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घाटशिला : भाजपा को लगा झटका, पूर्व जिलाध्यक्ष सौरभ चक्रवर्ती ने ऐन मौके पर कहा अलविदा…

✒️… दीपक नाग 

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घाटशिला विधानसभा उपचुनाव का घोषणा होने के दौरान मैंने इस विधानसभा के उपचुनाव पर एक राजनीतिक विश्लेषण लिख चुका था कि, “छोटी-छोटी गलती चुनाव रुपी टाइटेनिक जहाज को बीच महासागर में धोखा दे सकता है। जिसे नज़र अंदाज़ करने का अर्थ, चुनावी टाइटेनिक को जल समाधि समान हो सकता है? 

भाजपा के चुनाव रुपी टाइटेनिक का आज जैसे ही एक वर्फीले चट्टान रुपी अपने ही सेनापति “सौरभ चक्रवर्ती” से सामना हो गया। सौरभ चक्रवर्ती भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। सौरभ ने आज रांची में प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हाथों सम्मानित होकर झामुमो का दामन थामे और भाजपा को अलविदा कहा । कुल मिलाकर विरासत में राजनीति नहीं मिला उसे। ग्रास रूट से जन्म लिया है । 

भले है सोशल मीडिया और समाचारों के माध्यम से सौरभ चक्रवर्ती के लिए अनेक कटाच्छ पार्टी स्तर से होने लगा है। जो प्रमाण करता है कि, सौरभ को खोना उन्हें महंगा पड़ा है। जबकि, एक-दो और भी भाजपा के कार्यकर्ता मुख्यमंत्री के माध्यम से झामुमो का दामन थामा, उनके लिए वैसे व्यथा दिल में लिए कुछ कहा नहीं गया। शायद एक “लीडर” को पार्टी ने को दिया ?

सौरभ का झामुमो तक पहुंचने तक का ?

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, झामुमो का केन्द्रीय कमिटी के एक पुराने और प्रभावशाली व्यक्ति के माध्यम से सौरभ को झामुमो में शामिल करवाया गया है। ख़बरों के अनुसार, वह प्रभावशाली व्यक्ति सौरभ के काफी करीब है। यह नजदीक राजनीति के कारणों से नहीं परिवारिक रहा है। दोनों के बीच बढ़े और छोटे भाई जैसी व्यवहार है।

सौरभ के राजनीतिक जीवन –

एक साधारण परिवार से संबंधित है सौरभ। मृदु भाषी और प्रखर वक्ता। 1990 के दशक में आजसू का दामन थामे। उस दौरान सुदेश कुमार महतो पर निर्माण मंत्री थें। इसके बाद राज्य के गृह मंत्रालय सम्हाल रहे थे। जाहिर है झारखंड में तब आजसू काफी अच्छी स्थिति में थी। घाटशिला विधानसभा में आजसू का नेतृत्व कान्हू सामंत (अभी झामुमो में है) करता था। कान्हू के नेतृत्व में सौरभ पार्टी का काम किया करता था। आगे चलकर, सौरभ ने भाजपा का दामन थामे हुए थे। देखा जाए तो, घाटशिला विधानसभा क्षेत्र में झामुमो के पास मिडिया को संबोधित करने वाले वक्ताओं की, एक-दो को छोड़कर कमी है। सौरभ मिडिया के प्रखर सवालों का बखूबी जवाब देने की काबिलियत है। झामुमो के लिए सौरभ चक्रवर्ती एक प्रखर वक्ता के रुप में उपलब्धि हो सकता है।

क्या वजह है कि, अचानक भाजपा को सौरभ अलविदा कहा ? 

मैंने पहले ही अपने एक राजनीतिक विश्लेषण मे लिख चुका हुं भाजपा में लीडर अधिक और कैडरों कम है। कहावत है न, ज्यादा योगी मठ उजाड़े। सौरभ जब भाजपा का जिला अध्यक्ष बनाया गया तो अनेक ख्वाहिश मंद भाजपाई नाराज हुए । इस ताज को पहनने के लिए वे सारे भी बैचेन थें। सौरभ नू बताया, पार्टी स्तर से नीचा दिखाने का अनेक बार कोशिश किया गया। सौरभ ने कहा पार्टी से उस समय मुझे जिम्मेदारी सौंपा गया जब भाजपा का बुरी तरह झारखंड में हार हुई थी। मैंने, उन विषम परिस्थितियों में पार्टी को संभाले रखा। 

जाहिर है, न जाने और कितने सौरभ जैसे पार्टी में कार्यकर्ता होंगे जिन्हें पार्टी के अंदर सम्मान नहीं दिया जा रहा होगा ?

क्या चुनावी टाइटेनिक मे और भी जयचंद मौजूद हो सकता हैं ?

सवाल यह है कि, इस चुनावी महासमर में वैसे लोग जो लाबिंग गेम खेलते रहे हैं, क्या चुनावी महासमर में छुपे वर्फीले चट्टान की तरह घात तो लगाकर नहीं बैठा है ? यह तो 14 नवंबर के दिन ही पता चल सकेगा कि, जो पार्टी को छोड़कर गया वह जाया घातक था या चुनावी टाइटेनिक मे सवार भितराघात करने वाले हैं ज्यादा जहरिले?

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