
गुड़ाबंदा (डुमुरिया) : दसांई नाच संथाल आदिवासियों के संघर्ष से जुड़ी हुई है…
दीपक नाग… ✍️

दसांई नृत्य संथाली आदिवासी समाज का एक प्राचीन और सामाजिक परंपरा से जुड़े नाच है । खास करके दूर्गापूजा के नवमी के दिन यह नाच को सामाजिक पद्धतियों के साथ आरंभ की जाती है।
झारखंड के अनेक गांवों में दुर्गापूजा के दौरान पूजा पंडालों में प्नृरस्तुत करते देखा जा सकता है । इस नृत्य में शामिल नगाड़ा, मांदर और तीर-धनुष नुमा एक यंत्र लेकर प्रस्तुत किया जाता है।

आज के दिन पूर्वी सिंहभूम जिले के गुड़ाबंदा प्रखंड की सिंहपुरा पंचायत के तारासपुर गांव में भी पूजा-पाठ के साथ दासांई नाच का आरंभ किया गया ।
भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष लखन मार्डी ने इस नृत्य परंपरा पर जानकारी देते हुए कहा कि, दासांई नाच हमारी परंपरा का अभिन्न अंग है। पूर्वजों के बातों का हवाला देते हुए कहा कि, दासांई नाच का आरंभ संथाल आदिवासी समाज के संघर्ष से जुड़ी हुई है।
लखण मार्डी ने बताया, संथाल समाज की दो बहनों को एक विशेष समाज द्वारा अगवा किए जाने के बाद, उन्हें खोजने के लिए संथाल समाज के नौजवानों ने पारंपरिक हथियारों से लैस होकर अपनी बहनों के तलाश में निकलें थें।ये नौजवान युद्ध कला सीखते हुए तथा नाचते-गाते हुए देश दुनिया में घूमे थें । तभी से यह परंपरा शुरू हुई और आज भी जारी है और यह परंपरागत दसांई भविष्य में भी चलती रहेगी।
उन्होंने बताया, यह परंपरा संथालों के देवी-देवताओं से जुड़ी हुई है। संथाली में इसे दासांई बोंगा कहा जाता है। बंगाल के आश्विन माह में दासांई नाच तीन, पांच या सात दिन तक नाचा जाता है।
इस अवसर पर बलराम मांडी, विक्रम मांडी, सूराई मांडी, घानी राम मांडी, पीतांबर मांडी, सावना मांडी, छाकु सोरेन, सुपाई मांडी, संजय मांडी, अजय मांडी, साहेब सोरेन, राजेश मांडी, अजीत मंडी, शंकर मंडी, विकास टुडू, सुनील टुडू सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे।
