Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Spread the love

मुसाबनी: राजनितिक दलों के नेता खुद मे है मश्गूल, बेरोजगार दाने-दाने पर है मोहताज 

दीपक नाग… ✍️

Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements

२१, अगस्त : हिन्दुस्तान कापर लिमिटेड/आर. के. रिसोर्स प्राइवेट लिमिटेड सुरदा खनन इकाई में मजदूरों के बहाली को लेकर हो रही गड़बड़ियों को लेकर पुर्वी मुसाबनी पंचायत के बेरोजगार गोल बंद होने लगें। इन लोगों का कहना है कि, सुरदा में चल रहे उत्पादन कार्य के लिए क्षेत्र के बेरोजगारों को काम पर रखा जा रहा है। जिसके लिए पंचायत स्तर से विधिवत रुप से ग्राम सभा का आयोजन किया जाना है। पर पुर्वी मुसाबनी पंचायत के मुखिया और ग्राम प्रधान ने विधिवत तरीके से कोई जानकारी दिए बगैर सभा आयोजन दिखा दिया है । पंचायत के सभी लोगों को इसकी जानकारी नहीं दी गई है।

 इसके विरोध में दर्जनों भर गांव वासियों ने लिखित शिकायत मुसाबनी प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी को सौंपा। प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व चन्दन शर्मा, ओंकार सिंह और पिटर राज ने किया । आवेदन का प्रतिलिपि अंचलाधिकारी (मुसाबनी), अनुमंडल पुलिस अधिक्षक (मुसाबनी), अनुमंडलाधिकारी (घाटशिला) तथा आर. के. रिसोर्स प्राइवेट लिमिटेड सुरदा खनन इकाई प्रबंधन को सौंपा। 

आवेदन के माध्यम से आग्रह किया गया कि, पुर्वी मुसाबनी पंचायत के मुखिया और ग्राम प्रधान के द्वारा जिस बैठक का प्रस्ताव संबंधित विभाग को सौंपा गया है उसकी जांच कराया जाए और नये सीरे से विधिवत तरीके से ग्राम सभा बुलाया जाए।

पुरे देश के हर राज्यों में बेरोज़गारी का ग्राफ तेजी से बढ़ती जा रही है। रोजी-रोटी के तलाश में आये दिन दुसरे राज्यों में पलायन जारी है। जिन राज्यों से जितना अधिक पलायन का अर्थ है वह राज्य जरूरत के अनुशार रोजगार देने में असफल रहा है। झारखंड राज्य भी इस दौड़ में किसी से पीछे नहीं है। दो दशकों बाद जब सुरदा के बंद पड़ा खदान को प्राइवेट एजेंसी के माध्यम से आरंभ किया गया तो जाहिर है प्रत्येक बेरोजगार नौजवानों के चेहरों में एक आशा की किरण जगी।

खबरों के अनुसार मजदूरों के इस बहाली में प्रारंभ से ही दलाली करण हावी रहा है। जिनका राजनितिक अच्छी पैठ है उन्हें मुफ्त में सुरदा खनन कार्यों में काम मिल गया । दुसरी तरफ कथित दलाल मोटा पैसे लेकर युवकों को कम दिलाता रहा। चर्चा है कि, दलाली का यह रकम चालिस – पचास हजार रुपए तक होता है। चर्चा में यह भी है कि, जिन लोगों का पैरवी चलता है वैसे लोग इस रेकेट में शामिल हैं। इनमें राजनीतिक और गैर राजनीतिक बंदा कोई भी है सकता है। आखिर मुसाबनी क्षेत्र में साधारण मजदूर का काम को लिए इतनी मारा-मारी क्यों है? इसे जानने के लिए ढाई दशक पीछे फ्लेस बैक को समझना जरूरी है। कहते हे कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के लोग यहां के खदानों में अपना सेवा प्रदान करते थें। जिस कारण मुसाबनी के लोगों को अनेक राज्यों की भाषाएं काफी हद तक समझने और बोलना आता था। यूं कहिए कि, भारत मे एक “छोटा सा हिन्दुस्तान” मुसाबनी के वादियों में अहसास किया जाता था।

हिन्दुस्तान कापर लिमिटेड/इंडियन कापर कांप्लेक्स मुसाबनी ग्रुप आफ माइंस उपक्रम 1996 तक एक खुशहाल छोटा सा कस्बा हुआ करता था। मुसाबनी ग्रुप आफ माइंस के छः तांबें के खदानें (बानालोपा, मुसाबनी, बादिया, साऊथ सुरदा, केंदाडिह और राखा) चला करता था। हजारों नर-नारी इसमें स्थाई कामगार हुआ करता था। तब झारखंड अलग राज्य नहीं बना था। केंद्र में कांग्रेस और प्रदेश (बिहार) में लालू प्रसाद यादव का जनता दल शासन किया करता था। 1996 के मध्य शनिवार के दिन सबेरे छः बजे के पाली मे अपने कार्य पर योगदान देने वाले कर्मचारियों ने देखा कि, बानालोपा माइन के नोटिस बोर्ड में बादिया माइन लगातार नुकसान के कारण बंद कर दिया जाएगा, इसे क्लोजर नोटिस के नाम से जाना जाता है। खदान बंद करने का तिथि क्लोज नोटिस में दे दिया गया था। यह बात जंगल की आग की तरह फ़ैल गई। तत्कालीन अपोजिशन के मजदूर संगठनों ने इसका जमकर विरोध किया और इस क्लोजर नोटिस में एक छेद ढूंढने में सार्थक हुए। इसी आधार पर लेवर कोर्ट में अपील दायर कर तत्काल के लिए कंपनी प्रबंधन का यह पहला क्लोज़र नोटिस को खारिज कर दिया। पर खतरा अभी टला नहीं था। कुछ महीने बाद कंपनी प्रबंधन ने अपने गलतीयो को सुधार कर दुसरा, तीसरा … क्लोजर नोटिस निकलता गया और एक के बाद एक खदानें बंद होती चली गई। और वर्ष 2000 तक यह “छोटा सा हिन्दुस्तान” अंधेरों में गुम हो गया ।

आज मुसाबनी में बेरोज़गारी का मिशाल खड़ा है। राजनितिक दलों के अपने-अपने राजनिति चमकाने में मशगूल हैं। जब कि, बेरोजगार परिवार दाने-दाने पर मोहताज है।

बहरहाल, जिन विभागों को एक आशा और उम्मीदों के साथ पीड़ितों ने अपने परेशानी और दुःख व्यक्त किया, उन जिम्मेदार तंत्रों के खेमे में अब गेंद है कि, मामले को गहराई से ले या ठुकराए। यह एक यक्ष्य प्रश्न है।

Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements
Advertisements