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विश्व आदिवासी दिवस पर दर्द की ऐसी तस्वीर, जो झकझोर दे: देश के लिए पदक जीतने वाला खिलाड़ी प्रधान हांसदा आज परिवार पालने के लिए कर रहा मजदूरी

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रिर्पोटर – जगबंधु महतो

पदकों से चमका सीना, मगर घर में चूल्हा जलाने की चिंता: अंतरराष्ट्रीय एथलीट प्रधान हांसदा की दर्दभरी कहानी ने उठाए व्यवस्था पर सवाल

गम्हरिया: आज पूरा देश विश्व आदिवासी दिवस मना रहा है। कहीं आदिवासी संस्कृति की झलक दिखाई दे रही है, तो कहीं परंपराओं और गौरवशाली इतिहास का गुणगान हो रहा है। लेकिन इसी आदिवासी समाज के बीच एक ऐसी कहानी भी है, जो उत्सव के बीच व्यवस्था के सामने एक बेहद कड़वा सवाल खड़ा करती है।

यह कहानी है सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया प्रखंड अंतर्गत बीरबांस पंचायत के चोड़ा गांव निवासी अंतरराष्ट्रीय एथलीट प्रधान हांसदा की। एक ऐसा खिलाड़ी, जिसने देश के लिए दौड़ लगाई, राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीते और विदेश की धरती पर भारत का तिरंगा ऊंचा किया। लेकिन आज वही खिलाड़ी अपने परिवार का पेट पालने के लिए खेतों में हल जोतने और मजदूरी करने को मजबूर है।

प्रधान हांसदा का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। वर्ष 2005 में हैदराबाद में आयोजित छठी नेशनल माउंटेन बाइक चैंपियनशिप में उन्होंने हिस्सा लिया। वर्ष 2006 में कुरुक्षेत्र में आयोजित 56वीं नेशनल रोड साइक्लिंग चैंपियनशिप में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

उम्र बढ़ी, लेकिन खेल के प्रति जुनून कम नहीं हुआ। वर्ष 2024 में हैदराबाद में आयोजित 57वीं नेशनल मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने 800 मीटर दौड़ में रजत पदक हासिल किया। इसके कुछ ही समय बाद मलेशिया के कुआलालंपुर में आयोजित 36वीं मलेशियाई इंटरनेशनल ओपन मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 800 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतकर भारत का नाम रोशन किया।

लेकिन सवाल यह है कि जिस खिलाड़ी ने विदेश की धरती पर देश का तिरंगा थामकर सम्मान दिलाया, उसके अपने घर में सम्मानजनक जिंदगी का सहारा क्यों नहीं है?

आज प्रधान के पास न कोई स्थायी नौकरी है और न ही नियमित आय का साधन। परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्हें गांव के खेतों में हल चलाना पड़ता है। कभी मजदूरी करते हैं तो कभी खेती का काम। पदकों की चमक से सजे उनके हाथ आज मिट्टी से सने दिखाई देते हैं।

प्रधान चार भाइयों में सबसे छोटे हैं। करीब 22 वर्ष पहले पिता का निधन हो गया। वह आज भी अविवाहित हैं और अपनी बुजुर्ग मां तथा बड़ी बहन के साथ रहते हैं। मां पिछले कई वर्षों से बिस्तर पर हैं और बड़ी बहन भी उम्रदराज हो चुकी हैं। दोनों की देखभाल की जिम्मेदारी प्रधान के कंधों पर है। परिवार की जिम्मेदारियों और स्थायी रोजगार के अभाव में उन्होंने अपना घर बसाने के बजाय मां और बहन की सेवा को प्राथमिकता दी।

प्रधान कहते हैं कि बचपन से ही उन्हें खेल से बेहद लगाव था। परिस्थितियां कठिन थीं, संसाधन सीमित थे, लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं छोड़ी। आज भी उनके भीतर दौड़ने का जज्बा जिंदा है और उम्मीद है कि कभी सरकार और समाज उनकी प्रतिभा और संघर्ष को समझेगा।

विश्व आदिवासी दिवस पर प्रधान हांसदा की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं है। यह उस सवाल की कहानी है, जो हर उस प्रतिभा की ओर से पूछा जा रहा है, जो गांव की मिट्टी से निकलकर देश का नाम रोशन करती है—जब खिलाड़ी देश के लिए पदक जीत सकता है, तो क्या देश उसके कठिन समय में उसके साथ खड़ा नहीं हो सकता?
आज जरूरत सिर्फ आदिवासी संस्कृति और परंपरा का उत्सव मनाने की नहीं, बल्कि उस समाज की प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें सम्मानजनक जीवन देने की भी है। प्रधान हांसदा के पदक आज भी उनकी उपलब्धियों की गवाही दे रहे हैं, लेकिन उनके खेतों में चलता हल यह सवाल पूछ रहा है—देश के लिए दौड़ने वाले इस खिलाड़ी के लिए अब सरकार कब दौड़ेगी?

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