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रांची : छोटी-छोटी चूक… चुनाव रुपी टाइटेनिक जहाज डुबने का भय होता है…

संदर्भ : घाटशिला विधानसभा उप-चुनाव 

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दीपक नाग… ✍️

राजनीतिक पार्टियों के लिए आम चुनाव और बीच समुद्र में सफर करते नांव की एक ही अवस्था होती है। छोटी सी चूक टाइटेनिक जैसी पानी जहाज को जलमग्न कर डुबो दिया । ठीक उसी तरह आम चुनाव में राजनीतिक पार्टी और प्रत्याशी से छोटी-छोटी चुक हो जाए तो अर्स से फर्स तक ले आता है उसे । हमारे देश की लंबी राजनीति फ्लस बैक पर नजर घुमाएंगे तो अर्स और फर्स की छवि स्पष्ट होते देर नहीं लगेगी। पार्टी के साधारण दिखने वाले कार्यकर्ता को प्रत्याशी पहचाने से चुक जातें हैं और चुनावी नतीजे खराब होने की आसार बनी रहती है। क्यों कि जहां सुई की जरूरत होती है वहां तलवार किस काम की है ?

चुंकि घाटशिला विधानसभा के उप-पचुनाव 11 नवंबर और नतीजा तीन दिनों बाद 14 नवंबर को होने वाली है। इस लिए इस विधानसभा पर आज बात करतें हैं। उम्मीद है इस बार भी झामुमो और भाजपा के बीच सीधा टक्कर होगी। गठबंधन धर्म निभाने से पहले कांग्रेस को टक्कर से बाहर आंकलन नहीं की जाती थी । उस दौरान इस विधानसभा सभा में त्रिशंकु टक्कर की आसार बनी रहती थी।

अभी तक झामुमो और भाजपा ने अपना प्रत्याशी का पर्चा नहीं खोला है। वैसे झामुमो के पूर्व विधायक दिवंगत रामदास सोरेन के पुत्र सोमेश चंद्र सोरेन और भाजपा से सरायकेला भाजपा विधायक चंपाई सोरेन के पुत्र बाबुलाल सोरेन को पार्टी टिकट मिलने की अधिक संभावनाएं बनी हुई है । पार्टी सुत्रो से मिली खबरों के अनुसार 12 अक्टूबर’ 2025 तक भाजपा और 15 अक्टूबर’ 2025 तक झामुमो आधिकारिक रुप से अपने-अपने प्रत्याशीयों के नाम घोषणा करेंगे।

सवाल यह है कि, आधुनिक टेक्नोलॉजी ने टाइटेनिक जैसी जहाजों को दूर्घटना को नियंत्रण कर लिया हैं। क्या चुनावों में पार्टी और प्रत्याशी अपने पुराने छोट-छोटे नाजुक गलती को ठीक करने के लिए कोई फार्मूला इजात किया हैं? वर्ना अपनी कमियां को जब तक समझ पाते हैं तब तक चिड़िया खेत चूक जाती है? यह गंभीर मसला नहीं है पर सोच बदलने की जरूरत है, हालात बदल सकती है।

देखा जाता है कि, चुनावी प्रचार के दौरान प्रत्याशी अपने पार्टी के कुछ पैटेंट चेहरे को ही अधिक महत्व देते हैं। जब कि, पुरे विधानसभा के मतदाता न तो उन पैटेंट चेहरे को नाम से और न ही काम से जानते होंगे? नेताजी अपने हर दौरे मे ऐसे ही पैटेंट चहरों को फ्रंट लाइन में खड़े करते हैं। ऐसी पैटेंट चेहरे वाले किसी राजनीतिक पार्टी में पहचान अच्छे रखते होंगे पर सर्वसाधारण क्षेत्रों मे उनका वजूद क्या है यह अहम् बात होती है। ऐसे ही पैटेंट चहरों को अपने सारथी बनाकर, नेताजी चुनावी कुरुक्षेत्र में मैदान में उतर जातें हैं और चुनावी अंक-गणित अक्सर धोखा दे जाती है। समझने वाली बात है कि, जहां सुई का काम हो, वहां तलवार का क्या वजूद है?

घाटशिला विधानसभा क्षेत्र में एक बात गौर करने योग्य है कि, यहां पर मतदाताओं को दो अवस्था में बांटा जा सकता हैं। इसे समझने के लिए ग्रामीण और शहरी मतदाता परिवेश कह सकते हैं। आम तौर पर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों मे लोग बिना किसी काम के एक दूसरे के क्षेत्र में बे-वजह आना-जाना कम करते हैं। जाहिर है दोनों क्षेत्र के लोगों का अपने-अपने क्षेत्रों मे धरातल मजबूत होगा। ऐसी अवस्था मे नेताजी गांव में शहर के लड़के और शहर में गांव के लड़कों को अपने चुनावी सारथी के रूप में प्रचार-प्रसार के लिए साथ ले जाएं और उन्हें फ्रंट लाइन में खड़ा करे तो कल्पना किजिए उस कार्यक्रम का चुनावी कुरुक्षेत्र में क्या असर पड़ता होगा? परिणाम ठीक हो सकता था अगर नेताजी अपने पार्टी के उन युवकों को जगह अनुसार चयन किये होते। क्यों कि, उस गांव, कालोनी, मोहल्ले, के लोगों को नेताजी से अधिक अपने उस युवा पर विश्वास अधिक होना स्वाभाविक बात है जिसे छोटे से देखते आ रहें हैं। उन मतदाताओं को यकीन होने लगता है कि, अपने बस्ती में रहने वाले लड़का मुसीबतों में काम आ सकता है। इससे ऐसे साधारण कार्यकर्ताओं का कार्य करने की ऊर्जा शक्ति भी बढ़ सकती है।

चुनाव में विजई होना आसान नहीं होता है। चाणक्य नीति को हमेशा साथ लेकर चलने की जरूरत होती है। छोटी-छोटी चीजों को नजरंदाज करने से चुनाव रुपी टाइटेनिक जहाज डुब जाने का भय बना रहता है और टाइटेनिक डुबते देर नहीं लगती है।

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