















RANCHI : झारखंड राज्य का दिशा क्या होना ना और दशा क्या हो रहा है ?
दीपक नाग … ✍️











19 अगस्त 2026 :
आज झारखंड एक आमिर राज्य है पर झारखंड के साधारण लोग गरीब क्यों? इस बात से हम इंकार नहीं कर सकते हैं। वर्ना, युवक-युवती रोजगार के लिए आज सरकार के खिलाफ कमर कसे सड़कों पर क्यों अड़े हुए हैं ? क्या यह दिन देखने के लिए झारखंड अलग राज्य की लड़ाईयां लड़ी गई थी ? यह प्रश्न हर एक उस राजनीतिक पार्टी की ओर इशारा कर रहा है जिन्होंने झारखंड अलग राज्य बनने के बाद सत्ता का सुख भोगा है।
झारखंड अलग राज्य ऐसे ही किसी ने आसानी से थाली में परोस कर नहीं दे दी। अलग राज्य के लिए लड़ाई लम्बे समय तक आंदोलन चलता रहा । लोगों की जानें गईं, घर-द्वार छोड़ें, अपने भविष्य को दांव पर लगाकर खुद को आंदोलन के ज्वाला पर झोंक दिया। खनिज संपदा और भौगोलिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण राज्य है झारखंड। झारखंड आंदोलन के दौरान सरकार पर दबाव बनाने के लिए आंदोलनकारी समय-समय पर खनिज-पदार्थों का आर्थिक नाकेबंदी करते थें। झारखंड राज्य का खनिज संपदा, अन्य राज्यों में रोजगार श्रृजन करें और झारखंड की हालत एक जैसी बने रहे ! इन बातों को लेकर झारखंड आंदोलन का रफ्तार बड़ता गया। अंततः झारखंड को अलग राज्य का पहचान मिला और 15 नवंबर’ 2000 को “झारखंड अलगा राज्य” का स्थापना हुई।

समय-समय पर झारखंड राज्य का बागडोर अलग-अलग राजनितिक दलों को मिलता रहा। पर जिस सोच से झारखंड की लड़ाई लड़ी गई थी, धरातल में ऐसा कुछ भी हासिल नहीं हुआ। समस्याएं वहीं खड़ी है जहां पर 27 साल पहले खड़ी थी। समय के अंतराल में और भी विकराल रूप लेता गया। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? झारखंड के साधारण जनता जिन्होंने भरोसा के साथ सत्ता पर बैठाते रहें या जनप्रतिनिधि समुदाय ? झारखंड अलग राज्य बनने के पीछे उद्देश्यों को एक बार मुड़ कर देख लेना जरूरी था। बड़े-बड़े बातें करने वाले राजनेता समझते होंगें कि, जनता भुल गए हैं कि, झारखंड का दिशा क्या होना था और दशा क्या हुआ ? भ्रष्टाचार और बड़ता बेरोज़गारी का ग्राफ जैसे दंश झेलते-झेलते लोग परेशान होने लगे।
बहरहाल, चलते हैं वर्तमान में झारखंड के सबसे ज्वलंत मुद्दों पर। कुछ सप्ताह पहले दिल्ली के जंतर-मंतर में NEET UG परीक्षा में धांधली पर CJP का आंदोलन ने सरकार को झुकने के लिए मजबूर कर दिया था। वैसे दुसरा एक आंदोलन रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और धांधली के विरोध में छात्रों एवं अभ्यर्थियों का धरना और आंदोलन 29 जुलाई 2026 को आरंभ हुई।
आंदोलित परिक्षार्थी ने सरकार पर आरोप लगाया कि, सफल परिक्षार्थी को रोक कर बैक-डोर से लाखों रुपए लेकर असफल परिक्षार्थी को नौकरी दिया गया। इन परिक्षाओं और बहाली को रद्द करने कू लिए शान्ति पूर्ण तरीके से प्रदर्शन आरंभ हुआ। JLKM के पदाधिकारी सह छात्र नेता देवेंद्र महतो इस आंदोलन को समर्थन देते हुए आमरण अनशन पर बैठे । इस बीच उनके तबियत काफी बिगड़ने लगी तो अस्पताल में दाखिल कराया गया ।

