आयें एवं कई कतारबद्ध है विधायक बनने को लेकर है । सभी बरसात का मौसम का इंतिजार करते है और तिजोरी में रखें काला धन डुबी क्षेत्र में बहाकर फिर 5 वर्षो तक शासन करने के उद्देयश में लुटाने में लगे रहते है ।

दो-दो राज्य के बिहार सरकार और झारखंड सरकार का शासनकाल देख चुकी चांडिल डैम भी राजनीति में माहिर हो चली है। महत्वाकांक्षी परियोजना चांडिल डैम प्रोजेक्ट के पूरा होने की आस में बरसों बरस बीत गई पर मूल समस्या जस की तस बनी है। यहां विस्थापितों की समस्या विकराल है तो डूब क्षेत्र के लोग मगरमच्छ के मुंह में जीवन गुजारने जैसा जिंदगी बसर कर रहे हैं। परंतु इनके मूल समस्याओं से आज तक किसी भी जनप्रतिनिधि को सरोकार नहीं रहा है।

बिहार सरकार के समय से शुरू हुई महत्वाकांक्षी परियोजना चांडिल डैम प्रोजेक्ट के पूरा हो जाने से आज झारखंड के साथ उड़ीसा और पश्चिम बंगाल दो अन्य राज्य में खुशहाल होते। जिसमें प्रोजेक्ट के तहत उड़ीसा और पश्चिम बंगाल राज्य को भी पानी दिया जाना था। ऐसा होने से जलस्तर में बढ़ोतरी की संभावना और संभावित बाढ़ के भय से क्षेत्र निर्भय की स्थिति में पहुंच जाता। इसके साथ ही अनावृष्टि की स्थिति में किसानों की परेशानी से मुक्त और किसान खुशहाल नजर आते।

बहरहाल पूरे मामले में एक बात स्पष्ट नजर आ रही है कि हालात जस के तस बने रहेंगे। और सीजन आते ही जनप्रतिनिधि फोटो खिंचवाने, प्रभावित आश्वासन देने और हम आदतन फोटो खींचने आते रहेंगे।

You missed