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गुजरात : मंत्रियों का सामुहिक इस्तीफा :: सत्ता विरोधी लहर से निपटने की कोशिश है सामुहिक इस्तीफा

संजय कुमार विनित… ✍️

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(पत्रकार सह राजनीतिक विश्लेषक)

गुजरात में मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल को छोड़कर सभी 16 मंत्रियों के सामुहिक इस्तीफा से राजनीतिक हलचल काफी तेज हो गयी है। हलांकि, कल ही नये मंत्रीमंडल की शपथ ग्रहण समारोह आयोजित है। अपार बहुमत वाली भाजपा सरकार अपनी पुरानी रणनीति के तहत इस प्रयोग से ना सिर्फ सत्ता विरोधी लहर से निपटने में कामयाब होगी, बल्कि नगर निगमों और स्थानीय निकायों पर परचम लहरा कर आने वाली विधानसभा चुनाव की तक के लिए तैयार रहेगी। 

 ऐसा नहीं है कि भाजपा ने ऐसा गुजरात में पहली बार किया है पर विधानसभा चुनाव में अभी दो साल बाकी है । विधानसभा चुनाव से कुछ दिन पहले ऐसी प्रक्रियाओं को गुजरात में देखा गया है। पर गुजरात में विधानसभा की चुनाव 2027 में होने हैं। राजनीतिक पंडितों की बात अगर माने तो इसबार भाजपा ने गुजरात में मंत्रियों का सामुहिक इस्तीफा इसलिए लिया है कि राज्य में विपक्ष को काफी हद तक खत्म किया जा सके और इसके साथ साथ इलाके और जाति के आधार पर नये मंत्रियों को शपथ दिलाकर नगर निगमों सहित स्थानीय निकायों के चुनाव में परचम लहरा सके। 

गुजरात में 2022 के 182 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 156 सीटें जीतीं थीं। उसके बाद आठ कांग्रेस विधायक भी इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए और उपचुनाव लड़कर विधायक बन गए। इसके बाद विधानसभा में पार्टी के विधायकों की संख्या बढ़कर 162 हो गई। वर्तमान सरकार में मुख्यमंत्री श्री पटेल समेत 17 मंत्री थे। विधानसभा की सदस्यता के हिसाब से सदस्यों की 15 फीसदी, अर्थात 27 मंत्री हो सकतें हैं। सीधे तौर पर मंत्रीमंडल का विस्तार ना कर मंत्रियों से इस्तीफा लेकर कल ही फिर मंत्रियों की शपथ ग्रहण की घोषणा से भाजपा की इस स्ट्रैटजी पर सबकी नजर गड़ी हुई है‌। 

2022 में गुजरात में विधानसभा चुनाव हुए थे। चुनाव से 15 महीने पहले सितंबर 2021 में राज्य की पूरी कैबिनेट बदल दी गई थी। इस बार राज्य में चुनाव को करीब 26 महीने बचे हुए हैं। हालांकि, इस बार मुख्यमंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया है सिर्फ उनके कैबिनेट सहयोगियों ने पद छोड़े हैं। 2021 में तो पांच साल के अंदर दो बार मुख्यमंत्री बदल दिए गए थे। 2017 में जब चुनाव हुआ था, तब विजय भाई रूपाणी को सीएम बनाया गया था, लेकिन 2021 में उन्हें हटाकर भूपेंद्र पटेल को जिम्मेदारी दे दी गई। 

चेहरे बदलकर भाजपा राज्य में लंबे समय से चल रही सरकार के प्रति होने वाली सत्ता विरोधी लहर को खत्म कर देती है। नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद से पूरी कैबिनेट को चुनाव से करीब 15 महीने पहले बदला जा रहा था। हालांकि, इस बार ये बदलाव थोड़ा जल्दी हुआ है। समझा जा रहा है कि इसी गुजरात फॉर्मूले के चलते मंत्रियों को छोड़ना पड़ा पद‌। समझा जा रहा है कि इससे सभी इलाके और सभी जाति के विधायकों को मंत्री बनाकर साधने की कोशिश है। 

दरअसल, 2024 की लोकसभा चुनाव में पहली बार गुजरात भाजपा में विरोध के स्वर देखना पडा़ था, इसी वजह से साबरकांठा और बडोदरा में उम्मीदवार तक बदलने पडे थे। इतने सारे विधायकों के उम्मीदों पर खड़ा उतरना और सबको संतुष्ट कर संतुलित होकर सरकार चलाना इतना आसान नहीं होता है और भाजपा में अब भी असंतोष सामने आने की बात हो रही है। इसलिए, कहा जा सकता है कि शायद सत्ता विरोधी लहर से निपटने के लिए नये मंत्रीमंडल का गठन कर संतुलन बनाने की कोशिश है। 

2026 की शुरुआत में ही गुजरात में नगर निगमों और स्थानीय निकायों के चुनाव होने हैं। भाजपा इसके लिए कोई रिस्क लेने को तैयार नहीं दिख रही। ज्यादा से ज्यादा निगमों और निकायों पर कब्जा करने का लक्ष्य रखा गया है। और इसलिए भी सत्ता विरोधी लहर ना हो, पुर्ण मंत्रीमंडल हो, सभी इलाकों और जातियों को समुचित प्रतिनिधित्व मिले, ताकि विपक्षी पार्टियों को आसानी से हराया जा सके। इस योजना को लेकर भी मंत्रियों की इस्तीफा और नये मंत्रीमंडल का गठन की बात सामने आ रही है। 

फिलहाल तो गुजरात में पिछले कुछ दिनों से मंत्रीमंडल विस्तार पर चल रही चर्चाओं पर अब पूरी तरह से रोक लग गई है। यह तय हुआ है कि भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के मंत्रीमंडल विस्तार का कार्यक्रम शुक्रवार, 17 अक्टूबर को गांधीनगर के महात्मा मंदिर में होना है। राज्य भाजपा और केंद्रीय भाजपा पदाधिकारी इसपर मंथन कर रहें हैं। आज ही मुख्यमंत्री भुपेन्द्र पटेल राज्यपाल को लिस्ट सौंपेंगे । राज्यपाल आचार्य देवव्रत राज्य कैबिनेट में शामिल होने वाले मंत्रियों को कल सुबह पद और गोपनीयता की शपथ दिलाएंगे।

अब देखना यह होगा कि गुजरात भाजपा इस रणनीति से कितनी कामयाबी हासिल कर पाती है। गुजरात में सत्ता विरोधी लहर से निपटने में कितनी कामयाबी मिलती है और नगर निगमों और स्थानीय निकायों के चुनावों को किस हद तक साधकर विधानसभा चुनाव के लिए तैयार खडी़ दिखती है। गुजरात में सत्ता विरोधी लहर से निपटने वाली इस रणनीति पर एकबार फिर से सबकी नजर होगी और कामयाबी के तराजू पर इसकी परिणाम देखें जायेंगे।

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