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घाटशिला : गठबंधन की राजनीति आम चुनाव में कांग्रेस के लिए घातक है या सार्थक ?

दीपक नाग… ✍️

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संदर्भ : घाटशिला विधानसभा चुनाव

# १९९५ से लेकर २००९ के चुनाव के तक घाटशिला विधानसभा सीट कांग्रेस ने बाजी मारी।

# २००९ को कांग्रेस को झारखंड मुक्ति मोर्चा से शिकस्त खानी पड़ी ।

# २०१४ के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड मुक्ति मोर्चा से सीट छीनने में कामयाब रहा ।

# २०१८ झारखंड मुक्ति मोर्चा ने चुनाव जीत कर अपना परचम लहराया। और २०२४ के चुनाव में भी अपनी जीत को कायम रखा ।

# झामुमो के सिटिंग विधायक के आकस्मिक निधन से इस वर्ष के अंत तक घाटशिला विधानसभा का उपचुनाव होना तय है।

घाटशिला विधानसभा चुनाव गठबंधन होने से कांग्रेस क्यों बिखरता गया क्षेत्र में ? जानने के लिए यात्रा किजिए मेरे साथ – 

जनजातीय रिजर्व चुनावी सीट है घाटशिला विधानसभा। २०१९ से यह विधानसभा गठबंधन चुनावी धर्म को अपनाया और समर्थन के नाम पर समर्पण का मंत्र को ग्रहण किया । क्यों कि, २०१४ मे नरेंद्र मोदी का सरकार आने से भाजपा का लहर उफान पर था । वैसे भी २०१४ के चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा को चुनाव में शिकस्त खानी पड़ी थी । मोदी को रोकना विपक्ष दलों का मेन मोटो रहा है। ऐसे में विपक्ष के लिए चुनावी तालमेल के अलावे और कोई विकल्प नहीं रह गया था । झामुमो और कांग्रेस के हाई कमान के बीच सीट बंटवारे को लेकर फैसला हुआ और घाटशिला विधानसभा क्षेत्र से तीन बार लगातार (२०९५-२००९) कांग्रेस का विजय पताका लहराने वाले दिग्गज प्रत्याशी डाक्टर प्रदीप कुमार बालमुचू को चुनावी रण क्षेत्र में झामुमो के समर्थन में अपना हथियार डालना पड़ा ।

घाटशिला विधानसभा में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के लिए हाई कमान का यह निर्णय ४४० वोल्ट साबित हुआ। यहां पार्टी के कार्यकर्ता किसी भी हाल में यह मानने के लिए तैयार नहीं था । मसलन, २०१९ में डाक्टर प्रदीप कुमार बालमुचू और घाटशिला विधानसभा के कांग्रेसीयों के बीच बैठक हुई। लंबा आलोचना चलता रहा । अंत में यह तय हुआ कि, डाक्टर प्रदीप कुमार बालमुचू आजसू के टिकट पर चुनाव के लिए पर्चा भरेंगे और चुनाव लड़ेंगे । बहरहाल, कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पुरे जोर से चुनाव मे डाक्टर प्रदीप कुमार बालमुचू को जीत दीवाने के लिए दिन-रात एक कर दिया । चुंकि, घाटशिला विधानसभा क्षेत्र चुनावी दृष्टि से आजसू के लिए कमजोर रहा है। दुसरी बात, आजसू पार्टी भाजपा का घटक दल है और यही समझने में डाक्टर प्रदीप कुमार बालमुचू और उनके समर्थकों को गलती हो गई कि, कांग्रेस का एक बड़ा वोट बैंक मुस्लिम और ईसाई मतदाता भाजपा घटक दल के खिलाफ जाकर झामुमो को समर्थन दे सकता है । और ऐसा ही हुआ झामुमो के झोली में कांग्रेस की झोली का वोट गिरने से झामुमो को जीत हासिल हुई ।

कांग्रेस के लिए घाटशिला विधानसभा क्षेत्र तालमेल की राजनीति में सार्थक है या विफल, यह बातें तो पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं से बेहतर और कौन समझ सकता है ?

 २०२४ में विधानसभा चुनाव पूर्व घाटशिला विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेसीयों ने एक संयुक्त बैठक घाटशिला मारवाड़ी धर्मशाला में किया । जिसमें झामुमो का कड़ी आलोचना किया गया। कार्यकर्ताओं ने मंच में स्पष्ट कहा कि, झामुमो का विधायक होने से कांग्रेसीयों को कोई अहमियत नहीं मिल रहा है। ऐसे में कांग्रेस की छवि क्षेत्र में धुमिल होती जा रही है ।‌

यह तो सही बात है, जिस दल के विधायक होंगे उसी दल के लोगों का बैल-बाला होती है। सहयोगी पार्टियों के कार्यकर्ताओं का कोई मोल धरातल में कम ही देखने को मिलता है । यही वजह है कि, घाटशिला विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेसीयों का संख्या समय के अंतराल में लुप्त होती जा रही है । कार्यकर्ताओं में निराशा साफ झलकती है। खबरों के अनुसार डाक्टर प्रदीप कुमार बालमुचू को कांग्रेस के हाई कमान ने दिल्ली बुलाया है। संभवत गठबंधन धर्म को याद दिलाने के लिए बुलाया है।

बहरहाल, घाटशिला विधानसभा चुनाव में झामुमो और कांग्रेस के बीच गठबंधन जहां झामुमो के लिए सार्थक साबित होता रहा वहीं, ग्रास रुट से जुड़े यहां के कांग्रेसी कार्यकर्ता खुद को असहाय महसूस कर रहें हैं। क्या चुनावी गठबंधन धर्म घाटशिला विधानसभा मे कांग्रेसीयों के लिए घातक साबित हो रहा है ?

कौन कहेगा उजड़ा हुआ यह बियाबान कभी कांग्रेस पार्टी के लिए मजबूत किला हुआ करता था !

यह एक यक्ष्य प्रश्न है।

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