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पटना  : बिहार में एनडीए की जीत से ममता बनर्जी की बढ़ी टेंशन..

संजय कुमार विनित …✍️

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बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम में बीजेपी के सबसे बड़े पार्टी बनकर उभरने पर और इस शानदार जीत ने एक तरीके से पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी की टेंशन बढ़ा दी है।बीजेपी नेताओं ने अपना अगला राजनीति लक्ष्य पश्चिम बंगाल को मानते हुए जो वक्तव्य दिये और टीएमसी नेता द्वारा त्वरित प्रतिक्रिया आई इससे यह स्पष्ट है कि बिहार के चुनाव परिणाम ने ममता बनर्जी की टेंशन बढ़ा दी है। 

बिहार में मिले जनता के प्रचंड जनादेश ने एनडीए की विश्वसनीयता पर भरोसा किया है। युवाओं को रोजगार देने और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी के लिए बनाए गए कार्यक्रमों के कारण लोगों का भरोसा एनडीए पर बढ़ा है। बीजेपी ने यहाँ ना सिर्फ 90 प्रतिशत स्ट्राइक रेट दर्ज की, बल्कि साथी दलों के अचुक प्रदर्शन के लिए गठबंधन धर्म का पालन करते हुए सहयोगी दलों को भी सहयोग दिया। एनडीए के बेहतर तालमेल और चुनावी प्रबंधन के बदौलत ना सिर्फ एनडीए के पक्ष में सुनामी चली, बल्कि महागठबंधन के दलों को आंधी में उड़ जाने के सिवा कुछ ऐसा हासिल नहीं हुआ, जिसे स्पष्ट किया जा सके। महागठबंधन के घोषित मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के हाल इतने बदहाल हुए, जिसे भविष्य में स्वयं वे याद नहीं रखना चाहेंगे। 

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में एनडीए की जीत से बीजेपी उत्साहित है। अमित मालवीय ने कहा कि बिहार का जनादेश एनडीए की विश्वसनीयता का प्रमाण है और इसका असर बंगाल के चुनावों पर भी दिखेगा। उन्होंने ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा कि बंगाल के लोग टीएमसी को सत्ता से हटाने के लिए तैयार हैं। बीजेपी बंगाल में अपना वोट शेयर बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। इसका त्वरित जबाब देते हुए राज्यसभा के पूर्व सदस्य कुणाल घोष ने कहा, ‘‘यह बिहार का समीकरण है। इसका बंगाल से कोई संबंध नहीं है। इसका बंगाल पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बंगाल में विकास, एकता, सद्भाव, अधिकार और स्वाभिमान ही कारक हैं। 250 से ज़्यादा सीटों के साथ ममता बनर्जी फिर से मुख्यमंत्री बनेंगी।’’ 

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने भी कहा है कि अब बंगाल की बारी है। भाजपा नेताओं का बंगाल जीत को लेकर उत्साहित होना कोई स्वपन भर नहीं कहा जा सकता है। भाजपा ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव में 38 प्रतिशत वोट बरकरार रखा है। 2021 के विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में बीजेपी सरकार नहीं बना पाई लेकिन विपक्ष की पूरी जगह उसने अपने पाले में कर ली है। पार्टियाँ अक्सर सत्ता में आने से पहले विपक्ष की जगह ही हासिल करती हैं और ये काम बीजेपी ने सीपीएम-कांग्रेस को बेदखल करके कर लिया है। आज़ादी के बाद से ऐसा पहली बार हुआ है कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के एक भी विधायक नहीं चुने गए। 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और वाम मोर्चा गठबंधन को 77 सीटों पर जीत मिली थी यानी ठीक उतनी ही सीटें जितनी 2021 में बीजेपी को मिली हैं। 

2016 में बीजेपी को केवल तीन सीटों पर जीत मिली थी, जबकि 2021 में 77 सीटों पर जीत मिली । 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर लगभग 10 फ़ीसदी था, 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य में बीजेपी की लोकप्रियता का उफ़ान दिखा और उसने वोट शेयर के मामले में एक झटके में 40 प्रतिशत का आंकड़ा पार कर लिया। बीजेपी को इस विधानसभा चुनाव में में 38.1 प्रतिशत वोट मिले हैं। बीजेपी पश्चिम बंगाल में इस बार सरकार बना लेती तो बहुत ही अप्रत्याशित होता, क्योंकि बंगाल में वो सीधे तीन सीट से सत्ता तक पहुंचती। 

2021 का विधानसभा चुनाव पूरी तरह से दो ध्रुवीय रहा था। 292 में से 290 सीटों पर टीएमसी या फिर बीजेपी को जीत मिली है, ये दोनों पार्टियां एक दूसरे के आमने सामने थी, एक पर इंडियन सेक्युलर फ्रंट और एक पर निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली है। मुसलमान मतदाताओं का मत एकपक्षीय रहा, जबकि हिंदूओं के वोट बंटे। बीजेपी का आरोप है कि बीजेपी ना जीत जाये, इस डर को दिखाकर ही तृणमूल काग्रेस ने ये वोट हासिल किये। ओबीसी और जनजातियों के बीच बीजेपी ने अपनी पकड़ मजबूत की है और अब अपने फायर ब्रांड नेताओं पर भरोसा कर हिंदूओं के वोट को हासिल करने की उम्मीद है। 

इधर, तृणमूल काग्रेस ने पश्चिम बंगाल में मतदाता विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर बीजेपी और निर्वाचन आयोग द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण और उससे जुड़े मामलों को लेकर साजिशें रचने का आरोप लगाना शुरू कर दिया है। एजेंसियों और केंद्रीय शक्ति का दुरुपयोग होने के खिलाफ तृणमूल का आंदोलन जारी रखने की बात कर रहे हैं । इधर, चुनाव आयोग ने बंगाल के 78 विधानसभा क्षेत्रों में निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) को तत्काल बदलने का निर्देश दिया हैं। इनकी नियुक्ति निर्धारित मानदंडों का उल्लंघन करके की गई है, ऐसा आरोप लगाया गया है। 

पश्चिम बंगाल में देखा गया है कि परिवर्तन थोड़ा वक़्त लेता है। आज़ादी के बाद से कांग्रेस लगभग तीन दशक तक सत्ता में रही, कांग्रेस के बाद 34 सालों तक सीपीएम सत्ता में रही और पिछले 14 सालों से तृणमूल कांग्रेस सत्ता में है‌। तृणमूल काग्रेस की ममता को लेकर भी बंगाल अपनी पुरानी रवायत ही दोहरा रहा है, लेकिन बीजेपी ने भी बंगाल के दरवाज़े पर दस्तक दे दी है और कह रही है हमारा भी वक़्त आ गया है। अब देखना होगा कि पश्चिम बंगाल में चुनावी रंग कितनी इंद्रधनुषी रंगे बिखेरती है।

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