
जमशेदपुर : आखिर पूर्वी सिंहभूम जिला ग्रामीण भाजपा कमेटी विवादों के घेरे में क्यों ?
कुछ दिन पहले ही झारखंड भाजपा के प्रदेश कमेटी ने पूर्वी सिंहभूम जिला ग्रामीण भाजपा जिला अध्यक्ष का जिम्मेदारी युवा चेहरा संजीव कुमार तिवारी उर्फ सत्ता तिवारी को सौंपा गया। सत्ता को जिला अध्यक्ष बनाये जाने से जहां स्थानीय कार्यकर्ताओं ने खुशी जाहिर किया वहीं सत्ता के द्वारा जैसे ही कमेटी विस्तार के लिए मंडल अध्यक्षों को मनोनीत किया गया तो प्रखंड स्तरीय भाजपाइयों ने मंडल अध्यक्षों के खिलाफ जोरदार विरोध करना क्यों आरंभ कर दिया ? प्रदेश भाजपा के लिए यह शुभ संकेत तो हो नहीं सकता है। भाजपा में सत्ता तिवारी एक मंजा हुआ तेज तर्रार युवा चेहरे के रुप में पहचान रखता है। ऐसे मे सत्ता तिवारी अपने कार्य क्षेत्र के दायरे में रह कर मंडल अध्यक्षों को चयन करें आर पार्टी के कार्यकर्ता मंडल अध्यक्षों के खिलाफ विरोध करना शुरू कर दें यह बात लोगों को हजम नहीं हो रही है। वानांचल ने मामले की गहराई की जब टटोलने की कोशिश की तो जो कुछ तस्वीरें सामने आई वह हैरान करने वाली बात है। इसे ठीक से जानने के लिए लगभग दस – पन्द्रह साल पीछे “फ्लस बैक” से बातों को आरंभ करने की जरूरत होगी। जानने के लिए चलिए यात्रा किजिए हमारे साथ।

विदित हो कि, झारखंड राज्य के पूर्वी सिंहभूम ग्रामीण जिला अध्यक्ष का पद भार घुमा-फिरा कर तीन-चार चेहरों हाथों में थमाया जाता रहा। संक्षेप में कहें तो “ढाक का तीन पात” समान रहा है। जिला में अनेक तेज तर्रार युवा कार्यकर्ता के रहते हुए भी प्रदेश कमेटी केवल तीन-चार चेहरों को ही बारी-बारी जिला का जिम्मेदारी सौंपते रहें। और पीछले दस सालों में ग्रामीण जिला कमेटी का कैसा प्रभाव रहा है दस सालों में बहरागोड़ा, घाटशिला और पोटका विधानसभा चुनाव का परिणाम को देखकर आसानी से परखा जा सकता है। यही वजह रहा कि, प्रदेश कमेटी को इस मामले मे ग्रामीण जिला पूर्वी सिंहभूम में राजनीतिक दृष्टिकोण से मात खाना पड़ा। भाजपा प्रदेश कमेटी आज तक यह बातें समझ सकें कि नहीं यह मालूम नहीं पर स्थानीय लोगों को समझ ने कोई देर नहीं लगा कि देश के सबसे बड़ी पार्टी क्यों झारखंड राज्य में एक क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी से मात खा रहें हैं।
खबरों के अनुसार, इस बार भी भाजपा ग्रामीण जिला अध्यक्ष के लिए “ढाक के तीन पात” में से कोई फिर एक नेता जिला अध्यक्ष बनने का ख्वाइश मंद थे। और जिसके लिए अपने स्तर से हाथ-पैर मारने लगे। पर इस बार प्रदेश कमेटी के सामने एक न चला। और प्रदेश कमेटी ने पीछले दस – पंद्रह साल के रिकार्डों को देखते हुए जोखिम उठाना उचित नहीं समझा होगा। और आखरी फैसला संजीव कुमार तिवारी उर्फ सत्ता को जिला का दाईत्व भार सौंपा गया। “ढाक के तीन पात” में से महत्वाकांक्षी खिलाड़ी का रखने “प्लान-ए” जब फेल हो गया तो “प्लान-बी” को खेलना आरंभ किया।
खबरों के अनुसार, भाजपा की ज़िला पर्यवेक्षक आरती कुजूर कुछ दिनों पहले घाटशिला आई थी और एक मशहूर होटल में ठहरी थी। “ढाक के तीन पात” में से किसी एक ने जिला पर्यवेक्षक से मुलाकात किया। चुंकि, पूर्व जिला अध्यक्ष रह चुके पुराने कार्यकर्ताओं का प्रदेश कमेटी में पहचान और पकड़ होना लाजमी है। इसी आलोक में भाजपा के वह नेता पूर्वी सिंहभूम जिला ग्रामीण भाजपा के लिए मंडल अध्यक्षों का लिस्ट मैडम के समक्ष रखा। इस नेता को अच्छी तरह से मालूम था कि मंडल अध्यक्षों का यह लिस्ट प्रकाश में आते ही ग्रामीण भाजपा जिला में उथल-पुथल होना निश्चित हे। और उसने किस तरह जिला पर्यवेक्षक को समझाने में कामयाब हो गया अपने द्वारा मंडल अध्यक्षों का नाम। गौर करने वाली बात यह है कि, ग्रामीण जिला में मंडल अध्यक्षों का जो लिस्ट जिला अध्यक्ष के देख देख में बनना था वह सारा नाम प्रदेश स्तर से जिला अध्यक्ष के पास भेजा गया । जिस लिस्ट पर नव निर्वाचित जिला अध्यक्ष सत्ता तिवारी के लिए मुहर लगाना मजबूरी था । संजीव तिवारी से पुछा गया तो उसने बताया कि, प्रदेश कमेटी से मंडल अध्यक्षों का लिस्ट जारी की गई थी। उन्होंने ने कहा, प्रदेश कमेटी अगर कुछ निर्णय लिया है तो पार्टी के बेहतर के लिए ही लिए होंगे ।
खबरों के अनुसार, कुछ मंडलों में तो ऐसा हुआ कि, दुसरे-दुसरे प्रखंड के कार्यकर्ता को मंडल अध्यक्ष बना दिया गया है। परिणाम, बबाल, मत विरोध अवस्था को जिला और प्रदेश भाजपा को झेलना पड़ रहा है। जाहिर है, यह खबर किसी न किसी माध्यम से दिल्ली के पार्टी कार्यालय तक भी पहुंच सकता है। भले ही प्रदेश और जिला कमेटी का कुछ भी हो पर विभिषण तो अपना अपना “प्लान-बी” में तो सफल हो गया।
राजनीति जानकारों का मानना है कि, इस तरह के कुठाराघातों से कोई भी राजनीतिक पार्टी मजबूत नहीं हो सकता है। समय रहते ही अगर उचित उपचार नहीं हो सका तो भविष्य में पार्टी को और भी नुकसान हो सकता है।
झारखंड में विगत कुछ वर्षों से भाजपा शिथिल पड़ता देखा गया है। वर्तमान समय प्रदेश में भाजपा का विपक्ष जैसी कोई प्रभावशाली रोल नहीं देखा जा रहा है। जिस कारण झारखंड राज्य मे झामुमो के लिए विशेष कोई चुनौती का सामना नहीं करना पड़ रहा है। बहरहाल, भाजपा के लिए जरुरत है कि, पहले अपनी कमजोरीयों को समाप्त करनी होगी। अन्यथा, 2029 के चुनाव में चुनावी रुपी टाइटेनिक को पार लगाना आसान नहीं होगा
