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घाटशिला : रातों में कितनी सुरक्षित हैं स्वर्ण रेखा नदी पर बना घाटशिला -आमाइनगर का पुलिया ???

© स्वर्ण रेखा नदी पर बना घाटशिला – आमाइनगर ब्रीज रातों में इतनी डरावना क्यों हो जाती है ?

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दीपक नाग …✍️

रात में मुख्यतः दो कारणों से रास्ते के किनारे लैंप पोस्ट लगाया जाता है । पहला लोगों की जान-माल की सुरक्षा के लिए और दूसरी वजह राहगीरों को आसानी से मंजिल तक पहुंचने में मदद मिल सकें। यूं कहिए तो कोई राहगीर राह न भटक जाए । इन बातों को ध्यान में रखना और जरुरतों को पुरा करने की जिम्मेदारी जितनी स्थानीय प्रशासन की है उतनी ही जिम्मेदारी स्थानीय जन प्रतिनिधियों का भी है कहे तो गलत नहीं होगा। ऐसा मैं इस लिए कह रहा हूं नगर प्रशासन के संज्ञान लेने से जहां विकास योजना का फंड उपलब्ध हो सकता है वहीं विधायक हो या सांसदों को ऐसे विकास कार्यों के लिए प्रत्येक वर्ष एक बड़ा फंड सरकार दिया जाता है।

अब आते हैं उस मुख्य विषय पर जिसके लिए यह समाचार लिखे रहा हूं।

घाटशिला और मुसाबनी दो प्रखंडों को जोड़ने और आम लोगों के यातायात की दूरी कम करने के लिए स्वर्ण रेखा नदी के ऊपर घाटशिला – आमाइनगर के मुहाने मे एक विशाल ब्रीज कुछ सालों पहले बनाया गया। इस पुल के बनने से घाटशिला और मुसाबनी प्रखंड के दर्जनों गांव-मोहल्ले वालों के लिए यातायात का बेहतरीन सुविधा मिलि।

दिन में तो ठीक है पर सूर्यास्त होते ही जैसे-जैसे अंधेरा बढ़ने लगता है दोनों प्रखंडों को जोड़ने वाला यह संगम स्थल, भयावह स्थल में तब्दील हो जाती है। चारों तरफ अंधेरा, झिंगुर की आवाज के साथ-साथ कभी-कभी जुगनू की चमक देखी जाती है। आम लोग विवश हैं देर रातों में भी जोखिम भरा इस राह से गुजरने के लिए।

खबरों के अनुसार लगभग दो साल पहले स्थानीय लोगों के कोशिश से एक फ्लड लाइट इस संगम स्थल मे लग पाया था। फ्लड लाइट के प्रकाश से दुर तक रास्ता साफ नजर आता था। आम राहगीर भी खुद को सुरक्षित महसूस करने लगे थें। पर समय के अंतराल में यह एक मात्र फ्लड लाइट निस्तेज हो कर समाप्त हो गया। फिर से सड़क जोखिम भरा हो गया। जिम्मेदार तंत्रों की एक छोटी सी चुक बड़ा हादसे को अंजाम दे सकता है। अगर ऐसी कोई घटना घट जाती है तो, पुलिस प्रशासन के माथे का दर्द बन जाता है।संक्षेप में कहें तो गलती किसकी और परेशानी बड़ी किसकी। लोग और नेतागण पुलिस प्रशासन के कांधे मढ़ते हैं ।

बता दूं कि, पुलिया के संगम स्थल पर एक छोटा सा होटल है, जो राहगीरों के लिए सुरक्षा कवच समान है। जिस कारण होटल में जलने वाली बल्ब से शाम के वक्त थोड़ी-बहुत प्रकाश राह में बनी रहती है। पर अपने निश्चित समय के बाद यह होटल बंद हो जाता है । फिर क्या मंजर असुरक्षा और भय के आगोश में समा जाता है।

बहरहाल, इन परिस्थितियों के लिए किसे जिम्मेदार ठहराएं ? स्थानीय नगर प्रशासन, जनप्रतिनिधिगण या तो फिर जनता ? यह एक यक्ष्य प्रश्न है।

तय तो पाठकों को करना है कि, जिम्मेदारी किसकी है? हम तो कलम के सिपाही है, जहां ऐसा कुछ दिखता है तो जनमानस के पटल पर लाने की केवल मात्र कोशिश कर सकते हैं।