रांची : मौसम आ गया है अभिभावक जुटेंगे और प्राइवेट विद्यालय मजबूत होंगे।
• प्राइवेट स्कूल क्यों हर साल मोटा रकम लेता है? • किसकी है जिम्मेदारी ? कौन करेगा नियंत्रण ?
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दीपक नाग …✍️
हम जब अपने पुराने विद्यालयों को देखते है, तो दिलों से एक आवाज निकलता है, न जाने हम में से कितनों की ज़िन्दगी का महल तुमने बना डाला और खुद खंडहर हो गया ! आज भी हम नतमस्तक करतें हैं उस खंडहर नुमा ज्ञान मंदिर के सामने। पर आज के अभिभावकों के दिलों से कुछ और ही आवाज निकलती है । सोचते हैं, अपने बच्चों के भविष्य बनाने आए थे और हम खंडहर तो तुम आलिशान महल हो गये ! क्योंकि, प्रत्येक वर्ष अपने ही बच्चे को ऊपर के क्लास में दाखिला के नाम पर साधारणत: से प्राईवेट स्कूल वाले अभिभावकों से घुमा फिराकर रि-एडमिशन समान रकम वसूल कर ही लेताहै।
अप्रेल माह कुछ दिनों बाद आने वाला है, अभिभावकों के माथा में एक ही बात चल रहा है, विद्यालय में बच्चों को भर्ती कराना है, स्कूल से किताब- कापी, युनिफोर्म, आई कार्ड, टाई, वगैरह-वगैरह ऊंचे-ऊंचे किस्मतों से खरीदनी होगी । निजी विद्यालय वाले होंगे माला – माल और अभिभावक होंगे कंगाल !सवाल यह उठता है कि, आखिर ऐसी स्थिति क्यों आज तक होता रहा है । दुसरे राज्यों का तो नहीं कह सकते हैं पर झारखंड राज्य मे एक ट्रेंड चला आ रहा है । बच्चें जब परिक्षा में पास होकर ऊपर के वर्गों मे दाखिल होते हैं, वह क्षण उन अभिभावकों के लिए कठिन क्षण होता है। बच्चों को अपने ही स्कूल में दुबारा दाखिला लेने के समय विभिन्न मदों के नाम से हजारों रुपए वसूल किया जाता है । इसके विरोध में रघुवर सरकार के कार्यकाल से लेकर हेमंत सोरेन के कार्यकाल तक अभिभावक आवाज उठाते रहें। कुछ सालों पहले जमशेदपुर के अभिभावक संगठन ने सरकारी दफ्तरों से लेकर शिक्षा मंत्री के द्वार तक गणेश परिक्रमा लगा चुके हैं, पर परिणाम वहीं हुआ जैसे प्राइवेट विद्यालय चाहते थें । अब प्रोन्नति विद्यार्थियों के मनि रिसिप्ट में ‘रि -एडमिशन’ नहीं लिखकर अन्य उपनामों का इस्तेमाल किया जाता है और मोटे पैसे वसूल किया जाता है । सरकार ने अभी तक कोई स्पष्ट न तो नीति बनाई है और न ही सार्वजनिक रूप से कोई नोटिफिकेशन निकाली है । प्रश्न उठाना लाजिमी है कि, विपक्ष के राजनीतिक दल भी क्यों है अब तक चुप ?
सवाल यह है कि, पुरे देश में शिक्षा जगत व्यापारी करण के आगोश में समाया हुआ है। झारखंड जैसे एक अविकसित राज्य में क्या इस पर नकेल चढ़ाने के काबिल कोई नहीं है ? सरकारी विद्यालयों की शैक्षणिक हाल किसी से छुपा नहीं है । संतोष जनक होता तो, जन प्रतिनिधि, मंत्री – संत्री के बच्चे निजी स्कूलों का रूख न किये होते ?
बहरहाल,जब तक जिम्मेदार तंत्र इस गोरखधंधे के खेल पर नकेल चढ़ाने में व्यर्थ साबित होता रहेंगे तब तक जनता के विचाराधीन अदालत के कटघरे से इन्हें मुक्ति नहीं मिल सकती है ऐसा लगता नहीं है। सभ्य समाज के लिए आज भी यह एक यक्ष प्रश्न बना हुआ है ।