
घाटशिला विधानसभा उप-चुनाव, सामना कर सकेंगे जन अदालत का?
दीपक नाग… ✍️

घाटशिला विधानसभा का कुछ महिनों बाद उप-चुनाव होना तय है । क्षेत्र में चुनावी कुरुक्षेत्र का तपीस धीरे -धीरे बढ़ती जा रही है । राजनीतिक दलों के नेताओं का क्षेत्र में गणेश परिक्रमा आरंभ हो चुका है । आधिकरिक रुप से अभी तक किसी भी राजनीतिक पार्टी ने अपने पार्टी प्रत्याशी का नाम घोषित नहीं की है । फिर भी पार्टी टिकट मिलने की आशा मे अनेक अघोषित उम्मीदवार अपने राजनीतिक जमीन को उपजाऊ बनाने मे जुटे हैं।
चुंकि, हमारे देश में नेता और जन प्रतिनिधि बनने के योग्यता की कोई सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होती है, इसलिए हर कोई “राज-भोग” का ख्वाइश रख सकता है। यह और बात है कि, किसी को पारिवारिक विरासत में इसका लाभ मिलता रहा है तो, किसी को बालु मे से तेल निकाल कर खुद को खड़ा करना पड़ता है। पर “चुनावी कुरुक्षेत्र” में जीत हासिल करने के लिए इतनी योग्यता काफी नहीं होती है। अनुभव, जन-मत का विचार, कटु सत्य को हजम करना, ध्यर्य, शालिनता और दूरदर्शीता होना अहम् बात होती है। हां, अत्याधिक आत्म विश्वास अक्सर हरा का कारण बनता रहा है ।
चलिए हम रूख़ करते हैं कुछ ऐसी बातों पर जिसे जनमानस वर्षों से झेलता आ रहा है। वानांचल की कोशिश होगी कि आपके सामने सटिक प्रस्तुत कर सकूं। विकास कार्य, बेरोजगारी, भ्रष्टाचारी, पक्ष-विपक्ष दलों की भुमिका वगैरह शामिल हैं। जानने के लिए यात्रा किजिए हमारे साथ।
(१) किसी भी सरकार ने स्थाई रोजगार के लिए कोई परिकल्पना नहीं ला सका 25 वर्षों में ?

विगत तीन वर्षों से भी अधिक समय से भारत सरकार का उपक्रम HCL/ICC मौभंडार नुकसान बतलाकर उत्पादन कार्य बंद कर रखा है। इतनी बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर इन दिनों एक “वेयर हाउस” का रोल निभा रहा है ।
किसी समय यहां आयरन ओर (चारको पाइराईड) HCL/ICC मुसाबनी ग्रुप आफ माइंस के छह खदानों से आया करता था यहां। 1996 में HCL/ICC मुसाबनी ग्रुप आफ माइंस को ग्रहण लगना आरंभ हुआ और वर्ष 2000 तक पूर्ण ग्रहण लगने से एक के बाद छह खदाने बंद कर दिया । जाहिर है HCL/ICC मुसाबनी बंद होने से, HCL/ICC मौभंडार को जीवित रखने के आहार बंद हो गया। वर्ष 1996 से लेकर वर्ष 2000 तक मुसाबनी में स्थाई लगभग 7000 कामगार बेरोजगार हो गया । जब मदर आर्गनाइजेशन ही नहीं रहा तो उस पर निर्भर करने वाले संस्थान HCL/ICC मौभंडार कितने दिनों तक चल सकता था ? यहां पर भी स्थाई रूप से काम करने वाले लगभग 2000 कर्मचारीयों का भविष्य अंधकारमय हो गया । कुल मिलाकर रोजगार के नाम पर बेरोजगारी का सिलसिला आरंभ हो गया ।
पिछले 25 वर्षों में झारखंड राज्य राज्य में सत्ता परिवर्तन होता रहा व्यवस्था नहीं । किसी भी सरकार के ज़ेहन मे कभी नही आया कि, नये खदान, इंडस्ट्रीज खोला जाए ? बेरोजगारी से राज्य को बचाया जाए। अन्यथा इतनी लड़ाइयां लड़कर अलग राज्य लेने का क्या अर्थ हुआ ?
(२) मुंह चिढ़ाता विकास कार्य –

कुछ महिनों पहले घाटशिला के फुलडुंगरि मोड़ से लेकर गोपालपुर फाटक तक सड़क मे काली करन का काम किया गया, अभी से ही जगह-जगह दांत दिखाने लगा कर है।
(३) पक्ष और विपक्ष की भुमिका शुन्य समान :-

कुछ विकास कार्य ऐसे भी हैं वह अपने निर्धारित समय सीमा खत्म वर्षों पहले हो चुका है पर आज तक कार्य आधा-अधुरा है ।
वर्ष 23 जनवरी 2018 को मुसाबनी माइंस कालेज के सामने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नाम से “सुभाष चन्द्र बोस पार्क” बनना था । शिलान्यास हुआ, कार्य भी आरंभ हुआ पर आज तक निर्माण कार्य अधुरा पड़ा हुआ है। बताया जाता है लगभग 15 लाख रुपए का योजना राशी गवन हो गया । सोचिए, सुभाष चन्द्र बोस जिन्हें पुरा विश्व नेताजी का उपाधि दे रखा है उनके सम्मान रक्षा अगर भ्रष्टाचार का दंश झेल रहा है तो, अन्य विकास कार्यों का क्या दशा और दिशा रहा होगा । यह जांच का विषय है । मुसाबनी के साहित्य संस्कृति मंच के एक सदस्य बिरेन घोष ने इस आधा-अधूरा कार्य के खिलाफ अनेक बार आवाज उठाने का प्रयास किया पर उनके आवाज को कुचला दिया गया ।
योजना स्थल पर विवरण पट का न होना एक बड़ी शाजिस की ओर इशारा कर रहा है। पारदर्शिता को छुपाए जाने का कारण क्या है ? पक्ष और विपक्षी राजनीतिक दल के नेता खामोश क्यों है?
(४) कुड़मी समुदाय के लोगों को कैसे मनाएंगे ?

सवाल यह है कि, झारखंड सरकार इस पर अपना राय क्या देंगे ? कुड़मी जाती के लोगों को केवल मूल-भाषी का संज्ञा दे देने से वे लोग संतुष्ट नहीं हैं। इधर संथाली आदिवासी के सुची में शामिल करना सरकार के लिए इतना आसान नहीं है। कुड़मी को ना कहना राजनीतिक क्षति हो सकता है तो हां कहने पर सामाजिक क्षति का भय सता रहा है । इस क्षेत्र में कुड़ी मतदाताओं का अहम भुमिका होती है । ऐसे में इसे छोड़ना भी आसन नहीं होगा ।
जाहिर है, प्रत्याशियों को सभी सवालों के अग्नि पथ से गुजरना पड़ सकता है तो, उस राजनीतिक पार्टीयां भी इसके तपीस से अछूता नहीं रह सकता है। क्यों कि, राजनीतिक कुरुक्षेत्र का रथ कल्पना से नहीं जनता के भरोसे को जीत कर उड़ा जाता है ।
