Advertisements
Spread the love

घाटशिला : कुड़मी आंदोलन क्या डुबो सकती है किसी की चुनाव रुपी टाइटेनिक जहाज ?

दीपक नाग… ✍️

Advertisements

चुनाव की तारीख ऐलान होते ही भारतीय जनता पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा के अघोषित प्रत्याशी अपने-अपने तरीकों से क्षेत्र में गणेश परिक्रमा आरंभ कर चुके हैं। विशेष कर भाजपा और झामुमो के अघोषित प्रत्याशी कमर कसकर इस दंगल खुद चुके हैं। किसी चुनावी दंगल में प्रत्याशी की मुलाकात साधारणतः दो स्वभाव के लोगों से होती है। पहला प्रबृत्ति वाले व्यक्ति, नेताजी को तत्कालीन सुख देने के लिए “आप ही जीतेंगे” कह कर खुश करने की कोशिश करते हैं तो दुसरा प्रबृत्ति वाले व्यक्ति, कटु सत्य कहते हैं कि, नेताजी कहां चुक रहे है। सारी बातें अब नेताजी पर निर्भर करता है कि, वह अल्पकालीन सुख प्राप्ति से संतुष्ट होते हैं या दीर्घ कालीन आनंद का अनुभूति लेना चाहते हैं। यह भी सत्य है कि, बीमारी ठीक करने के लिए सक्कर की नहीं कड़वी गोली की जरूरत होती है। नेताजी को अब जो भाए। चुनावी दंगल में जीत का सेहरा या हार का अनुभूति स्वीकार करना पसंद करेंगे? सारथी ठीक न हो तो महान योद्धा को भी हार का सामना करना होता है। योद्धा रणभूमि में उलझे रहते हैं, पर सारथी के आंखें खुली और चौकन्ना रहते हैं कि, योद्धा को क्षति न हो सके । सारथी युद्धभूमि में दशा के अनुसार दिशा निर्धारित करते रहते हैं। इसके बगैर कर्ण जैसे महान योद्धा भी धरासाय हो गये थे। यह तो रहा युद्ध नीतियां। इस बार के चुनाव में एक अलग चुनौती भाजपा और झामुमो को करना पड़ सकता है।

खबरों के अनुसार, आगामी होने वाली चुनाव में कुड़मी बाहुल्य कुछ गांव भाजपा और झामुमो नाराज हैं और इन्हे समर्थन नहीं करने का मन बनाए हुए हैं। 

बता दें कि, पूर्वी सिंहभूम जिले में कुड़मी मतदाताओं की हमेशा अहम भूमिका रही है । जमशेदपुर लोक सभा का चुनावों में एक बार नज़र डालें तो, जमशेदपुर जिला में शैलेंद्र महतो से लेकर अभी तक के सांसद विद्युत वरण महतो कुड़मी समुदाय का ही है। हां, इस बीच एक बार भाजपा के प्रत्याशी नितिश भारद्वाज ने शैलेंद्र महतो को हराया था, जो कुड़मी समुदाय के नहीं थे। इससे साफ स्पष्ट है कि, कुड़मी समुदाय चुनावों में अपना एक अलग पहचान रखते आए हैं।

कुड़मी समुदाय का एक नेता ने बताया कि, सरकार ने कुड़मी को सीएनटी में शामिल कर रखा है पर एसटी सुची में शामिल करने से परहेज़ कर रहे है! कहने का तात्पर्य है कि, गुड़ खा सकतें हैं पर गुलगुले से परहेज़।

पिछले कुछ समय से कुड़मी समाज और कुछ संथाली आदिवासी समुदाय के बीच वाद-विवाद खुल कर आरंभ हो चुका है। शोसल मीडिया में भी इसका असर देखा जा रहा है। क्या आदिवासी और मूलवासी कहलाने वाले दोनों समाजों के बीच दरारें बड़ रही है? चुंकि झारखंड राज्य में झामुमो का बड़ा वोट बैंक आदिवासी और मूलवासी मतदाता के रुप में हैं। ऐसे में जिस झामुमो के निर्माण और आंदोलन में कुड़मी समाज के लोगों का अहम् भुमिका रहा है, आज झामुमो से विमुख क्यों होने लगें हैं?

गौर करने वाली बात यह है कि, 2024 के विधानसभा के चुनाव में कुड़मी वोट लगभग तीन हिस्सों में बंटा था। भाजपा, झामुमो और जेकेएलएम। चुंकि जेकेएलएम महतो पृष्ठ भूमि से संबंधित राजनीतिक पार्टी है। इधर घाटशिला विधानसभा चुनाव में कुल कुड़माली वोट बैंक लगभग 27000+ है । जिसमे से जेकेएलएम के खाते 8000+ मत आया था। जाहिर है कि बाकी के बचे वोट अधिकांश भाजपा और झामुमो के खाते में गया होगा।
गौरतलब है, कि कुड़माली आंदोलन अपने सामाजिक बैनर तले चलाया जा रहा है। इस आंदोलन को कुड़मी विभिन्न राजनीतिक पार्टीयों के कुड़ी नेता बाहर से समर्थन कर रहे हैं। पर इनमे ऐसा कोई भी नेता नहीं है जो पुरे कुड़माली समाज का अकेले नेता बता सकते हैं । दुसरी बात,भले ही कुड़मी मतदाताओं की संख्या अपने बलबूते जेकेएलएम के प्रत्याशी को घाटशिला विधानसभा उपचुनाव से जीत नहीं दिला सकती है, पर अन्य किसी भी राजनीतिक पार्टी के चुनावी टाइटेनिक को डुबो ने की क्षमता तो जरुर रखती हैं। कुल मिलाकर इस क्षेत्र में कुड़मी मतदाताओं को ट्रमंप कार्ड यानी तुरुप का एक्का कह सकते है । देखा जाए तो राजनीतिक पार्टीयां डाल-डाल है तो कुड़मी आंदोलन पात-पात चलता नजर आ रहा है 
सवाल उठता है कि, भाजपा और झामुमो के प्रति जब इनकी नाराजगी है तो, इन्हें अपने पक्ष में करना इतना आसान नहीं लगता है। वैसे, झारखंड राज्य के कुछ राजनीतिक पार्टी के कुड़मी नेता एक मंच पर आकर कुड़मी समाज के लंबी चल रही लड़ाई को समर्थन दे रहें हैं। बहरहाल, कुछ ही सप्ताह बाद घाटशिला विधानसभा का उपचुनाव होना है। कुड़मी मतदाता किसका चुनावी टाइटेनिक डुबो ने की तैयारी में है यह भविष्य के गर्भ में है।