इस बीच अनेक तरह की बातें हुई। विधानसभा घेराव तक का कार्यक्रम युवक – युवतियों द्वारा चलाया गया। मामला जंगल के आग की तरह पुरे देश में फैल गया। सोशल मीडिया के माध्यम से पल-पल की खबरें मेन स्ट्रीम मिडिया से ज्यादा तेज दौड़ने लगें। मानों ऐसा लगा जैसे दिल्ली जंतर-मंतर की चिंगारी रांची तक पहुंच गई।
अंततः सरकार को बैक-फुट में आना पड़ा और सरकार ने JSSC – CGL और 2014 के बाद से आउटसोर्सिंग एजेंसी TDPL के माध्यम से ली गई 44 भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने के फैसला लिया गया।
पर प्रदर्शनकारी सरकार के इन फैसलों को आधा-अधूरा मानते हैं। हेमंत सरकार मामले की जांच के लिए CID को जिम्मेदारी सौंपी है। प्रदर्शनकारि इसका विरोध में आज भी है और CID को हटाकर CBI से जांच कराने के बात पर अडिग है।
धरना-प्रदर्शन अब भी जारी है। इस पुरे घटना के परिपेक्ष्य में झारखंड लोकतांत्रिक खतियानी मोर्चा (JLKM) के कोल्हान प्रमंडल का वरिय उपाध्यक्ष माधव महतो वानांचल के पत्रकार को फोन पर बताया, CID राज्य सरकार के अधिनस्थ है इसलिए जांच CBI से करवाया जाए। महतो ने कहा यह जांच CBI से करवाए बिना पीड़ीत हिलने वाले नहीं है। पर्वत कभी हिलता है क्या ? उन्होंने ने आगे कहा, जिन लोगों ने खोया है, दर्द वहीं समझ सकते हैं। श्री महतो ने कहा, CBI से जांच होने पर भ्रष्टाचार के इस नदी में छुपे हुए बड़े-बड़े मगर मच्छों का चेहरा सामने आने की उम्मीद कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कहा, CBI जांच करने पर एक फायदा यह हो सकता है कि, जहां भ्रष्ट लोगों का कलाई कसेगी वहीं सरकार के निर्णय से नौकरी जाने वाले सफल परीक्षार्थियों को बताया जा सकता है। CBI कोई न कोई रास्ता दुध और पानी को अलग कर सकता है ।
माधव महतो ने एक बड़ा सवाल उठाया कि, इन परिक्षाओं के लिए ब्लैक लिस्टेड एजेंसी को किस-किस ने चयन करने के लिए पैरवी लगाया ? इसके अलावा प्रस्ताव किसने रखा और स्वीकृति किसने दी है ? उन्होंने कहा, यहां पुरा सिस्टम ही फेल है। CBI से जांच करवाने से सरकार क्यों घबराए रहे हैं?परिक्षार्थी, विद्यार्थी और आम लोगों को स्पष्ट समझ में आ रहा है कि, खेल कहां से खेला जा रहा है।
खबरों के अनुसार, वैसे लोग जिन्होंने ने सरकार के निर्देश पर अपनी नौकरी से हाथ धोने के कतार में हैं, वे सारे हेमंत सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उच्च न्यायालय के सहारा ले रहे हैं। जरुरत पड़ने पर मुख्य न्यालय तक भी थाने का मन बना चुके हैं।
बहरहाल, हेमंत सरकार के लिए राजनितिक अग्नि परीक्षा है। आगे कुआं तो पीछे खाई जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। आरंभ से ही अगर नौकरी बहाली में हो रही घपले बाजी पर नकेल कसे होते तो आज यह दिन देखना न होता।
सवाल है कि, सरकार पीड़ितों के आवाज का साथ चलना है या दल का मन रखें ? यह यक्ष्य प्रश्न है। राजनीतिक जीवन में कभी-कभी ऐसा समय उत्पन्न होता है जब नेताओं को राजनितिक अग्नि परीक्षा देनी होती है।





