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जमशेदपुर : झारखंड की परंपरागत सेन्द्रा पर्व का तारीख पर लगी मुहर… 

आगामी 5 मई को सेंदरा पर्व मनाया जाएगा । दलमा बुरू सेंदरा समिति की बैठक में सेंदरा की तारीख पर अंतिम मुहर लगी । दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने सेंदरा वीरों को खजूर पत्ते से बना पारंपरिक निमंत्रण पत्र ‘गिरा सकाम’ बांटा । वहीं परसुडीह क्षेत्र के गदड़ा में शुक्रवार को दलमा बुरू सेंदरा समिति की बैठक में सेंदरा की तारीख पर अंतिम मुहर लगी । इसके साथ ही पहला निमंत्रण पत्र भी सौंपा गया । बैठक की अध्यक्षता दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने किया । सेंदरा को लेकर शुक्रवार को दलमा ताड़पत्र से बने गिरा सिकम आदिवासी बाहुल्य गांवों में जाएगा, जहां लोग न्योता स्वीकार करेंगे और ताड़ पर से बने गांठ को खोलने की परंपरा का निर्वाह करेंगे। प्रत्येक वर्ष की तरह दलमा बुरू सेंदरा के लिए राकेश हेम्ब्रम के आवास पर पूजा अनुष्ठान कर गिरा सिकम निर्गत किया गया। परगना बाबा, माझी बाबा, मानकी बाबा, मुंडा बाबा व दिसुआ सेंदरा वीरों की उपस्थिति में राकेश हेंब्रम ने 5 मई को दिसुआ दलमा सेंदरा पर्व मनाने का आह्वान किया । उन्होंने पहला किता गिरा सकाम अर्थात सेंदरा निमंत्रण पत्र धाड़ दिसोम देश पारानिक दुर्गा चरण मुर्मू को राजा की पत्नी राधा हेम्ब्रम ने सौंपा ।‌ साथ ही उनसे आग्रह किया वे अपने तोरोफ के सेंदरा वीरों को दलबल के साथ उक्त निर्धारित तिथि पर लेकर आयें. वही दलमा राजा राकेश हेम्ब्रम ने कहा कि यह पर्व आदिवासि समाज का पर्व है इस पर्व को राष्ट्रीय पर्व की घोषणा की जानी चाहिए, इसको लेकर झारखंड सरकार के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिल कर मांग पत्र सोपेंगे, उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज जल जंगल जमीन प्रकृति की पूजा करती है सेंदरा पूर्वजो से मनाता आया है उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सरना धर्म को बचाने के लिए आगे आना चाहिए और झारखंड सरकार से हम लोग मांग करते हैं कि झारखंड में सरना कोड जल्द से जल्द लागू करें ।

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बता दें का, सेन्द्रा संथाली शब्द है, इसका हिन्दी अर्थ शिकार होता है। वैसे तो वन्य जीवों के शिकार पर सरकार ने रोक पहले से ही कानूनी तरीके से लाभ रखी है ।‌ पर झारखंड में सेन्द्रा पर्व पुराने समय से ही चला आ रहा है । जिसके तहत इस राज्य में प्रत्येक वर्ष एक दिन के लिए इसका अनुमति दी गई है । पर बाघ, हिरण जैसे अनेक वन्य जीव है जिसका शिकार करना वर्जित है । क्यों कि, इस शिकार में संथाली आदीवासी समुदाय अपने परंपरागत हथियारों से लैस होकर दलमा जंगल में जाते हैं । इस दौरान कोई व्यक्ति वर्जित वन्य जीव का शिकार न कर सके इसलिए वन विभाग के अधिकारियों से लेकर तमाम कर्मचारी दलमा के जंगलों में पेट्रोलिंग करते रहते हैं ।‌ पर यह निरीक्षण कितना कामयाब होता है यह तो ऊपर वाला ही ठीक बता सकता है ।

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