
घाटशिला : घाटशिला विधानसभा उपचुनाव मे लक्ष्य भेद कौन कर पाएगा ?
दीपक नाग … ✍️

घाटशिला विधानसभा उपचुनाव का चुनावी दंगल चरम स्थिति में है। 9 नवंबर के संध्या काल के बाद चुनावी कुरुक्षेत्र के सारे योद्धा अपने-अपने सिपाही सालार को लेकर शिविर में वापस लौट जाएंगे। फिर काम रह जाएगा, इतने दिनों में जो समर्थन कमाया है वह खो न दें ! इन समर्थकों को समेटे रखना बड़ी ज़िम्मेदारी है। क्योंकि, मतदाताओं की सोच पल भर में बदल सकती है।


इधर, घाटशिला विधानसभा के पूर्व विधायक सह मंत्री दिवंगत रामदास सोरेन के पुत्र सोमेश चंद्र सोरेन काफी दिनों तक अकेले चुनावी मोर्चा संभाले हुए थे। चुनावी कुरुक्षेत्र में एक तरफ जहां इतने सारे महानुभावों के राजनीति के महार थे, वहीं चुनाव का पहला अनुभव को लेकर सोमेश अकेला ही मोर्चा संभाले रखा, संगठन को कस से मस होने न दिया। प्रवक्ता कुणाल षाड़ंगी सुरु से ही सोमेश के साथ चुनावी कुरुक्षेत्र में एक सारथी के तरह साथ देते रहे। सोमेश चुनाव के लिए नोमिनेशन करने के कुछ दिनों बाद झामुमो के एक-एक करके अनुभवी नेता इकठ्ठे होने लगे। विधायक सह मंत्री दीपक बीरुआ, विधायक समीरा महांती, विधायक संजीव सरदार वगैरह-वगैरह सोमेश के चुनावी दंगल में शामिल होने लगे। कुछ दिनों पहले गठबंधन दलों को निभाते हुए कांग्रेस ने भी झामुमो का साथ देना आरंभ किया। अब तो खुद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विधाक श्रीमती कल्पना सोरेन ने चुनावी मंच को संभालना आरंभ कर दी है। वैसे भी राज्य का सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी झामुमो होने के कारण झामुमो के लिए जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं का अभाव महसूस नहीं करना पड़ा।

जेएलकेएम के प्रत्याशी रामदास मुर्मू के चुनावी कुरुक्षेत्र में पार्टी के वरिष्ठ नेतागण जोर शोर से चुनाव प्रचार कार्य में लगे हुए हैं। घाटशिला विधानसभा क्षेत्र में जेएलकेएम का संगठन झामुमो और भाजपा के बनस्पत कमजोर होना रामदास मुर्मू के लिए बड़ी चुनौती स्वरूप है। क्यों कि चुनाव में संसाधनों की कमी और स्थानीय अनुभवी कार्यकर्ताओं का अभाव होना प्रत्याशी के लिए चिन्ता का विषय बन ही सकता है। 4 नवंबर दोपहर के बाद जेएलकेएम सुप्रीमो जयराम कुमार महातो घाटशिला पहुंचने पर पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थकों में स्फूर्ति दौड़ना स्वाभाविक बात है। जयराम महातो रामदास को साथ लिए रफ्तार के साथ देर रात तक गांव – गांव में जनसभा को संबोधित कर रहे हैं और पार्टी प्रत्याशी रामदास मुर्मू को आशीर्वाद देने का गुहार लगा रहें हैं। जयराम महातो के नाम का इस क्षेत्र में एक क्रेज बना हुआ है। जिस कारण गांव – घरों में उन्हें देखने और सुनने के लिए भीड़ इकट्ठा हो रही है। जिसका कारण यहां पार्टी संगठन कमजोर होने के बावजूद भी भीड़ इकट्ठा होने में देर नहीं लग रही है।
अब तक भाजपा और झामुमो के बीच चुनावी वर्चस्व की लड़ाई चलता देखा जा रहा है। जयराम महातो के चुनावी दंगल में आने से चुनावी महासागर में दो की जगह तीन टाइटेनिक रुपी जहाज तैरने लगी हैं। यह और बात है कि इस चुनावी महासागर मे दो टाइटेनिक रुपी प्रत्याशियों का जहाज ज्यादा मजबुर नजर आ रहा है। पर तीसरे टाइटेनिक रुपी चुनावी जहाज भी अपना वजन बढ़ाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ा रहा हैं।
बता दूं कि, लोकसभा और विधानसभा का चुनावी परिभाषा को एक जैसा आंकलन एक जैसा नहीं होती है। क्यों कि, लोकसभा का चुनाव देश के राजनीति को समझ कर किया जाता है वहीं, विधानसभा का चुनाव एक तरह से हम अपने गांव के मुखिया के चुनाव की जैसे करते हैं। इसलिए, विभिन्न समुदाय के मतदाताओं का मत एक समान दोनों चुनावों में एक जैसा ही इसकी गारंटी नहीं है। इसका बड़ा उदाहरण दिल्ली का चुनाव को देख कर समझा जा सकता है। विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को वहां के लोग जीत दिलाती रही और वही मतदाता लोकसभा चुनाव में भाजपा को जीत दिलाते हैं। वह तो शीश महल जैसी अनेक बातें हो गई जो अरविंद केजरीवाल को सत्ताच्युत कर दिया।
बहरहाल, चुनावी मैदान में शामिल तेरह प्रत्याशी अपने स्तर से कुछ न कुछ तो मतदाताओं का दिल हर पल जीतने की कोशिश में लगे है। सेंधमारी से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। 9 नवंबर शाम से सारे प्रचार-प्रसार पर रोक लग जाएगी। इसके बाद आरंभ होगा, कमाया हुआ समर्थन को 11 नवंबर शाम तक संजोए रखना। छोटी सी चुक कहीं चुनावी महासागर में पार लगने टाइटेनिक रुपी जहाज को डग मागा न दें।
