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घाटशिला : शुन्य से सुरु हुए थें, आज भी उसी शुन्य में खड़े है हम ?

दीपक नाग... ✍️

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सामाजिक योजनाओं का अर्थ आखिर क्या होता है ? योजनाएं सुगम तरीके से नियमित और निर्विघ्न रुप से चलता रहे यही उद्देश्य होता है। और योजनाओं को धरातल में लाकर ठीक तरह से रुपांतरित न कर सका तो सरकार के लिए यह सम्मान जनक नहीं हो सकता है।

ऐसा ही कुछ दृश्य झारखंड राज्य के घाटशिला प्रखंड के घाटशिला पंचायत अंतर्गत चालकडिह में देखा जा सकता है। जानने के लिए यात्रा किजिए हमारे साथ।

चालकडिह मूलतः अनुसूचित जाति का एक टोला है सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक दृष्टिकोण से काफी कमजोर है यहां रहने वाले लोग। इन लोगों का रोजी-रोटी देहाड़ि मजदूरी या तो फिर ठेला – रिक्शा चलाकर पुरा करतें हैं। सरकारी कुछ सुविधाएं चालकडिह में दिया गया है। चलिए बारी-बारी से देखते हैं कि, यह सुविधाएं धरातल में जीवित है या दम तोड़ चुका है?

सोलर जल मिनार :-

 पेयजल के लिए एक सोलर सिस्टम का जल मिनार लगाया गया था । संबंधित विभाग और ठीकेदारी संगोष्ठी का कार्यशैली कितना सटीक रहा होगा कि, सोलर जल मिनार धराशाई हो गया है और व्यवस्था तंत्रों को इसकी जानकारी ही नहीं। जानकारी लिया होता तो निश्चित रुप से यह सोलर जल मिनार लोगों को सेवा प्रदान किया होता।

सोलर जल मिनार धराशाई गृष्म ऋतु आरंभ होने ही वाला है, जल संकट इस बस्ती में हाहाकार मचा सकता है। महिलाओं को अपने घरेलू दैनिक कर्मों को पुरा करने के लिए सड़कों के किनारे लगा चापा नल का सहारा लेना पड़ता है। यह बेबसी क्या संबंधित सरकारी तंत्र, जनप्रतिनिधि, पंचायत चुनाव में जीतने वाले प्रतिनिधियों के आंखों में नहीं खटकता । या चुनाव खत्म होते ही हिन्दी फिल्म के इस गीत “मतलब निकल गया तो अब पहचानते नहीं” को सार्थक कर रहा है। 

आबुआ आवास:-

हर सर को छत का स्लोगन का स्वरूप आखिर धरातल में कितना सच है ? एक बार धरातल में इसकी स्थिति को जानने का प्रयास करते है। जैसे कि, आबूआ आवास योजना के तहत वैसे परिवारों को पक्के की मकान निर्माण के लिए निर्धारित एक रकम टुकड़ों में दिया जाता है। बसर्ते कि, आवेदन के लिए उन्हें योग्य होने की जरूरत है। सवाल उठता है कि, बाबजूद सारे कायदे कानूनों के आबूआ आवास आवंटन में कभी-कभार कोई विसंगति हो जाती है कि नहीं ? बताया जाता है कि, कहीं-कहीं बिचौलिय अपना गेम सेट करने के फिराक मे रहता है। ऐसे बिचौलिया न तो सरकारी तंत्रों का सदस्य होते हैं और न किसी सामाजिक संगठन का सदस्य होते है। शहरी क्षेत्रों से ज्यादा गांव देहातों में बिचौलिया एक्टिव रहते हैं।‌ जिन उपभोक्ताओं का आबूआ आवास का लाभ उठाने का हक नहीं होता है, बिचौलिया से सौदा तय हो गया तो वैसे परिवार वाले को भी आबूआ आवास का लाभ मिल जाता है। ऐसी हालात में एक जायज हकदार का अधिकार काट कर अवैध तरीके से दुसरो को लाभ दे दिया जाता है। चालकडिह के रहने वाले मिथुन का माने तो उसे अभी तक आबुआ आवास का लाभ नहीं मिला सका। बिचौलिया आया था उसके पास पर सौदा बन ना सका। 

मिथुन – नसीब न हुआ आबूआ आवास 

आंबुआ आवास का दुसरा पक्ष भी है, घाटशिला के फावड़ा पंचायत अंतर्गत एक विधवा का आबूआ आवास निर्माण कार्य लगभग आठ महा पहले आरंभ किया गया था, पर आधा अधुरा निर्माण कार्य पर ही काम रोकना पड़ा। पुछने पर बताने लगी कि, आगे का निर्माण कार्य का पैसा सरकार के द्वारा नहीं दिया गया है। अब उनके पास न तो सर छुपाने के लिए अपना कोई घर है और न ही छत है। मोहल्ला में ही एक मकान में लगभग आठ महीने पहले से रहती है। अब इस मकान का अगर उसे किराया देना पड़ता कि नहीं यह मकान मालिक और उस विधवा की बीच की बात है।

स्वप्नों का महल खड़ा न हो सका !

बहरहाल, सरकारी योजनाओं के लिए बजट सत्र में लाखों – करोड़ों रुपया पास होता है और उसी अनुपात में कार्यों का खाका बनता है। ऐसे मे योजनाओं का रेगुलर मेंटेंनेंस का पैसा, आबूआ आवास का पैसों का क्या होता है ? कहां जाता है ? इन सब चीजों के लिए जिम्मेदार आखिर कौन है ? किसकी है जवाबदारी ?

ऐसे में क्या कहा जा सकता है छब्बीस साल पहले जहां शुन्य से सुरु हुए थें, आज भी उसी शुन्य में खड़े है हम ?

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